बैंक गरीबों को लूट कर अमीरों को कर रहे मालामाल

समीर कोचर, प्रधान संपादक, इनक्लुजन

अक्तूबर 2011 से पहले पूरे बैंकिंग सेक्टर में बचत खाताओं पर 4 फीसदी की सालाना ब्याज दर थी-पर विनियंत्रण के बावजूद इनमें बमुश्किल कोई बदलाव आया है

भारतीय रिजर्व बैंक ने अक्तूबर 2011 में जब बैंकों के बचत खाताओं की जमा ब्याज दरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया तो तो इसकी काफी सराहना की गई और ऐसा माना गया कि यह एक आर्थिक सुधार की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है जो बचत खाताधारकों को बेहतर रिटर्न सुनिश्चित करेगा। लगभग चार साल गुजर चुके हैं पर ऐसी जमाओं पर ब्याज दरों में शायद ही कोई बदलाव हुआ है।

त्ीन बैंकों-यस बैंक, कोटक महेंद्रा बैंक और इंडसइंड बैंक को छोड़ दिया जाए तो  सभी प्रमुख बैंकों ने बचत खाता जमाओं पर वही ब्याज दर बनाये रखी है जो वे 25 अक्तूबर 2011 को रिजर्व बैंक द्वारा घोषित डीरेगुलेशन अर्थात विनियंत्रण से पहले दिया करते थे।

इससे भी ज्यादा परेशान करने वाला मसला सरकारी तथा निजी दोनों ही क्षेत्रों के बैंकों द्वारा ब्याज दरों में जारी एकरूपता है। ऐसा लगता है मानो बैंकों के बीच एक तरह की गिरोहबंदी या कार्टेलाइजेशन व्याप्त है।

भारतीय स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, सिटीबैंक, एचएसबीसी बैंक और आईडीबीआई बैंक जैसे सभी प्रमुख बैंक बिल्कुल समान -4 फीसदी की ब्याज दर देते हैं।

निजी क्षेत्र का यस बैंक बचत जमाओं पर सबसे ज्यादा ब्याज दर देता है। यह 1 लाख रूपये से कम की जमाओं पर सालाना 6 फीसदी की ब्याज देता है जबकि 1 लाख रूपये से ज्यादा की जमाओं पर ब्याज दर 7 फीसदी है। कोटक महेंद्रा बैंक और इंडसइंड बैंक दोनों ही 1 लाख रूपये से कम की जमाओं पर सालाना 5.5  फीसदी की ब्याज देते हैं जबकि 1 लाख रूपये से ज्यादा की जमाओं पर उनकी  ब्याज दर 6 फीसदी है।

अक्तूबर 2011 से पहले, बचत खाताओं पर हर जगह 4 फीसदी की ब्याज दर थी- जो काफी हद तक अभी तक अपरिवर्तित ही रहा है।

इसके विपरीत, पिछले चार वर्षों में बैंकों द्वारा दी जाने वाली उधारी दरों में बेतहाशा उछाल आया है। देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक की बेंचमार्क प्राइम लेंडिंग दर या बीपीएलआर आज 14.75 फीसदी है। जनवरी 2011 में यह 12.75 फीसदी थी। स्टेट बैंक की बेस दर 10 फीसदी है। बेस दर वह ब्याज दर होती है जिससे कम पर बैंक उधारी नहीं दे सकते।

भारतीय बैंकिंग उद्योग में सबसे कम बेस दर 9.5 फीसदी है जो कैनरा बैंक देता है। ज्यादातर दूसरे बैंकों का बेस रेट 10 फीसदी या इससे अधिक है। इसका अर्थ यह हुआ कि बैंक 10 फीसदी से कम पर व्यावसायिक उधारी नहीं दे सकते। बीपीएलआर वह दर होती है जो व्यावसायिक बैंक अपने सबसे ज्यादा साख वाले ग्राहकों से लेती है। आईसीआईसीआई बैंक का बीपीएलआर 18.75 फीसदी है।

