सामाजिक समावेश: ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना‘ में है बेहतरी की जरूरत

बी के झा, विशेष संवाददाता, इनक्लुजन

इंडिया 2.0 के लक्ष्य को अर्जित करने के लिए सरकार ने सामाजिक समावेश से संबंधित कई कल्याणकारी योजनाओं को अमली जामा पहनाया है। इनमें फोकस राष्टीय स्वास्थ्य बीमा योजना यानी आरएसबीवाई जैसी वर्तमान में जारी योजनाओं को बेहतर बनाने पर रहा है जिससे कि उन्हें समग्र बनाया जा सके। यह कहना है श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में सचिव गौरी कुमार का।

37वें स्कॉच सम्मेलन के दौरान सामाजिक समावेश पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए गौरी कुमार ने स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े सुधारों के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि स्वास्थ्य बीमा योजना यानी आरएसबीवाई कमजोर तबकों के लिए एक वरदान बन कर आई है, हालांकि विभिन्न क्षेत्रों से मिले फीडबैक बताते हैं कि इन योजनाओं में तत्काल बेहतरी की जरूरत है।

सामाजिक समावेश के लिए आरएसबीवाई सबसे कारगर माध्यमों में से एक है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य नीति के क्रियान्वयन के साथ ही जल्द स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े सुधारों के अगले दौर की शुरूआत हो जाएगी। इसके लिए ड्ाफ्ट नीति तैयार है और एक विशेषज्ञ समूह से फीडबैक और सुझाव मिलते ही इसे जल्द ही लागू कर दिया जाएगा।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने आरएसबीवाई की शुरूआत गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को बेहद जरूरी स्वास्थ्य देखभाल समर्थन मुहैया कराने के लिए की थी और त्रुटियों तथा अनियमितताओं से बचने के लिए नियमित अंतराल पर इसकी निगरानी की जाती है। इस योजना के क्रियान्वयन में जमीनी स्तर पर कुछ दिक्कतें भी सामने आती हैं।

इस योजना के तहत, केंद्र सरकार प्रीमियम का 75 फीसदी खर्च वहन करती है जबकि शेष 25 फीसदी राज्यों को वहन करना पड़ता है। पांच या इससे कम सदस्यों का एक बीपीएल परिवार 30 रूपये के सालाना पेमेंट पर अपना पंजीकरण करा सकता है। प्रत्येक परिवार को सालाना 30,000 रूपये का मेडिकल कवरेज प्राप्त होता है।

धनबाद, झारखंड के उपायुक्त प्रशांत कुमार ने राज्य के दो जिलों-धनबाद और एक आदिवासी बहुल जिले दुमका में आरएसबीवाई के क्रियान्वयन में जमीनी स्तर पर आने वाली कठिनाईयों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि पर्याप्त आंकड़ों की कमी, दवाओं व डायग्नोस्टिक सुविधाओं का अभाव तथा डॉक्टरों की किल्लत सबसे बड़ी चिंता है। इन क्षेत्रों में निजी अस्पतालों की संख्या कम है और सरकारी स्वास्थ्य देखभाल केंद्र ऐसी परिस्थितियों में दबाव झेल पाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं।

विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों ने महसूस किया कि बिना स्वास्थ्य एवं शिक्षा प्रणाली में सुधार लाए, सामाजिक समावेश संभव नहीं है। उनका मानना है कि यही दोनों क्षेत्र समावेशी विकास के लिए हमारी मुख्य चिंताएं हैं।

उनके अनुसार, सामाजिक समावेश को प्रौद्योगिकी चालित होना चाहिए और सामाजिक समानता को इस आंदोलन का अंतरंग हिस्सा होना चाहिए।

महाराष्ट् सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पी बख्शी का मानना था कि सभी राज्यों के सामने संसाधनों की किल्लत होती है और कई सामाजिक योजनाओं के लिए धन जुटाना एक चुनौती है।

मध्य प्रदेश सरकार के प्रमुख सलाहकार एम के त्यागी कहते हैं कि मुख्य समस्या है बहिष्कार की। महिलाओं एवं बच्चों, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों तथा अन्य समूहों को कई योजनाओं से बहिष्कृत कर दिया गया है। अगर हम सभी क्षेत्रों को शामिल कर भौगोलिक समावेश नहीं करते हैं तो सामाजिक समावेश अर्जित नहीं किया जा सकेगा।

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