योजना आयोग के साथ ‘वीआरएस‘ शुरू करने का आ गया है वक्त

ज्ञानेन्द्र केशरी, कार्यकारी संपादक, इनक्लुजन

योजना आयोग के पास 31 टेक्निकल डिवीजन हैं। इनमें कृषि, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, संचार और सूचना प्रौद्योगिकी शामिल हैं

जब से मोदी सरकार 26 मई से सत्ता में आई है, योजना आयोग में सन्नाटा पसरा हुआ है। योजना आयोग और इसके सहयोगी ऑफिसों में काम करने वाले लगभग 1,200 लोगों के पास मुश्किल से ही कोई उत्पादक काम है।

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से राष्ट् के नाम अपने पहले संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की कि एक नए डिजायन और संरचना के साथ एक नया संस्थान योजना आयोग की जगह लेगा। इस नए संस्थान का अभी नाम तय नहीं किया गया है और न ही इसके बारे में कोई स्पष्टता है कि इसका आकार क्या होगा और इसकी रूपरेखा क्या होगी?

राजनीति, अर्थशास्त्र, शिक्षा और मीडिया क्षेत्रों से जुड़े कुछ विख्यात हस्तियों की नए संस्थान पर विचार विमर्श करने के लिए योजना भवन में 26 अगस्त को अर्थात नई सरकार के गठन के ठीक तीन महीने बाद एक बैठक हुई। बहरहाल, योजना आयोग से जुड़े लगभग 1,200 लोगों का भाग्य अब भी अधर में लटका हुआ है। सरकार इसे जो भी आकार देना चाहे, इसमें ताजे विचार के साथ नए लोग ही होने चाहिए।

निश्चित रूप से, योजना आयोग में कार्यरत 1,200 लोगों के उसमें बने रहने के आसार कम हैं क्योंकि जिन क्षेत्रों में उनकी विशेषज्ञता रही है, वह अब आज की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में उत्पादक नहीं रह गई है। इसलिए, शायद अब समय आ गया है कि इस मुद्वे पर विवेकपूर्ण तरीके से विचार किया जाए और उनके लिए स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति अर्थात वीआरएस जैसे व्यावहारिक समाधान का रास्ता निकाला जाए। निश्चित रूप से, उनमें से काफी लोग वीआरएस का चयन करेंगे। योजना आयोग को सरकार के ऐसे अनुत्पादक अंगों को बंद करने की शुरूआत कर देनी चाहिए। यह कहना शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी कि योजना आयोग जैसे संस्थान सरकारी खजाने पर बोझ हैं। सरकार को निश्चित रूप से संसाधनों के प्रवाह को ज्यादा उत्पादक अंगों की तरफ मोड़ना चाहिए तथा ऐसे सेगमेंट का आकार छोटा कर या बंद कर देना चाहिए जो सरकारी खजाने पर अनुचित बोझ हैं।

योजना आयोग के पास 31 टेक्निकल डिवीजन हैं। इनमें कृषि, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, परिवार कल्याण एवं पोषण, संचार और सूचना प्रौद्योगिकी पर डिवीजन शामिल हैं। इनमें से सभी के मंत्रालयों में अलग विभाग हैं। निश्चित रूप से ऐसे टेक्निकल डिवीजनों का गठन महज एक दुहराव था जो संबंधित मंत्रालयों खुद विभागों द्वारा ही किया जाना चाहिए था। आयोग के पास प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद अर्थात पीएमईएसी और यूआईडीएआई जैसे कुछ ऑफिस भी हैं। जहां पीएमईएसी के भंग होने के आसार हैं यूआईडीएआई एक अलग संस्था के बतौर काम कर सकती है। केवल योजना आयोग ही नहीं, कई अन्य सरकारी विभागों और संस्थाओं के भी पुनर्गठन की जरूरत है। जिन विभागों और मंत्रालयों में कर्मचारियों की संख्या में उल्लेखनीय कटौती की जरूरत है, उनमें नेशनल इनफार्मेटिक्स सेंटर अर्थात एनआईसी तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय और कृषि मंत्रालय से संबंधित कई विभाग और संस्थाएं शामिल हैं।

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