क्या तरलता संकट की तरफ बढ़ रहे हैं भारतीय बैंक?

ज्ञानेन्द्र केशरी, कार्यकारी संपादक, इनक्लुजन

विजय माल्या प्रवर्तित

आज के दौर में, जब फिजां में चारों तरफ वित्तीय समावेश की ही चर्चा है, बड़े उद्योगपतियों द्वारा किए जाने वाले डिफॉल्ट की घटनाओं ने एक बार फिर से भारतीय बैंकों के बैलेंस शीट की विकट होती स्थिति पर ध्यान देने को मजबूर कर दिया है। यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया द्वारा शराब के सरताज विजय माल्या को ‘हठी डिफॉल्टर‘ घोषित किया जाना बैंकों पर बढ़ते दबाव को रेखांकित करता है।

भारतीय स्टेट बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया और आईडीबीआई समेत उधारदाताओं के एक महासंघ ने एक साथ मिलकर माल्या प्रवर्तित और अब निष्क्रिय हो चुकी किंगफिशर एयरलाइंस को 7,500 करोड़ रूपये उधार दिए हैं। किंगफिशर एयरलाइंस को 2012 के उत्तरार्ध में रोजाना के संचालन के खर्चों की पूर्ति में अक्षमता तथा संचित संचालनगत घाटों के कारण बंद कर दिया गया।

माल्या का उदाहरण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बीच बढ़ते दबाव के स्तर को रेखांकित करता है। संभावित डिफाल्टों के कई दूसरे हाई प्रोफाइल मामले भी हैं। भूषण स्टील पर भारी कर्ज चढ़ चुका है। कंपनी पर बैंकों की 40,000 करोड़ रूपये से अधिक की उधारी बकाया है।

ज्यादातर बैंकों के बैलेंस शीट प्रदर्शित करते हैं कि हालात भयावह हैं। सूचीबद्व बैंकों की सकल अलाभकारी परिसंपत्तियां यानी एनपीए 31 मार्च 2014 तक 2.5 लाख करोड़ रूप्ये तक पहुंच चुकी थीं। सरकार संचालित बैंकों, जिनकी कर्ज में दो तिहाई की हिस्सेदारी है, के पास अलाभकारी परिसंपत्तियों का 80 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए वित्त वर्ष 2013-14 में 4.03 फीसदी बढ़ा जो 2012-13 में 3.42 फीसदी और 2011-12 में 2.94 था।

इससे भी भयावह स्थिति बढ़ते पुनगर्ठित कर्जों की है जो मार्च 2014 में सकल अग्रिमों के 5.9 फीसदी पर पहुंच गया जो जून 2011 में 2.5 फीसदी था। ऐसे ऋण को, जहां उधार लेने वालों ने डिफॉल्ट किया है, बुरे कर्जों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है जबकि पुनगर्ठित कर्ज वे होते हैं जहां उधार लेने वालों ने डिफॉल्ट की धमकी दी है। दबाव वाले ऋण जिनमें  बुरे कर्ज और पुनगर्ठित कर्ज दोनों ही शामिल हैं, वर्तमान में लगभग 10 लाख करोड़ रूपये तक पहुंच चुके हैं जोकि बैंकों के कुल नेटवर्थ से भी ज्यादा हैं। इन बुरे ऋणों का बड़ा हिस्सा ढांचागत परियोजनाओं से संबंधित हैं।

हाल के डिफॉल्ट, भ्रष्टाचार और कर्ज मंजूर करने में रिश्वतखोरी के मामले संकेत देते हैं कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली पर गंभीर प्रणालीगत खतरा है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई ने अभी हाल में सिंडिकेट बैंक के प्रमुख सुधीर कुमार जैन तथा भूषण स्टील के प्रबंध निदेशक नीरज सिंगल को ऋण प्रक्रिया में कथित रिश्वत और अनियमितताओं को लेकर गिरफ्तार किया। किंगफिशर एयरलाईंस को 950 करोड़ रूपये का आईडीबीआई बैंक का ऋण भी जांच एजेंसी की नजर में है।

कोयला ब्लॉक आवंटनों को रद्व करने के हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भी आर्थिक विकास में किसी भी उल्लेखनीय प्रगति की उम्मीद को ध्वस्त कर दिया है। बैंकों के केवल बिजली क्षेत्र में ही 1 लाख करोड़ रूपये से अधिक लगे हुए हैं जोकि उनकी परिसंपत्ति गुणवता पर बेइंतहा दबाव डाल रहे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि हालात डरावने हैं और नियामक को इन समस्याओं के समाधान के लिए तेजी से कदम उठाने की जरूरत है। नहीं तो, बेहद तेजी से बढ़ती दबाव वाली परिसंपत्तियां भारतीय बैंकिंग प्रणाली में तरलता का संकट खड़ा कर सकती हैं, ठीक वैसी ही स्थिति जैसी 2008 में लेहमैन बंधुओं के दिवालिया होने के बाद पूरी दुनिया में देखी गई थी।

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