कमजोर स्वास्थ्य सेवाएं कर देंगी जीडीपी लक्ष्य को दूर

गुरशरन धन्जल, संपादक, इनक्लुजन

तेजी से बढती जनसंख्या के बोझ, गरीबी और कमजोर बुनियादी ढांचे के कारण भारत के सामने शायद दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा चुनौती है

भारत की महत्वाकांक्षाएं आसमान छू रही हैं। ब्रिक्स देशों का अगुआ बनने से लेकर एफडीआई का पसंदीदा गंतव्य बनने, देश के सभी घरों को वित्तीय और डिजिटली तरीके से एकरूप या समावेशित करने की कवायद  और 2025 तक एक उच्चतर मध्य आय वर्ग वाले देश में शुमार होने की चाहत। लेकिन जब बात देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति की आती है तो सारा उत्साह मानों काफूर हो जाता है। इन सभी महत्वाकांक्षी योजनाओं की कामयाबी तभी है जब देश में स्वास्थ्य सेवाओं का एक मजबूत ढांचा तैयार हो और देश के सभी हिस्सों तक किफायती और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हो सके। अब जरा दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत की स्थिति पर गौर कीजिए। ब्राजील जैसे विकासशील देश में प्रति हजार लोगों पर अस्पतालों में बेड की उपलब्धता 2.3 है पर भारत में यह आंकड़ा केवल 0.7 को छू पाता है। श्रीलंका में यह आंकड़ा 3.6 का और चीन में 3.8 का है। डाक्टरों की उपलब्धता का वैश्विक औसत 1.3 है जबकि भारत में यह केवल 0.7 है। हमारे पास 400,000 डाक्टरों, 700,000 बेडों और लगभग 40 लाख नर्सों की कमी है।

प्रारंभिक स्वास्थ्य केंद्रों जिनके 30,000 की आबादीः और उप-केंद्रों जिनके 5,000 की आबादी को कवर करने की उम्मीद की जाती है, का या तो वजूद ही नहीं है या फिर जहां वे हैं, उनमें कर्मचारियों की भारी किल्लत है। केवल 38 फीसदी केंद्रों के पास आवश्यक कर्मचारी हैं और केवल 31 फीसदी के पास जरूरी सामान हैं। इस कमी के कारण ढंग से स्वास्थ्य सेवा सुलभ नहीं हो पाती। स्वास्थ्य सेवा वितरण में भी भारी असमानता है। हालांकि 73 फीसदी भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं पर 75 फीसदी से ज्यादा भारतीय डाक्टर शहर आधारित हैं। इससे भी ज्यादा त्रासदपूर्ण बात यह है कि 90 फीसदी से भी अधिक ग्रामीण आबादी को बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के लिए न्यूनतम 8 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है।

जनसंख्या के बोझ, गरीबी और निम्न बुनियादी ढांचे का अर्थ यह हुआ कि हमें शायद दुनिया के सबसे भारी बीमारी के बोझ का सामना करना पड़ता है। भारत की चुनौती संक्रामक और असंक्रामक बीमारियों, कैंसर, मधुमेह और तपेदिक में बढोतरी से मौतों की बढती संख्या है। उदाहरण के लिए, भारत में मधुमेह के मामलों की संख्या पहले 2020 तक 3.6 करोड़ आंकी गई थी, अब यह 7.5 करोड़ से पहले ही आगे निकल चुकी है। जल्द ही दुनिया में हर पांच मधुमेह के रोगियों में एक भारतीय होगा।

दूसरी चुनौती तपेदिक या टीबी है। भारत दुनिया में तपेदिक का सबसे ज्यादा बोझ वाला देश है जहां वैश्विक स्तर पर एक चौथाई मामले होते हैं और 2012 में अनुमानित 87 लाख सालाना वैश्विक मामलों में 20 से 24 लाख मामले भारत से संबंधित थे। भारत में कुल 26 फीसदी टीबी मरीज हैं।

