हिन्दी-चीनी भाई भाई में है ‘ भरोसे की चीनी कम‘

गुरशरन धन्जल, संपादक, इनक्लुजन

दृश्य 1: चीन के राष्ट्पति जी जिनपिंग ने भारत की अपनी राजकीय यात्रा तुरंत समाप्त की है और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को युद्व के लिए तैयार रहने को कह दिया है, लेकिन साथ में वह यह भी कहते हैं कि भारत को संदेह करने की जरूरत नहीं है जबकि पूर्वी लद्वाख के चुमार में  भारत और चीन की सेनाएं बेहद तनातनी के माहौल में एक दूसरे के खिलाफ जुटी हुई हैं।

दृश्य 2: जब अमेरिका ने 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई के बाद भारत पर आर्थिक पाबंदी लगा दी थी और पाकिस्तान को अपने हथियारों की आपूर्ति बढ़ा दी थी, तो उसने भारत को कहा था कि ये हथियार पाक सेना को मजबूत बनाने के लिए हैं और इनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं किया जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि ऐसी कोई बंदूक नहीं बनी है जिससे केवल एक ही दिशा में गोलियां चलती हो। कहने की जरूरत नहीं कि  पाकिस्तान ने 1971 की लड़ाई में धड़ल्ले से इन हथियारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया।

दृश्य 3: भारत और चीन के बीच पहला सशस्त्र संघर्ष 1959 में लद्वाख के लौंग्जू में हुआ। चीन के राष्ट्पति झोउ एनलाइ ने 1960 की दिल्ली यात्रा को एक समझौते पर पहुंचने के अवसर को 8 अक्तूबर, 1962 को एक खो चुका मौका बताया और उसके कुछ ही दिनों बाद चीन ने भारत पर हमला कर दिया था।

माओ और नेहरू की ही तरह जी और मोदी भी द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं, फिर भी भारत-चीन संबंधों का कड़वा इतिहास बताता है कि महान दोस्ती की घोषणा करना जितना आसान है, उसे बनाये रखना उतना ही मुश्किल।

दोनों देशों के बीच मतभेद तेजी से उभर रहे हैं: चीन की सार्क में दिलचस्पी है जो भारत को नहीं सुहा रहा है और उससे भी ज्यादा उसके लिए परेशानी का सबब है पाक अधिकृत कश्मीर में बढ़ते निवेश के साथ उभरता चीन-पाक सैन्य गठजोड़। मोदी की जापान यात्रा के बाद भारत के सामरिक संबंध भी चीन को नागवार गुजर रहे हैं।

यह तो स्पष्ट है कि चीन राजनीति को व्यावसायिक सहयोग से उपर रखता है और उसने यथास्थिति से ज्यादा एक इंच भी देने से इंकार कर दिया है। बुनियादी ढांचे पर फोकस के साथ 100 अरब डॉलर के निवेश की पेशकश में उसने केवल 20 अरब डॉलर का ही वचन दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया है कि दोनों देश पूरी मानवता के लिए बेहतर भविष्य के सृजन के लिए एक साथ मिलकर काम करेंगे। भले ही, दोनों देश बेहतर आपसी समझ पर जोर दे रहे हैं और इनके संबंधों में भी वह प्रगाढ़ता दिख रही है जो हिन्दी-चीनी भाई भाई के खुशगवार दिनों के बाद से नहीं दिखे हैं, लेकिन वास्तविकता अलग है और वह 1960 के दशक के प्रारंभिक दिनों की याद दिलाती है।

जिस तरह, एनलाइ ने भारत की अपनी 1960 की यात्रा के समापन के बाद कहा था कि यह यात्रा कटुता में समाप्त हुई, चीन ने आरोप लगाया कि नेहरू की सीमा विवाद का समाधान करने में दिलचस्पी नहीं है और उसने सीमा के आसपास सैन्य निर्माण करना शुरू कर दिया।

मौजूदा हालात भी उससे अलग नहीं है सिवाये इसके कि इस बार चीन ने भारत को लक्षित करके कोई बयान नहीं दिया है।

वीसा मुद्वे पर कोई बात आगे नहीं बढ़ी क्योंकि चीन ने अरूणाचल प्रदेश से आने वाले लोगों को नत्थी किए हुए वीसा जारी करने की प्रैक्टिस रोकने से इंकार कर दिया क्योंकि चीन उसके विवादित क्षेत्र होने का दावा करता है। इसके जबाव में भारत ने वीसा उदारीकरण समझौते पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया जो भारत में चीन के प्रोफेशनलों की यात्रा को सुगम बनाता। लेकिन बड़ी निराशा आर्थिक मोर्चे पर हुई।

दूसरी तरफ, पिछले कुछ दिनों में चीन की सेना काफी आक्रामक दिख रही है और उसने चुमार में आठ जगहों में से एक जगह पर भारतीय सेना को 2 किमी भारतीय क्षेत्र के भीतर वापस लौटने को मजबूर कर दिया। तनातनी आज भी बरकरार है। चीन की  300,000 टुकड़ियां तैनात हैं जबकि हमारी 120,000। चीन के लोगों की भारत यात्राओं के दौरान पहले भी ऐसी घुसपैठ हुई है, लेकिन यह ऐसा अनुभव है जिसे निष्कर्ष कह कर खारिज नहीं किया जा सकता।

मुझे 1962 की लड़ाई के बाद का एक दिलचस्प वाकया याद आ रहा है: जनवरी, 1963 में चीन में भारत के राजदूत पी के बनर्जी के माध्यम से झोउ ने भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को एक मौखिक संदेश भिजवाया कि ‘ युद्व से कभी किसी भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है। जरूरत शांति और बेहतर समझदारी खोजने की है। मैं नेहरू की कठिनाइयां समझता हूं, लेकिन उन्हें भी मेरी कठिनाइयों को समझने का प्रयास करना चाहिए।‘ नेहरू ने इसका कोई जबाव नहीं दिया।

अप्रैल, 1963 में चीन के एक पत्रकार ने नेहरू से मुलाकात की और उन्हें बताया कि ‘ झोउ आपका बहुत सम्मान करते हैं।‘ नेहरू ने जबाव दिया ‘ मैंने झोउ की दोस्ती बहुत देख ली है‘। चीन वापस लौटने के बाद उस पत्रकार ने चीन के राष्ट्पति से मुलाकात की और उन्हें कहा ‘ मैं समझता हूं नेहरू बीमार हैं। वह गलत ढंग से बोलते हैं‘। झोउ ने तल्खी से जबाव दिया ‘ वह लंबे समय से गलत चीजें ही कहते रहे हैं।‘

दीवार पर इबारत लिखी है, बस उसे गौर से पढ़ने की जरूरत है....

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