मोदी की ‘डिजिटल इंडिया योजना:113,000 करोड़ रूपये की बर्बादी ?

समीर कोचर, प्रधान संपादक, इनक्लुजन

मीडिया में डिजिटल इंडिया पर कई तरह की खबरें आ रही हैं जिनमें इसे आधी-अधूरी योजना और करदाताओं के पैसे की बर्बादी करार दिया जा रहा है। भारत की पहली राष्ट्ीय ई-गवर्नेंस योजना 2004 में शुरू हुई और फिर कपिल सिब्बल के नेतृत्व वाले संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा इसका पुर्नअवतार किया गया। पर इसके दोनों ही प्रयासों में करोड़ों रूपये की बर्बादी हुई और शायद ही कोई प्रगति हुई। इसे देखते हुए किसी का भी मोदी की डिजिटल इंडिया के लिए 113,000 करोड़ रूपये के निवेश की योजना को लेकर संशय करना निहायत लाजिमी है जिससे संबंधित विवरणों को सरकार ने अबतक गोपनीय बना रखा है।

मेरे विचार से डिजिटल इंडिया पिछले दशक के दौरान ई-गवर्नेंस योजना 1 और 2 के एक हिस्से के रूप में संप्रग शासनकाल के तहत मंजूर तथा इलेक्ट्निक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग तथा दूरसंचार विभाग की योजनाओं के लिए पहले से ही प्रतिबद्ध 100,000 करोड़ रूपये के लिए एक रिकवरी या वसूली योजना है। यह अच्छे शासन के लिए इन सुस्त पड़ी योजनाओं को उबारने तथा इनमें किए गए निवेश को वास्तव में उपयोग में लाने की एक रणनीति है। इसमें नई रणनीतियों और गतिविधियों पर अतिरिक्त 13,000 करोड़ रूपये की लागत आएगी और भारत के लिए दुनिया के अन्य देशों के समकक्ष घरेलू स्तर पर आईसीटी के एक बड़े उपयोगकर्ता होने और एक वैश्विक साफ्टवेयर नेता के रूप में उभरने की इज्जत तथा गर्व का अवसर प्राप्त होगा।

संप्रग 1 की सरकार ने एक दशक पहले राष्ट्ीय ई-गवर्नेंस योजना का सूत्रपात किया था। मैंने तब भी इसकी संवैधानिक वैधता को लेकर सवाल उठाया था जो पंचायती राज संस्थानों तथा अन्य स्थानीय निकायों के कामकाज को बिना उन्हें कोई अधिकार दिए निजी क्षेत्र को आउटसोर्स कर रही थी। पांच साल बाद तथा हजारों करोड़ रूपये की बर्बादी के उपरांत सरकार नेे इसकी केवल एक सामान्य ढांचा प्रदाता की भूमिका रहने दी। राष्ट्ीय ई-गवर्नेंस योजना से मिला पहला सबक पंचायती राज तथा स्थानीय निकायों को साथ लेकर चलने के महत्व से जुड़ा था। गुजरात इस मॉडल का अनुकरण ई-ग्राम के तहत एक दशक पहले ही सफलतापूर्वक कर चुका था। राष्ट्ीय ई-गवर्नेंस योजना की दूसरी गलती हार्डवेयर खरीदने और बिना किसी ऐप्लीकेशन की मौजूदगी के चैनल स्थापित करने की थी।

संप्रग 2 की सरकार के तहत सिब्बल के कार्यकाल के दौरान विभाग ने महसूस किया कि वह केवल ढांचा मुहैया कराने वाला है, इसलिए उसने केवल राज्य व्यापी एरिया नेटवर्क अर्थात स्वान तथा राज्य डाटा केंद्रों की स्थापना के काम में तेजी लाने पर जोर दिया, लेकिन उसने उसमें भी पुरानी और कम क्षमता वाली प्रौद्योगिकियों का ही सहारा लिया।

अब जाकर जब रवि शंकर प्रसाद ने सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री का पदभार संभाला है, उन्होंने राज्यों के आईटी मंत्रियों एवं आईटी सचिवों के साथ गंभीर तथा लंबी मंत्रणा की और व्यवहारिक तथा त्वरित कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया।

यह हमारा दुर्भाग्य है कि नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क और नेशनल नॉलेज नेटवर्क अपने शिड्यूल से बहुत पीछे चल रहे हैं और नेशनल इनफार्मेटिक्स सेंटर भी अपनी प्रासंगिकता खो चुका है।

गुजरात में ई-गवर्नेंस का मजबूत ढांचा है और उसका आईटी और अन्य विभागों के साथ कोई मतभेद भी नहीं है। यह ऐसा राज्य है जो केवल अत्याधुनिक प्राद्योगिकी ही उपयोग में लाता है। निश्चित रूप से, मोदी की डिजिटल इंडिया को इन सबसे काफी प्रेरणा मिली है और आगे भी मिलेगी।

comments powered by Disqus