अर्थव्यवस्था

30 अक्तूबर 2014
शहरी विकास यानी प्रगति के वाहक

नगर विकास के वाहक हैं। हालांकि केवल 30 फीसदी भारतीय नगरों में निवास करते हैं, वे देश के जीडीपी में 60 फीसदी से अधिक तथा कर राजस्व में 80 फीसदी का योगदान देते हैं। लेकिन नगरों में रहने वालों को पानी, बिजली की कम आपूर्ति से लेकर अन्य ढांचागत संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन्हीं समस्याओं से रूबरू कराता एम रामचंद्रन का यह लेख

29 अक्तूबर 2014
शिल्प, संस्कृति और पर्यटन: पारंपरिक कौशलों को आजीविका से जोड़ने पर बनेगी बात

अलग-अलग मंत्रालयों को दूसरे मंत्रालयों की गतिविधियों के बारे में अपनी आंख और दरवाजे खोलने में सक्षम बनाने और प्रोत्साहित करने पर जिससे समन्वय की भावना पैदा होती है, लंबे समय से विचार होता रहा है। इसके लिए किसी ‘बाहरी व्यक्ति‘ जैसाकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को परिभाषित करते हैं, की जरूरत थी जो इसकी पहचान करे और मंत्रालयों को आपस में सहयोग करने के लिए प्रेरित करे न कि आपस में होड़ करने और कलहपूर्ण जागीरदारी की भावना पैदा करने को।

28 अक्तूबर 2014
सामाजिक और आर्थिक समावेश का पोषण करता कपड़ा क्षेत्र

प्रधानमंत्री के कपड़ा क्षेत्र को विनिर्माण क्षेत्र में सबसे बड़ा नियोक्ता तथा कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता बनाने के आह्वान से सामाजिक और आर्थिक समावेश की संभावनाओं का सरल और कारगर बनना तय है।

20 अक्तूबर 2014
अरविंद सुब्रमण्यन: भविष्य की वित्तीय सुनामी से मुक्ति का रास्ता सुझाने वाला चिंतक

मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद अक्सर ही विवादों से घिर जाता है। कुछ लोग इसे केवल वित्त मंत्री का एक सहयोगी भर मानते हैं तो कुछ लोग इस पद को आर्थिक परेशानियों से निजात दिलाने वाले मुख्य सरकारी सलाहकार के रूप में देखते हैं। आप चाहें जैसे इसे देखें लेकिन मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमण्यन का दायित्व खासकर 2008 के लेहमैन संकट के तुरंत बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में उनकी खुद की भविष्यवाणी को देखते हुए बहुत आसान नहीं होगा।

17 अक्तूबर 2014
श्रमेव जयते : राष्ट्र निर्माण का मोदी का नया मंत्र

धरोहर के रूप में रोजगारविहीन विकास की विरासत पाना किसी भी नई सरकार के लिए बहुत खुशगवार बात नहीं हो सकती। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने इस बड़ी चुनौती को कुछ अहम श्रम सुधारों के आगाज के एक अवसर के रूप में लिया है।

15 अक्तूबर 2014
मुद्रास्फीति 5 वर्ष के निचले स्तर पर, रिजर्व बैंक अब तो छोड़े हठ

इसमें तो कोई संदेह नहीं कि महंगाई दर से खौफजदा रघुराम राजन को आर्थिक विकास की जरूरतों की बहुत परवाह नहीं रही है, पर सवाल यह है कि क्या भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति के बेहद निम्न आंकड़ों को भी नजरअंदाज कर रहा है?

14 अक्तूबर 2014
सरकार को मुद्रास्फीति का लक्ष्य निर्धारित करने की जरूरत

मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की पिछले चार वर्षों से ब्याज दरों पर गिद्ध दृष्टि रही है। चुने हुए प्रतिनिधियों और सरकार के प्रतिरोध के बावजूद रिजर्व बैंक ने सख्त मौद्रिक नीति बरकरार रखी है। पर त्रासदी यह है कि इस गिद्ध दृष्टि का महंगाई पर कोई अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ा है क्योंकि मुद्रास्फीति दर लगातार उंची बनी हुई है।

10 अक्तूबर 2014
भारत में बैंकिंग के नए युग का सूत्रपात

भारतीय बैंकिंग प्रणाली वर्तमान में कुछ असामान्य संरचनात्मक बदलावों से गुजर रही है और स्वाभाविक रूप से जिस एक की चर्चा फिजां में ज्यादा गूंज रही है उसका नाम 'विभेदी बैंक' है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन इस व्यावहारिक विचार के समर्थक बताये जाते हैं।

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