आपदाओं से निपटने में अब भी बेहद पीछे है देश

बी के झा, विशेष संवाददाता, इनक्लुजन

जम्मू और कश्मीर में बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुंचाते सेना के जवान

भारत इस मायने में वाकई बदकिस्मत है कि देश के किसी न किसी हिस्से में नियमित अंतराल पर भयानक प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं जिनसे बड़े पैमाने पर जान और माल की हानि होती है।

पिछले साल उत्तराखंड पर प्रकृति का कहर टूटा था जब प्रलयंकारी बाढ़ और भूस्खलन से भारी मात्रा में जान और माल की हानि हुई थी। राज्य में 5,000 से ज्यादा लोगों की जानें गई थीं जबकि 3,500 करोड़ रूपये से ज्यादा की संपत्ति का नुकसान हुआ था।

इस साल भी प्रकृति की ऐसी ही आपदा जम्मू कश्मीर पर टूटी जिसमें 250 से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी है और यह संख्या हर रोज तेजी से बढती जा रही है। उत्तराखंड की ही तरह जम्मू कश्मीर में बाढ़ की यह आपदा निश्चित रूप से यह संदेश देता है कि देश कुल मिलाकर अभी ऐसी आपदाओं से जिले से लेकर राष्ट्ीय स्तर पर अपने स्थापित संस्थागत तंत्र के जरिये शीघ्रता से निपटने के लिए तैयार नहीं है।

बदकिस्मती की बात है कि भारत एक कारगर आपदा प्रबंधन की चुनौती से निपटने के लिए तैयार नहीं है जबकि इसके पास राष्ट्ीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अर्थात एनडीएमए नामक एक राष्ट्ीय संगठन है जिसके जिम्मे केंद्र से लेकर जिला स्तर तक समेकित तरीके से आपदा प्रबंध रणनीतियां बनाने तथा उन्हें क्रियान्वित करने का दायित्व है। केवल गुजरात, उड़ीसा जैसे कुछ ही राज्य खुद अपनी पहल, संस्थानों तथा तैयारी के साथ ऐसी किसी आपदा से कारगर तरीके से निपट पाते हैं।

बदकिस्मती से एनडीएमए तथा ज्यादातर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणें निर्रथक साबित हुई हैं और यह जरूरी है कि इसका पूरे नए तरीके से पुनगर्ठन और परिवर्तन का प्रयास किया जाए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी योजना आयोग और एनडीएमए समेत कुछ राष्ट्ीय संगठनों की अनुपयोगिता से अच्छी तरह वाकिफ हैं। जैसे ही उन्होंने सत्ता संभाली, उन्होंने ऐसे अनुपयोगी राष्ट्ीय संगठनों को समाप्त करने की सरकार की इच्छा का संकेत दे दिया। एनडीएमए के सदस्यों को इस्तीफा देने का निर्देश देकर उन्होंने पुनगर्ठन की गति तय कर दी। जम्मू कश्मीर की आपदा से निपटने में उसके  दयनीय प्रदर्शन को देखकर लगता है कि एनडीएमए ने अपने खात्मे या पुनगर्ठन की प्रक्रिया में और तेजी ला दी है।

आपदाओं की रोकथाम, उनसे निपटने की तैयारी और सरकार के विभिन्न विभागों की भूमिका और जिम्मेदारियों के लिए दिशानिर्देश निर्धारण के लिए एक राष्ट्ीय आपदा योजना बनाने की जरूरत है।

अगर गृह मंत्रालय या कोई थिंकटैंक नीति संबंधित मामलों का संचालन कर सकता है तो एनडीआरएफ जोकि बढिया काम कर रहा है और जिसने आपदा के बाद के प्रबंधन में अपनी विशेषज्ञता और कुशलता साबित की है, को मुख्य दायित्व सौंप दिया जाना चाहिए। निश्चित रूप से एक राष्ट्ीय नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करने के लिए इसे अधिक संसाधनों की जरूरत होगी क्योंकि जिस तरह की आपदाओं का हम सामना कर रहे हैं, उनसे पेशेवर तरीके से निपटने में यह ज्यादा दक्ष है।

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