किस्मत के धनी, मोदी और धोनी

ज्ञानेन्द्र केशरी, कार्यकारी संपादक, इनक्लुजन

ऐसा अक्सर कहा जाता है कि भारत में दो सबसे अहम काम दो चैंपियनों-भारत केे प्रधानमंत्री और राष्ट्ीय क्रिकेट टीम के कप्तान के हैं। राजनीति और क्रिकेट, इन्हीं दोनों का नशा औसत भारतीयों के दिलो-दिमाग पर छाया रहता है। चाहे इलीट कहे जाने वाले लोगों का सामाजिक जमावड़ा हो या फिर सड़क के किनारे ढाबों पर बैठे निठल्ले, या फिर किसी बस या ट्ेन में यात्रा कर रहे लोग। उनकी बातचीत या बहस का सबसे आम मुद्वा या तो राजनीति होती है या फिर क्रिकेट।

बहरहाल, यहां फोकस राजनीति और क्रिकेट के बीच किसी तुलना पर नहीं है। मैं केवल इन दोनों क्षेत्रों के कप्तानों की सफलता के बीच एक समानता देखने की कोशिश कर रहा हूं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निश्चित रूप से भारतीय राजनीति के कप्तान हैं। उन्होंने अपनी पार्टी या यूं कहें टीम को अच्छे दिनों के वादे पर आम चुनावों में आशातीत सफलता दिलाई। आंकड़ों से ऐसा प्रतीत होता है कि अच्छे दिन बस आने वाले ही हैं। बहुत से लोगों का ऐसा भी तर्क है कि किस्मत की देवी मोदी पर मेहरबान हैं और कई ऐसे क्षेत्रों में भी खुशहाली दिख रही है जहां मोदी ने कुछ किया भी नहीं है।

यही वजह है जो मुझे मोदी और राष्ट्ीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के बीच एक समानता ढंूढने को विवश करती है। दोनों ही साधारण पृष्ठभूमि से ताल्लुकात रखते हैं, दोनों में ही नेतृत्व की महान काबिलियत है, उनका फोकस कॉमन सेंस या व्यावहारिक बुद्वि पर रहता है और इनमें से ज्यादातर भारत के लिए खुशकिस्मत साबित हुए हैं।

2011 में हुए वर्ल्ड कप फाइनल में, जब भारत श्रीलंका के खिलाफ तीसरा विकेट खो चुका था, बहुत अच्छे फॉर्म में न रहने के बावजूद धोनी सबको चकित करते हुए खुद को बैटिंग ऑर्डर में प्रमोट कर बल्लेबाजी के लिए आगे आया। उसने न केवल खुद को सही साबित किया बल्कि 79 गेदों में 91 अविजित रन भी बनाए और छक्के के साथ खेल खत्म किया। इसकी बदौलत भारत 28 वर्षों के बाद पहली बार वर्ल्ड कप जीतने में कामयाब रहा। धोनी ने कई बार कुछ अलग फैसला करते हुए टीम को जीत दिलाई है। ज्यादातर बार आलोचकों और विश्लेषकों ने इसे केवल किस्मत करार दिया है।

आखिर कौन सी चीज धोनी को एक कामयाब कप्तान बनाती है? उसने कभी भी किसी असाधारण सुनियोजित दांव का परिचय नहीं दिया है। उसका नेतृत्व सहज या व्यावहारिक बुद्वि और शांतचित्तता से प्रेरित होता है जो कभी भी लगातार अरबों लोगों के ध्यान में होने या आलोचना से नहीं डिगता।

