गवर्नेंस

5 सितम्बर 2014
एलआईसी कर रही गरीबों के बीमा से परहेज

सरकार द्वारा संचालित लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन अर्थात एलआईसी, जो देश में दो तिहाई जीवन बीमा व्यवसाय को नियंत्रित करती है, ने प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत प्रस्तावित 30,000 जीवन बीमा की लागत का बोझ उठाने में अनिच्छा जाहिर की है।

15 सितम्बर 2014
आपदाओं से निपटने में अब भी बेहद पीछे है देश

भारत इस मायने में वाकई बदकिस्मत है कि देश के किसी न किसी हिस्से में नियमित अंतराल पर भयानक प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं जिनसे बड़े पैमाने पर जान और माल की हानि होती है।

3 सितम्बर 2014
योजना आयोग के साथ ‘वीआरएस‘ शुरू करने का आ गया है वक्त

जब से मोदी सरकार 26 मई से सत्ता में आई है, योजना आयोग में सन्नाटा पसरा हुआ है। योजना आयोग और इसके सहयोगी ऑफिसों में काम करने वाले लगभग 1,200 लोगों के पास मुश्किल से ही कोई उत्पादक काम है।

19 सितम्बर 2014
आर्थिक आंकड़ों को मापने के तरीके दुरूस्त करने की जरूरत

जीडीपी, औद्योगिक उत्पादन और महंगाई दर जैसे सूक्ष्म आर्थिक आंकड़ों में व्यापक उतार चढ़ाव और बड़े संशोधन इन संख्याओं की साख को लेकर सवाल खड़े करते हैं। पिछले दो वर्षो के दौरान आर्थिक विकास, औद्योगिक उत्पादन, विदेश व्यापार और महंगाई दर आंकड़ों में कई बार और काफी बड़े संशोधन हुए हैं। इसके अतिरिक्त, महीना दर महीना और तिमाही दर तिमाही आधार पर इन आंकड़ों में होने वाले बड़े उतार चढ़ावों ने इनकी साख को भी धक्का पहुंचाया है।

04 सितंबर 2014
क्या तरलता संकट की तरफ बढ़ रहे हैं भारतीय बैंक?

आज के दौर में, जब फिजां में चारों तरफ वित्तीय समावेश की ही चर्चा है, बड़े उद्योगपतियों द्वारा किए जाने वाले डिफॉल्ट की घटनाओं ने एक बार फिर से भारतीय बैंकों के बैलेंस शीट की विकट होती स्थिति पर ध्यान देने को मजबूर कर दिया है। यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया द्वारा शराब के सरताज विजय माल्या को ‘हठी डिफॉल्टर‘ घोषित किया जाना बैंकों पर बढ़ते दबाव को रेखांकित करता है।

22 सितम्बर 2014
‘नीति जड़ता‘ दूर करने के लिए वित्तीय सलाहकार पदों का खात्मा जरूरी

भारत में आर्थिक सुधारों से संबंधित विचाराधीन कार्यों में एक अहम कार्य व्यय की प्रक्रिया और प्रबंधन से जुड़ा है। सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में व्यय सुधारों के विभिन्न पहलुओं पर गौर करने और राजकोषीय अनुशासन को बेहतर बनाने के रास्ते सुझाने के लिए एक पैनल नियुक्त किया है।


खाद्य सुरक्षा के लिए करें गुजरात मॉडल का अनुसरण

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारतीय श्रम बल का 54 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा कृषि से जुड़ा हुआ है। पिछले 20 वर्षों से हम कृषि में 4 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं और विफल हो रहे हैं। जब से सुधारों का दौर शुरू हुआ तब से ही कृषि की विकास दर 3.2 से 3.3 फीसदी के इर्द-गिर्द मंडराती रही है।

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