20 अक्तूबर 2014
अरविंद सुब्रमण्यन: भविष्य की वित्तीय सुनामी से मुक्ति का रास्ता सुझाने वाला चिंतक

मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद अक्सर ही विवादों से घिर जाता है। कुछ लोग इसे केवल वित्त मंत्री का एक सहयोगी भर मानते हैं तो कुछ लोग इस पद को आर्थिक परेशानियों से निजात दिलाने वाले मुख्य सरकारी सलाहकार के रूप में देखते हैं। आप चाहें जैसे इसे देखें लेकिन मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमण्यन का दायित्व खासकर 2008 के लेहमैन संकट के तुरंत बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में उनकी खुद की भविष्यवाणी को देखते हुए बहुत आसान नहीं होगा।

16 अक्तूबर 2014
क्रोनी पूंजीवाद से दबावमुक्त सरकार में दिख रहा काम का जज्बा

मैं जब भी केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से मिलता हूं, तो हमेशा उनसे एक ही सवाल पूछता हूं। मोदी सरकार के आने से क्या बदलाव आया है? लगभग एक स्वर से वे कहते हैं कि जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वह यह कि अब सभी प्रकार के क्रोनी पूंजीवाद से संबंधित दबाव खत्म हो चुके हैं और अब वे वास्तव में महसूस करते हैं कि वे भारत के लिए काम कर रहे हैं न कि किसी एक व्यक्ति के लिए। अधिकारियों में अधिकारिता का एक नया हौसला दिख रहा है और अधिकांश अधिकारियों का यह विश्वास है कि सरकार उनके फैसलों का समर्थन करेगी और उन्हें उनकी वास्तविक गलतियों के लिए बेवजह फटकार नहीं पड़ेगी।

7 अक्तूबर, 2014
हैमलेट, हैदर और नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर

नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर यानी एनआईसी के संदर्भ में ‘हो या न हो‘ का यक्ष प्रश्न लंबे समय से उठाया जाता रहा है। जब इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग यानी डेयटी के सचिव यह कहते हैं कि एनआईसी के पास प्रधानमंत्री द्वारा परिकल्पित ‘डिजिटल इंडिया‘ को क्रियान्वित करने की क्षमता का एक अंश भी नहीं है तो इस वक्तव्य को या तो एनआईसी की एक आलोचना या फिर एनआईसी को जीवंत बनाने की एक योजना शुरू करने की पूर्व-भूमिका के रूप में देखा जा सकता है जो एनआईसी को एक ऐसे मजबूत सूचना प्रणाली संगठन के रूप में बदल देने में मदद करे जिसपर कोई भी देश गर्व महसूस करे।

26 सितम्बर 2014
भारत-अमेरिकी संबंध: स्वामी विवेकानंद, इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी

इस साल मैं 50 वर्ष का हो गया। यह मेरे लिए केवल एक व्यक्तिगत मील का पत्थर नहीं है। वास्तव में, यह कोई मील का पत्थर है ही नहीं, यह तो केवल एक परिवर्तन है। बिल्कुल भारत की ही तरह जहां हमारा जन्म हुआ-जहां समृद्धि और संभावनाएं दोनों मुश्किल से आती थीं, आज एक समावेशी भारत में बदल चुका है। इस परिवर्तन का मैं खुद गवाह रहा हूं इसलिए मैं अपने देश के जीवित इतिहास का एक हिस्सा महसूस करता हूं जो सालों की बंद अर्थव्यवस्था के बाद अब उभर कर सामने आ रहा है।

8 सितम्बर 2014
बैंक गरीबों को लूट कर अमीरों को कर रहे मालामाल

अक्तूबर 2011 से पहले पूरे बैंकिंग सेक्टर में बचत खाताओं पर 4 फीसदी की सालाना ब्याज दर थी-पर विनियंत्रण के बावजूद इनमें बमुश्किल कोई बदलाव आया है

28 अगस्त 2014
मोदी की ‘डिजिटल इंडिया योजना:113,000 करोड़ रूपये की बर्बादी ?

मीडिया में डिजिटल इंडिया पर कई तरह की खबरें आ रही हैं जिनमें इसे आधी-अधूरी योजना और करदाताओं के पैसे की बर्बादी करार दिया जा रहा है। भारत की पहली राष्ट्ीय ई-गवर्नेंस योजना 2004 में शुरू हुई और फिर कपिल सिब्बल के नेतृत्व वाले संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा इसका पुर्नअवतार किया गया।