आर्थिक आंकड़ों को मापने के तरीके दुरूस्त करने की जरूरत

ज्ञानेन्द्र केशरी, कार्यकारी संपादक, इनक्लुजन

देश के औद्योगिक उत्पादन के मापक औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी ने जुलाई में महज 0.5 फीसदी की वृद्वि दर्ज की

जीडीपी, औद्योगिक उत्पादन और महंगाई दर जैसे सूक्ष्म आर्थिक आंकड़ों में व्यापक उतार चढ़ाव और बड़े संशोधन इन संख्याओं की साख को लेकर सवाल खड़े करते हैं। पिछले दो वर्षो के दौरान आर्थिक विकास, औद्योगिक उत्पादन, विदेश व्यापार और महंगाई दर आंकड़ों में कई बार और काफी बड़े संशोधन हुए हैं। इसके अतिरिक्त, महीना दर महीना और तिमाही दर तिमाही आधार पर इन आंकड़ों में होने वाले बड़े उतार चढ़ावों ने इनकी साख को भी धक्का पहुंचाया है।

पिछले दिनों जारी औद्योगिक उत्पादन आंकड़ों का ही उदाहरण लें।  केंद्रीय सांख्यिकी ऑफिस द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार,देश के औद्योगिक उत्पादन के मापक औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी ने जुलाई में महज 0.5 फीसदी की वृद्वि दर्ज की। पिछले दो महीनों में औद्योगिक उत्पादन की वृद्वि दर क्रमशः 3.4 फीसदी और 4.7 फीसदी रही। पहले जून का आंकड़ा 3.4 फीसदी दर्ज किया गया था जिसे अब संशोधित कर 3.9 फीसदी कर दिया गया है जो आधा फीसदी का बदलाव है। जून के औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों का अब अंतिम संशोधन किया जाएगा जिसे सितंबर महीने के प्रारंभिक आंकड़े के साथ जारी किया जाएगा।

यह इकलौता मामला नहीं है। प्रारंभिक और संशोधित आंकड़ों में ज्यादा फर्क के मामले अब अक्सर देखे जा रहे हैं। वित्त वर्ष 2012-13 के लिए सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को 5 फीसदी से संशोधित कर 4.5 फीसदी कर दिया गया। यह संशोधित आंकड़ा लगभग एक साल के बाद जनवरी, 2014 में जारी किया गया। 2010-11 के आंकड़े 9.3 फीसदी से संशोधित कर 8.9 फीसदी कर दिए गए जबकि 2011-12 के आंकड़े को 6.2 फीसदी से संशोधित कर 6.7 फीसदी कर दिया गया।

ये आंकड़े नीति निर्माण के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। भरोसेमंद आंकड़ों के अभाव में, नीतिगत कदमों का गलत हो जाना लाजिमी है। शायद ब्याज दरों पर गलत दिशा में कदम उठाने के कारण भारतीय रिजर्व बैंक ही महंगाई दर पर लगाम लगा पाने में नाकाम रहा है और आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचा है। दूसरे नीतिगत कदम भी आम तौर पर भरोसेमंद आंकड़ों के अभाव में गलत दिशा में चले जाते हैं।

यह सूक्ष्म आर्थिक आंकड़ों को मापने के हमारे तरीके में फेरबदल तथा इसे दुरूस्त करने की जरूरत को रेखांकित करता है।

सबसे पहली जरूरत तो आधार वर्ष को बदलने की है। जीडीपी, आईआईपी और थोक मूल्य सूचकांक समेत ज्यादातर आंकड़ों के लिए मौजूदा आधार वर्ष 2004-05 है। लगभग 10 वर्ष पुराने आधार वर्ष को बनाये रखने का क्या औचित्य है? आधार वर्ष के लिए चयन मानदंड पर फिर से विचार करने की जरूरत है। वित्त वर्ष 2011-12 को आधार वर्ष बनाया जा सकता है और ऐसी नीति बनाई जा सकती है जिसके अनुसार इसे नियमित अवधि और कम अंतराल, जैसे हर दो वर्षों पर संशोधित किया जा सके।

इसके अतिरिक्त, आंकड़ों के संग्रह की प्रणाली में फेरबदल करने तथा इसे ज्यादा व्यावहारिक बनाने की जरूरत है। भारत की अर्थव्यवस्था में सेवा और अनौपचारिक सेक्टर का 60 फीसदी से भी ज्यादा का योगदान है। लेकिन इन सेक्टरों के लिए सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। सरकार इन सेक्टरों से जुड़े आंकड़ों की गणना के लिए सर्वे तथा नमूनों पर भरोसा करती है। असंगठित सेक्टर के लिए आंकड़ों के संकलन के लिए निश्चित रूप से एक वैज्ञानिक प्रणाली होनी चाहिए।

आईआईपी और थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति के मामले में, उत्पाद मिश्रण के पुननिर्माण की जरूरत है। आईआईपी 682 वस्तुओं को कवर करता है जिसे तीन व्यापक क्षेत्रों-खनन एवं उत्खनन, विनिर्माण और बिजली में वर्गीकृत किया गया है जिनके भारांक क्रमशः 14.16 फीसदी, 75.53 फीसदी और 10.32 फीसदी हैं।

पिछले दो दशकों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत ज्यादा परिवर्तन आए हैं और आर्थिक बेहतरी के साथ उपभोग पद्वति में भी जबर्दस्त बदलाव आया है। नए आर्थिक प्रतिमानों को ध्यान में रखते हुए प्रणाली में फेरबदल किए जाने की जरूरत है।

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