भारत में स्वास्थ्य सेवा खर्च का 70 फीसदी निजी क्षेत्र से आता है जबकि वैश्विक औसत 38 फीसदी है और जब विकसित देशों के साथ तुलना की जाए तो यह आंकड़ा और भी ज्यादा है। इसके अलावा, निजी व्यय का 86 फीसदी तक अपनी जेब से चुकाना होता है जो यह प्रदर्शित करता है कि देश में बीमा की पैठ कितनी कम है। भारत कुल स्वास्थ्य सेवा खर्च और बुनियादी ढांचे की आपूर्ति दोनों के ही लिहाज से कई विकसित और विकासशील देशों से अब भी पीछे है।

ज्हां सरकार जीएसटी, निजीकरण, सब्सिडियों, श्रम, प्रतिरक्षा, बीमा, बैकिंग, कोयला, बिजली और गैस मूल्य निर्धारण से संबंधित सुधारों पर फोकस कर रही है, बहुप्रतीक्षित और बेहद जरूरी स्वास्थ्य सुधारों पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है जिससे एक स्वस्थ देश का निर्माण सुनिश्चित किया जा सके। इसके अतिरिक्त, अगले कुछ वर्षों में जीवन प्रत्याशा में बढोतरी के कारण बड़ी संख्या में भारतीय 65 वर्ष की उम्र पार कर जाएंगे। उम्रदराज हो रही आबादी को सुविधाएं और स्वास्थ्य सेवा समेत उन्हें आवश्यक सामाजिक सुरक्षा देने की दिशा में बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है।

योजना आयोग के अनुसार, 44,000 डाक्टरों की बढी हुई सप्लाई भी वर्ष 2020 की अनुमानित मांग के केवल 78 फीसदी हिस्से की ही पूर्ति कर पाएगी जिससे प्रति हजार लोगों पर 0.3 डाक्टरों का अंतर तब भी शेष रह ही जाएगा। भारत में मेडिकल टूरिज्म के लिए तेजी से बढ़ती मांग के मुकाबले जरा इस पर विचार करें। भारतीय मेडिकल टूरिज्म इंडस्ट्ी सालाना 20 फीसदी की स्वास्थ्य देखभाल खर्च दर से बढ़ रही है जिसके 2018 तक 6 अरब डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद है। इससे भारत आने वाले मेडिकल पर्यटकों की संख्या मौजूदा 230,000 से बढ़कर 400,000 हो जाएगी। यह बाजार व्यवसाय के लिए आकर्षक तो है पर कितनी और किसकी कीमत पर ? और मौजूदा वृद्वि दर से स्वास्थ्य सेवा उद्योग न केवल भारत के गरीबों की कम सेवा कर पाएगा बल्कि मेडिकल पर्यटकों की उससे भी कम सेवा कर पाएगा जिनमें विदेशी पूंजी लाने की काफी क्षमता है।

अभी तक क्लिनिकल और सुविधा आधारित स्वास्थ्य सेवा के लिए ही फाइनेंसिंग या वित्त पोषण पर काफी फोकस रहा है और इस प्रक्रिया में रोगों से बचाव, उनकी रोकथाम और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यों की अनदेखी कर दी गई है।

इतना ही महत्वपूर्ण कार्य स्वच्छता तथा सफाई व्यवस्था पर लोगों को शिक्षित बनाना है। संक्रामक एवं पुरानी दोनों ही प्रकार की बीमारियों के लिए सरकारी कदमों के जरिये रोकथाम जरूरी है। इससे समाज को ज्यादा लाभ पहुंचता है बजाये इसके कि बड़े पैमाने पर सृजित की गई महंगी सुविधाओं के।

स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश के साथ साथ प्रणालीगत सुधारों की भी आवश्यकता है जो नियंत्रण और निगरानी के मुद्वों समेत सेवा प्रदान करने की मौजूदा व्यवस्था की पूरी तरीके से जांच करके इसमें सकारात्मक बदलाव लाए। शायद अब समय आ गया है कि देश को स्वास्थ्य मंत्रालय के तत्वाधान में एक राष्ट्ीय स्वास्थ्य नियामक की जरूरत पड़े जो सार्वभौमिक स्वास्थ्य मुद्वों की निगरानी करे तथा उसमें आवश्यक तेजी लाए।

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