भारत में कुल बैंक जमाओं का लगभग 25 फीसदी बचत बैंक खाताओं में जमा है। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर हम बीपीएलआर और बचत जमाओं पर अदा ब्याज पर विचार करें तो बैंकों का ब्याज मार्जिन उनकी जमाओं के लगभग एक चौथाई  हिस्से पर 10 फीसदी से अधिक है। उदाहरण के लिए, भारतीय स्टेट बैंक बचत जमाओं पर 4 फीसदी का ब्याज अदा करता है और उसका बीपीएलआर 14.75 फीसदी है तो मार्जिन 10.75 फीसदी हुआ। आईसीआईसीआई बैंक के मामले में यह 14.75 फीसदी है।

बचत जमा एक मिश्रित यानी हाइब्रिड उत्पाद है जो किसी चालू खाते और किसी सावधि जमा खाते दोनों की विशेषताओं को जोड़ता है। जहां किसी चालू खाते का मुख्य काम ट्ांजेक्शन या लेन-देन है और कंपनियां, सार्वजनिक उद्यम और बिजनेस फर्म अपनी रोजाना की फंड जरूरतों की पूर्ति के लिए इसका उपयोग करती हैं, अधिकांश व्यक्ति या परिवार लेनदेन तथा बचत दोनों ही उद्वेश्यों के लिए बचत खाते का उपयोग करते हैं। ऐसी जमाओं का बड़ा हिस्सा कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले निर्धन व्यक्तियों और परिवारों का होता है।

प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत 15 करोड़ नए बचत बैंक खातों को खोले जाने का लक्ष्य है। इनमें से कम से कम साढ़े सात करोड़ खाते 26 जनवरी, 2015 से  पहले खोले जाने हैं। अगर हम बीमा और ओवरड्ाफ्ट जैसे अन्य प्रस्तावित लाभों को दरकिनार कर दें तो मुझे ताज्जुब होता है कि इस योजना का वास्तविक लाभ किसे पहंुचेगा? मान लीजिए, एक गरीब एक बचत खाता खोलता है और उसमें अपनी गाढ़ी कमाई से बचाए सारे पैसे जमा कर देता है। उसे उससे क्या प्राप्त होगा-4 फीसदी ब्याज? क्या इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि गरीब जमाकर्ता अपनी गाढ़ी कमाई से बचाए पैसे उन धनी और बड़े उद्योगपतियों की उधारी को सब्सिडाइज करने के लिए इस्तेमाल होने दे रहा है जो अपना शायद ही कोई पैसा बचत खाताओं में रखते हैं।

जब कई बड़े उद्योगपति कर्ज की अदायगी में आनाकानी कर रहे हैं और डिफॉल्ट कर रहे हैं तो ऐसा करना क्या कहीं से भी युक्तिसंगत है? आज भारतीय बैंकों के पास 10 लाख करोड़ रूपये के बराबर के दबाव वाले ऋण हैं जिनमें अलाभकारी कर्ज और पुनगर्ठित ऋण शामिल हैं जोकि बैंकों के कुल नेटवर्थ अर्थात कुल शुद्व संपत्ति से अधिक हैं।

बड़े उद्योगपतियों एवं तथाकथित हाई नेटवर्थ व्यक्तियों द्वारा लगातार किए जा रहे डिफॉल्ट की वजह से भारतीय बैकों के दबाव वाले कर्ज की संयुक्त राशि के चालू वित वर्ष के आखिर तक कुल एडवांस या अग्रिमों के 14 फीसदी तक पहुंच जाने की आशंका है जो मार्च 2014 में 10 फीसदी दर्ज की गई थी।

निश्चित रूप से अब समय आ गया है कि नियामक या रेगुलेटर्स बैंकों के बीच इस कार्टेलाइजेशन को तोड़ने के जरिये छोटे जमाकर्ताओं और गरीबों के ऐसे शोषण पर रोक लगाए और उन्हें वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया के प्रति ज्यादा जबावदेह बनाए।

comments powered by Disqus