भारत-अमेरिकी संबंध: स्वामी विवेकानंद, इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी

समीर कोचर, मुख्य संपादक, इनक्लुजन व मोदीनोमिक्स के लेखक

इस साल मैं 50 वर्ष का हो गया। यह मेरे लिए केवल एक व्यक्तिगत मील का पत्थर नहीं है। वास्तव में, यह कोई मील का पत्थर है ही नहीं, यह तो केवल एक परिवर्तन है। बिल्कुल भारत की ही तरह जहां हमारा जन्म हुआ-जहां समृद्धि और संभावनाएं दोनों मुश्किल से आती थीं, आज एक समावेशी भारत में बदल चुका है। इस परिवर्तन का मैं खुद गवाह रहा हूं इसलिए मैं अपने देश के जीवित इतिहास का एक हिस्सा महसूस करता हूं जो सालों की बंद अर्थव्यवस्था के बाद अब उभर कर सामने आ रहा है।

मोदी जी की अमेरिका यात्रा मुझमें पुराने दिनों की याद और एक स्वतंत्र और बंधनमुक्त भारतीय होने के असीम गौरव की भावना भर देती है। बहुत से लोगों के लिए यह एक राजनयिक यात्रा हो सकती है, लेकिन जैसा मैं समझता हूं, इस यात्रा का उद्वेश्य भारत में अधिक से अधिक निवेश लाने से संबंधित है जिसकी हमें बेहद आवश्यकता है। वह भारत के सर्वश्रेष्ठ बिजनेस डेवलपमेंट एक्सक्यूटिव हैं जिसका पिछले कुछ समय से अभाव था।

मोदी जी की नजर निश्चित रूप से भविष्य पर है और वह रोजगार अवसरों का सृजन करने और हमारी विशाल आबादी का लाभ उठाने के लिए विदेशी निवेश में यह संभावना देखते हैं।

मैं समझता हूं कि भारत-अमेरिकी संबंधों में इससे पहले जो दो बड़े यादगार क्षण आए थे, वे 1893 में शिकागो में धर्म संसद को स्वामी विवेकानंद का संबोधन था जो निश्चित रूप से उस समय भारतीयों तथा अमेरिकी दोनों के लिए बेहद प्रेरणादायी अनुभव रहा होगा।

अगली यादगार यात्रा इंदिरा गांधी की रीगन के शासनकाल में 1982 की थी जिसे मैंने बड़ी दिलचस्पी के साथ राष्ट्ीय टेलीविजन पर देखा था। नेशनल प्रेस क्लब को उनका संबोधन और जिस भव्यता के साथ उन्होंने रीगन प्रशासन और अमेरिकी समुदाय पर अपनी छाप छोड़ी, उसने एक आधुनिक और मजबूत भारत का बेहद स्पष्ट संदेश दे दिया था।

यह केवल महज संयोग नहीं है कि स्वामी जी का वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्ता था। मोदी जी उनकी कृतियों, खासकर, सामाजिक समावेश से काफी प्रभावित हैं जिन्होंने अध्यात्मवाद की दिशा में उनकी यात्रा की शिलान्यास रखी और भारत को एक जगत गुरू बनाने के स्वप्न को पूरा करने के मिशन के प्रति उन्हें प्रेरित किया। मोदी जी के कई भाषणों में स्वामी जी के विचारों की छाया दिखती है और उनका मजबूत प्रभाव नजर आता है।

स्वामी जी के संबोधन के ठीक सौ सालों के बाद मोदी जी स्वामी विवेकानंद के भाषण की 100वीं वर्षगांठ के समारोह के अवसर पर शिकागो पहुंचे। उनके साथ मुरली मनोहर जोशी भी थे और वे वहां चार दिनों तक ठहरे। यह अमेरिका की भी उनकी पहली यात्रा थी।

मैं समझता हूं मोदी जी को वीसा देने से मना करना राजनयिक शिष्टाचार के मामले में अमेरिकी सरकार की बड़ी भूल थी। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद जैसे ही अमेरिका यात्रा के लिए ओबामा प्रशासन का निमंत्रण प्राप्त हुआ, उसे खुले दिल से स्वीकार करके मोदी जी ने काफी बड़प्पन का परिचय दिया।

इसमें कोई शक नहीं कि दोनों वैश्विक और बिजनेस नेता द्विपक्षीय रिश्तों को और मजबूत तथा प्रगाढ़ करने की कोशिश कर रहे हैं। उम्मीद है कि न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वॉयर गार्डेन में नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान जितनी भीड़ होगी, वह अमेरिकी सरजमीं पर किसी भारतीय नेता के आने पर नहीं रही होगी। यह तीसरा अवसर होगा जब कोई भारतीय नेता अमेरिकी धरती से पूरे देशवासियों को इतना रोमांचित करेगा।

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