14 अक्तूबर 2014
सरकार को मुद्रास्फीति का लक्ष्य निर्धारित करने की जरूरत

मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की पिछले चार वर्षों से ब्याज दरों पर गिद्ध दृष्टि रही है। चुने हुए प्रतिनिधियों और सरकार के प्रतिरोध के बावजूद रिजर्व बैंक ने सख्त मौद्रिक नीति बरकरार रखी है। पर त्रासदी यह है कि इस गिद्ध दृष्टि का महंगाई पर कोई अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ा है क्योंकि मुद्रास्फीति दर लगातार उंची बनी हुई है।

6 अक्तूबर, 2014
बांग्लादेश से लें ‘स्वच्छ भारत‘ के सबक

भारत के 1.25 अरब लोगों में से आधे से ज्यादा खुले में शौच करते हैं और दुनिया में जितने लोग खुले में शौच करते हैं, उनमें से आधे से ज्यादा भारत में रहते हैं।

22 सितम्बर 2014
रूपे, बीमा वाले जन धन योजना के लाभ सहकारी बैंक खातों को भी होंगे सुलभ

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खोले जाने वाले खातों से जुड़े रूपे डेबिट कार्ड, बीमा तथा ओवरड्ाफ्ट सुविधाओं के लाभ सहकारी बैंकों द्वारा खोले गए खातों पर भी लागू होंगे। वित मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने गुरूवार को यह जानकारी दी।

5 सितम्बर 2014
एलआईसी कर रही गरीबों के बीमा से परहेज

सरकार द्वारा संचालित लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन अर्थात एलआईसी, जो देश में दो तिहाई जीवन बीमा व्यवसाय को नियंत्रित करती है, ने प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत प्रस्तावित 30,000 जीवन बीमा की लागत का बोझ उठाने में अनिच्छा जाहिर की है।

11 सितम्बर 2014
किस्मत के धनी, मोदी और धोनी

ऐसा अक्सर कहा जाता है कि भारत में दो सबसे अहम काम दो चैंपियनों-भारत केे प्रधानमंत्री और राष्ट्ीय क्रिकेट टीम के कप्तान के हैं। राजनीति और क्रिकेट, इन्हीं दोनों का नशा औसत भारतीयों के दिलो-दिमाग पर छाया रहता है। चाहे इलीट कहे जाने वाले लोगों का सामाजिक जमावड़ा हो या फिर सड़क के किनारे ढाबों पर बैठे निठल्ले, या फिर किसी बस या ट्ेन में यात्रा कर रहे लोग। उनकी बातचीत या बहस का सबसे आम मुद्वा या तो राजनीति होती है या फिर क्रिकेट।

3 सितम्बर 2014
योजना आयोग के साथ ‘वीआरएस‘ शुरू करने का आ गया है वक्त

जब से मोदी सरकार 26 मई से सत्ता में आई है, योजना आयोग में सन्नाटा पसरा हुआ है। योजना आयोग और इसके सहयोगी ऑफिसों में काम करने वाले लगभग 1,200 लोगों के पास मुश्किल से ही कोई उत्पादक काम है।

19 सितम्बर 2014
आर्थिक आंकड़ों को मापने के तरीके दुरूस्त करने की जरूरत

जीडीपी, औद्योगिक उत्पादन और महंगाई दर जैसे सूक्ष्म आर्थिक आंकड़ों में व्यापक उतार चढ़ाव और बड़े संशोधन इन संख्याओं की साख को लेकर सवाल खड़े करते हैं। पिछले दो वर्षो के दौरान आर्थिक विकास, औद्योगिक उत्पादन, विदेश व्यापार और महंगाई दर आंकड़ों में कई बार और काफी बड़े संशोधन हुए हैं। इसके अतिरिक्त, महीना दर महीना और तिमाही दर तिमाही आधार पर इन आंकड़ों में होने वाले बड़े उतार चढ़ावों ने इनकी साख को भी धक्का पहुंचाया है।

04 सितंबर 2014
क्या तरलता संकट की तरफ बढ़ रहे हैं भारतीय बैंक?

आज के दौर में, जब फिजां में चारों तरफ वित्तीय समावेश की ही चर्चा है, बड़े उद्योगपतियों द्वारा किए जाने वाले डिफॉल्ट की घटनाओं ने एक बार फिर से भारतीय बैंकों के बैलेंस शीट की विकट होती स्थिति पर ध्यान देने को मजबूर कर दिया है। यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया द्वारा शराब के सरताज विजय माल्या को ‘हठी डिफॉल्टर‘ घोषित किया जाना बैंकों पर बढ़ते दबाव को रेखांकित करता है।