ब्रिक्स बैंक का लक्ष्य समानता हासिल करना, वैश्विक वित्तीय संस्थानों को चुनौती देना नहीं

अतुल के ठाकुर, सीनियर एसोसिएट एडीटर, इनक्लुजन

ब्रिक्स के इस दावे में खासी सच्चाई है कि अंतरराष्ट्ीय वित्तीय प्रणाली ने उनके हितों के खिलाफ काम किया है। राजन और दूसरे लोगों को इस सच्चाई को कबूल करनी चाहिए

ब्रिक्स बैंक के गठन के पीछे उद्वेश्य दीर्घकालिक परियोजनाओं को राशि तथा जोखिम से निपटने की पूंजी मुहैया कराना है। इसका लक्ष्य आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे मौजूदा बहुस्तरीय वित्तीय संस्थानों को चुनौती देना नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन नेे पिछले दिनों शिकागो में शिकागो कौंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स द्वारा आयोजित एक समारोह के दौरान अपने भाषण में यह बात कही।

गौरतलब है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों -ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने अति संकीर्ण नजरिये और डॉलर के आधिपत्य वाले विश्व बैंक और अंतरराष्ट्ीय मुद्रा कोष जैसे वित्तीय संस्थानों की वैश्विक मुद्रा प्रणाली से असंतुष्ट होकर एक नए डेवलपमेंट बैंक यानी एनडीबी और कांटिंजेंट रिजर्व एरेंजमेंट यानी सीआरए का गठन किया।

इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका का बहुपक्षीय संस्थानों में दबदबा रहा है और ब्रिक्स, जिसमें पांच बेहद शानदार आर्थिक प्रदर्शन करने वाले देश शामिल हैं और जिनका वैश्विक आर्थिक गतिविधि में 20 फीसदी से अधिक का योगदान है, का आईएमएफ में केवल 11 फीसदी वोट है। चिंता की बात यह है कि बदलते आर्थिक दौर में भी आईएमएफ ने अपना संकीर्ण नजरिया और पश्चिमी देशों के पक्ष में अपना झुकाव नहीं खत्म किया है। ब्रिक्स देशों के इस दावे में खासी सच्चाई है कि अंतरराष्ट्ीय वित्तीय प्रणाली ने उनके हितों के खिलाफ काम किया है। राजन और दूसरे लोगों को इस सच्चाई को कबूल करनी चाहिए।

ब्रिक्स देशों के नीति निर्माता धनी देशों के संस्थानों, जो ‘बहुपक्षीय एजेन्सियों‘ के आवरण में रहे हैं, की पक्षपातपूर्ण नीतियों को लेकर हमेशा मुखर रहे हैं। इससे पहले, रघुराम राजन खुद धनी देशों की स्वार्थी नीतियों की आलोचना कर चुके हैं कि ये देश अपनी नीतियां बनाते समय इसका बिल्कुल ही ध्यान नहीं रखते कि इनका उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों पर क्या असर पड़ेगा?

ब्रिक्स बैंक के पास बड़ी संख्या में सड़कों, बिजली संयंत्रों और सीवरेज प्रणाली क्षेत्रों में काम करने की अकूत संभावना है क्योंकि इन सबके लिए भारी पैमाने पर फंडिंग की जरूरत होगी। बैंक के दीर्घकालिक पूंजी आधार  और इन परियोजनाओं की वित्तीय मांगों की पूर्ति के जरिये बैंक की स्थापना का उद्वेश्य न्यायोचित साबित हो जाएगा।

बहरहाल, नए बैंक के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे पहली बात तो इसका छोटा आकार है, खासकर यह देखते हुए कि इसे अंतरराष्ट्ीय स्तर पर काम करना होगा। फिर, चीन, भारत और ब्राजील ने केवल विश्व बैंक से ही 66 अरब डॉलर उधार ले रखा है। यह कर्ज भी उनके अपने नए बैंक के पक्ष में नीतियों को बढ़ावा देने में सक्रियता और फिर विश्व बैंक के प्रभाव का मुकाबला करने के मामले में आड़े आएगी। इसके अलावा, ब्रिक्स बैंक को अपने पांचों सदस्य देशों की विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों के साथ भी सामंजस्य संबंधित मुद्वों का सामना करना पड़ेगा।

फिर भी, ब्रिक्स बैंक जैसे प्रयोग भविष्य और खासकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिहाज से काफी सकारात्मक और अनुकूल साबित हो सकते हैं।

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