पंचायतों को शामिल किए बगैर वास्तविक डिजिटल इंडिया मुमकिन नहीं

अतुल के ठाकुर, सीनियर एसोसिएट एडीटर, इनक्लुजन

कार्मिक, जन शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय में सचिव एन रविशंकर स्कॉच ग्रुप द्वारा डिजिटल इंडिया पर आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डिजिटल इ्रंडिया का विजन पंचायतों को शामिल किए बगैर साकार नहीं होगा। यह मानना है सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी का।

स्कॉच ग्रुप द्वारा डिजिटल इंडिया पर आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कार्मिक, जन शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय में सचिव एन रविशंकर ने देश में समग्र डिजिटल संस्कृति लाने में व्यक्तिविशेषों तथा पंचायतों द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के महत्व को रेखांकित किया।

शंकर ने कहा कि अब समय आ गया है कि सार्वजनिक निजी साझेदारी यानी पीपीपी को सार्वजनिक निजी पंचायत साझेदारी यानी पीपीपीपी के रूप में जाना जाए। उन्होंने कहा कि ग्रामीण भारत इसके लिए लंबे समय से इ्रंतजार कर रहा है और आम जनता को अधिकारसंपन्न बनाने में ज्यादा समरूपता तथा समन्वय अधिक कारगर साबित होगा।

ये टिपण्णियां इस वित्तीय वर्ष में 50,000 ग्राम पंचायतों को तथा अगले वित्तीय वर्षों में 100,000 और 2015-16 में इतनी ही संख्या में ग्राम पंचायतों को कनेक्ट करने की सरकार की योजना की पृष्ठभूमि में आईं हैं।

डिजिटल इंडिया पर आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन के दौरान सरकार द्वारा हाल में शुरू डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के प्रमुख सूक्ष्म तत्व सामने आए। विशेषज्ञों एवं नागरिकों के विचारों के जरिये जो निष्कर्ष सामने आए, उनके अनुसार जहां हाल में लांच ‘डिजिटल इंडिया‘ में प्रगति की बेशुमार संभावना है, पहले शुरू कार्यक्रम भी आर्थिक सुधारों के बाद एक प्रौद्योगिकी उन्मुखी अर्थव्यवस्था की एक अहम यात्रा की रूपरेखा बनाने में भारत के लिए काफी मददगार साबित हुए थे।

हालांकि इस बार फोकस नए शुरू होने वाले डिजिटल मुहिम से संभावित त्रुटियों को दूर करने पर होना चाहिए। साथ ही, पहले के कार्यक्रमों की क्रियान्वयन से संबंधित त्रुटियों पर भी ‘प्रमुख सबक‘ के रूप विचार किया जाना चाहिए।

वैचारिक रूप से यह बढ़िया ध्वनित होता है। बहरहाल, इस पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए कि किस प्रकार ई-सर्विस डिलीवरी की खामी ने पहले की सरकारों के डिजिटलाइजेशन प्रयासों को सुस्त कर दिया और आखिरकार इसकी वजह से इसका उतना असर नहीं हुआ जितनी उनकी वास्तविक क्षमता थी।

हालांकि यह अभी भी पूरी तरह साफ नहीं है कि नई नीति योजना ठीक किस तरह काम करेगी, पर मौजूदा परिदृश्य में परिणाम आधारित शासन के महत्व की पहचान पर निशिचत रूप से और विचार विमर्ष किया जाना चाहिए जहां प्रौद्योगिकी बदलाव की गति बेहद तेज है। इसलिए, ‘डिजिटल इंडिया‘ नागरिकों को अधिकारसंपन्न और प्रमुख साझीदार तभी बना सकता है जब प्रक्रियाओं की वे बाधाएं दूर हो जाएं जो सूचनाओं के मुक्त प्रवाह और उद्यमशीलता के अवसरों को बाधित करती रही हैं।

इन वैध चुनौतियों के अलावा, डिजिटल इंडिया मिशन को सरकार के भीतर से भी बाधाओं का सामना कर पड़ सकता है। सरकार के भीतर के कुछ लोग भी इतनी जल्द इसे मिशन मोड बनाने के पीछे की पूरी संरचना को लेकर आशवस्त नहीं हैं। इनमें से एक, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के चेयरमैन राहुल खुल्लर हैं। उन्होंने हाल के एक साक्षात्कार में कहा कि इस योजना में विशिष्ट तरीके से कुछ नहीं कहा गया है। क्या दिल्ली में आन लाईन जन्म या मृत्यु प्रमाणपत्र पाना संभव है? अगर नहीं तो हम किस प्रकार के ऐप्लीकेशंस की बात कर रहे हैं?

सिद्वांत रूप से डिजिटल इंडिया के लिए जो विजन निर्धारित किए गए हैं, वे तीन क्षेत्रों में केंद्रित हैः हरेक नागरिक के लिए उपयोगी के बतौर डिजिटल इंफ्रास्ट्क्चर- डिजिटल पहचान, मोबाइल फोन और बैंक खाता, सुरक्षित साइबर स्पेस और मांग पर उपलब्ध शासन एवं सेवाएं: आन लाइन तथा मोबाइल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रियल टाइम में सेवाओं की उपलब्धता, वित्तीय लेनदेन को इलेक्ट्निक बनाना तथा नागरिकों को डिजिटल तरीके से अधिकारसंपन्न बनाना: और सभी दस्तावेजों, प्रमाणपत्रों को क्लाउड पर उपलब्ध कराना।

वास्तव में, इन ऐप्लीकेशंस को जारी करने पर ज्यादा विचार तथा संसाधनों को जारी किए जाने की जरूरत है बजाये शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे अहम क्षेत्रों के लिए हड़बड़ी में ई-आधारित प्रोग्रामिंग लांच कर देने के।

अभी तक, डिजिटल इंडिया पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के जो विचार आए हैं उनमें इस मुद्वे पर जरूर सहमति है कि वास्तविक डिजिटल क्रांति के जरिये ही भारत में समरूपता आ सकती है केवल किसी अन्य नीतिगत पहल मात्र के जरिये नहीं। नई डिजिटल नीति को अग्नि परीक्षा से गुजरना ही होगा-यह अनिवार्य प्रतीत होता है।

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