प्रधानमंत्री मोदी भी आज किस्मत के ऐसे ही रथ पर सवार दिखते हैं। देश में न तो कोई क्रांतिकारी बदलाव दिख रहा है और न ही कोई बड़ा सुधार जैसाकि कई स्वयं-घोषित सलाहकारों या विश्लेषकों ने अनुमान लगाया था या अनुशंसा की थी। अभी तक मोदी मूलभूत चीजों और सहज बुद्वि का ही उपयोग करते दिखते हैं। इसकी वजह से सकारात्मक परिणाम भी दिख रहे हैं और हाल के आंकड़े ऐसा संकेत देते प्रतीत हो रहे हैं कि अच्छे दिन आ रहे हैं। जीडीपी विकास दर तीन वर्षों के उच्च स्तर पर है, मुद्रास्फीति में कमी आई है, रूपया स्थिर हुआ है, विदेशी मुद्रा भंडार उछल गया है और शेयर बाजार के सूचकांक आसमान छूने लगे हैं।

आलोचकों और विश्लेषकों का तर्क है कि वृहद आर्थिक आंकड़ों में बेहतरी केवल किस्मत की बात है न कि मोदी सरकार के कार्यों का प्रतिफल, जिसने बमुश्किल साढ़े तीन महीने पहले सत्ता पाई है।

सबसे पहले हम आर्थिक विकास आंकड़ों का विश्लेषण करें। भारत का सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी चालू वित वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 5.7 फीसदी की दर से बढ़ा जोकि दो वर्षों से अधिक के समय में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। मोदी 26 मई को प्रधानमंत्री बने। यह आंकड़ा अप्रैल से जून की अवधि को कवर करता है। जिन 91 दिनों से जीडीपी का यह आंकड़ा संबंधित है, उनमें मोदी सत्ता में केवल 35 दिन रहे हैं। उस अवधि के दौरान उनके अधिकांश मंत्रियों को उनके मंत्रालयों को समझने का भी पूरा वक्त नहीं मिला होगा, इसलिए आर्थिक विकास दर में तेजी के लिए उन्हें कोई श्रेय देना उचित नहीं होगा।

बहरहाल, ये आंकड़े अगस्त के आखिर में आए और देश के आम लोगों के लिए यह मोदी सरकार की उपलब्धि है। निश्चित रूप से यह किस्मत की बात है बजाये अच्छे प्रबंधन या सुधारों के। इसका असर जुलाई-सितंबर तथा उसके बाद की तिमाहियों में दिखेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मोदी जीडीपी आंकड़ों को लेकर उसके बाद की तिमाहियों में भी उतने ही खुशकिस्मत साबित होंगे?

शेयर बाजारों में उछाल, रूपये में स्थिरता, मुद्रास्फीति, विदेशी मुद्रा भंडार और सकारात्मक राजकोषीय और चालू खाता घाटों के आंकड़े सभी वैश्विक अर्थव्यवस्था में सकारात्मक घटनाक्रमों से जुड़े हैं।

यहां भी किस्मत की देवी मोदी पर मेहरबान दिखती हैं। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुकी हैं जो साल के प्रारंभ में 115 डॉलर प्रति बैरल थी। सोना और चांदी समेत अन्य वस्तुओं की कीमतें नरम हुई हैं। इससे तेल और उर्वरक सब्सिडियों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी तथा व्यापार घाटा कम होगा। चालू खाता घाटा, जो पिछले वित वर्ष की इस अवधि के दौरान चिंता का एक बड़ा सबब था, वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी तथा निम्नतर सोना आयात के कारण अच्छी स्थिति में दिख रहा है।

2013 के प्रारंभ में प्रोत्साहन पैकेज को रोकने और फेडेरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी के संकेतों की वजह से भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं से भारी मात्रा में धन का आउटफ्लो हुआ था। इसके परिणामस्वरूप, रूपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 68 पर आ गया था और विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजारों से हाथ खींच लिया था। तत्कालीन वित मंत्री पी चिदंबरम ने आर्थिक बदहाली के लिए बाहरी कारकों को जिम्मेदार ठहराया था।

इसमें कोई शक नहीं कि वृहद आर्थिक आंकड़े आज बेहतर दिख रहे हैं, वजह चाहे कुछ भी रही हो। जरूरत है कि वास्तविक तेजी बरकरार रखी जाए, केवल भाग्य के भरोसे न रहा जाए। 

comments powered by Disqus