पीयूष गोयल ने 24 घंटे बिजली की आपूर्ति के लिए कसी कमर

बी के झा, विशेष संवाददाता, इनक्लुजन

केंद्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल ने देश में बिजली संकट को खत्म करने और 24 घंटे निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कमर कस ली है। बेशक, यह काम आसान नहीं है और ढेर सारी दुश्वारियां और चुनौतियां इस राह में हैं पर बिजली मंत्री पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि कम से कम कुछ राज्यों में उनकी यह महत्वाकांक्षी योजना जल्द ही आकार ले ले। उन्होंने इस काम को अंजाम देने के लिए कई रोडमैप तैयार कर रखे हैं पर फिलहाल इस बाबत वह अपने पत्ते खोलना नहीं चाहते।

पीयूष गोयल मानते हैं कि कोयले की आपूर्ति उनके ख्वाबों को हकीकत में बदलने की राह में बड़ा रोड़ा साबित हो सकती है पर इससे निपटने की योजना भी उनके पास है जो अगले चार वर्षों के दौरान कोयले के उत्पादन को दोगुना करके इसे मौजूदा 500 एमटी से 1 अरब टन करने से हल हो सकती है।

बहरहाल, बिजली मंत्रालय राष्ट्ीय राजधानी को निर्बाध बिजली मुहैया कराने के लिए 7,700 करोड़ रूपये खर्च करेगा। बिजली की पारेषण और वितरण प्रणालियों को मजबूत बनाने के लिए बिजली मंत्री के पास एक और ब्लू प्रिंट है और उस दिशा में वह 75,000 करोड़ रूपये खर्च करेंगे।

बिजली क्षेत्र की अहम चुनौतियां:

  • खनन योग्य संसाधनों की मात्रा लगभग 116 अरब टन आंकी गई है जबकि देश में केवल 1 अरब टन का ही खनन हो रहा है
  • कोल ब्लॉक्स पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का परिणाम 218 कोल ब्लॉक के आवंटन के रद्व होने के रूप में सामने आ सकता है जिससे 2 लाख करोड़ रूपये का निवेश प्रभावित होगा
  • कोयला आधारित संयंत्रों के कोल स्टॉक अब सात दिनों के भंडार से भी कम के बराबर रह गए हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, स्टॉक के स्तर 2012 के मध्य से ही निम्नतम स्तर पर हैं जब देश के एक बड़े हिस्से को बगैर बिजली के रहना पड़ा था और लाखों घर अंधकार में डूब गए थे
  • देश में बिजली की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी एनटीपीसी लगातार ईधन की कमी से जूझ रही है और पूरे देश में इसके 23 थर्मल संयंत्रों में से कम से कम 6 की स्थिति गंभीर है
  • कोल इंडिया से, जोकि भारत के कोल उत्पादन में कम सेे कम 80 फीसदी का योगदान देता है, कम आपूर्ति के कारण संयंत्रों में ईंधन की कमी हो गई है। कोल इंडिया के लिए बिजली क्षेत्र की कोल की बढ़ती मांग की पूर्ति करना बेहद मुश्किल हो गया है
  • 7,230 मेगावाट क्षमता तथा 36,000 करोड़ रूपये के निवेश की लगभग 12 बड़ी बिजली परियोजनाएं कोयले की कमी के कारण अवरूद्ध पड़ी हैं
  • कोयले की किल्लत आयात पर निर्भरता बढ़ा रही है। आयात महंगा पड़ता है इसलिए प्रति यूनिट बिजली की लागत भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ रही है
  • सरकारी तथा निजी दोनों ही क्षेत्र की कंपनियां पर्यावरण तथा वन मंजूरी, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास तथा कानून और व्यवस्था मुद्वों की वजह से उत्पादन बढ़ाने में कठिनाइयों का सामना कर रही हैं

 

बिजली मंत्रालय ने स्थिति का सही तरीके से आकलन किया है और वह जानते हैं कि मौजूदा हालात जल्द ही एक बड़े बिजली संकट में तबदील हो जा सकते हैं। इसलिए, उन्होंने मौजूदा नीतियों की समीक्षा  और पुनर्गठन करने तथा इस सेक्टर के लिए लक्षित नई नीतियों को सशक्त बनाने के लिए कमर कस ली है। इसका प्रमाण यह है कि एक दिन पहले वह मीडिया के सामने अपने ब्लूप्रिंट और योजनाओं की बात करते हैं और अगले ही दिन अपने सलाहकार पैनल को अपने कार्यक्रमों और योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए एक सुस्पष्ट रोडमैप बनाने के काम पर लगा देते हैं।

गोयल भलीभांति जानते हैं कि भारत के विकास लक्ष्य अब पहले से कहीं ज्यादा व्यापक हैं, कोयले पर इसकी निर्भरता आगे भी बरकरार रहेगी और 2031-32 तक बिजली पैदा करने के लिए पांच गुना ज्यादा फॉसिल ईधन उत्पादन की जरूरत पड़ेगी जिससे कि 8 फीसदी की विकास दर को समर्थन मिल सके।

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