कर प्रणाली सुधार में चाहिए रफ्तार

अतुल के ठाकुर, सीनियर एसोसिएट एडीटर, इनक्लुजन

भारत में आम तौर पर कर कानूनों, कर प्रशासन और लेखाकारों की भूमिका को संशय की नजरों से देखा जाता रहा है। इसकी मुख्य वजह इस क्षेत्र में कारगर सुधारों के लिए प्रोत्साहनों की कमी रही है। इस देश में कर प्रणाली एक जटिल मसला रहा है, पर अब चूंकि कर प्रणाली को सुधारों के अगले चरण में प्रवेश करना है इसलिए सरकार को इसे सरल तथा सबके लिए उपयोगी बनाने के लिए इससे जुड़े सभी संबंधित पक्षों को अपने दायरे में शामिल करना होगा। वर्तमान संदर्भों को जोड़ते हुए और बड़े आंकड़ों तथा विश्लेषणों के उपयोग के जरिये कर प्रणाली में आवश्यक सुधार लाए जा सकते हैं।

भारत सरकार के राजस्व सचिव शक्तिकांत दास ने इनक्लुजन के साथ एक विशेष बातचीत करते हुए भारत में अगले चरण के कर सुधारों के लिए टेक्नोलॉजी की अहम भूमिका की याद दिलाई और कहा कि वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी देश को कर स्पष्टता के मामले में एक नई दिशा में ले जाएगी। उनके विचारों से ऐसा प्रतीत हुआ कि सरकार को इस बात का अहसास है कि कर सुधार के मोर्चे पर कई अवसरों पर सुस्ती रही है और अब सरकार अतीत और वर्तमान की उन गलतियों को दुरूस्त करने की प्रक्रिया में है।

स्कॉच ग्रुप द्वारा कर सुधारों पर आयोजित एक पैनल बातचीत के दौरान व्यय सुधार आयोग के सदस्य सुमित बोस ने स्वीकार किया कि कर कानूनों को बदलते दौर की चुनौतियों का सामना करने के लिए मुस्तैदी से काम करने की जरूरत है। उन्होंने इसके साथ साथ वित आयोग की अहम भूमिका की भी याद दिलाई और कहा कि इसकी ़क्षमता को कम करके आंकना गैरतार्किक होगा। उन्होंने कहा कि कर आंकड़ों की जानकारी का आपस में आदान प्रदान करना बेहद जरूरी है और इस बात पर अफसोस भी जताया कि जब वह भारत सरकार के राजस्व सचिव थे, तो इस पहलू पर काम नहीं कर पाए थे। उन्होंने कहा कि राजस्व आय को बाधित करने वाले क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए और प्राथमिकता के आधार पर उन्हें प्रणाली से हटा दिया जाना चाहिए।

कर प्रशासन से जुड़ी प्रक्रियाओं एवं कानूनों में पारदर्शिता लाने के साथ साथ विवादों में कमी लाने के लिए न्यायपालिका को कर मामलों के प्रति सक्रिय और संवेदनशील बनाना भी उतना ही आवश्यक है। इसके अलावा, नीतियों पर उनके निर्माण के समय से ही उनके कार्यान्वयन को लेकर भी दूरदर्शिता से विचार करने की जरूरत है जैसे सिद्धांत रूप में जनरल ऐंटी अवॉयडेंस रूल्स यानी गार और कर प्रशासन सुधार आयोग भी बेहद शानदार कानून थे लेकिन क्रियान्वयन के मोर्चे पर वे अपनी क्षमता के अनुरूप काम करने में सफल नहीं हो पाए।

जहां तक जीएसटी का सवाल है तो यह एक मूल्य सवंर्द्धित कर है जिसका क्रियान्वयन भारत में 2016 से किया जाना है। यह केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं पर लगाए जाने वाले सभी अप्रत्यक्ष करों की जगह ले लेगा। इसका उद्वेश्य अधिकांश वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए एक व्यापक कर प्रणाली बनना है और सिद्धांत रूप से यह भी बिल्कुल ठीक दिखता है। लेकिन भारत एक संघीय गणराज्य है और केंद्रीय जीएसटी और राज्य जीएसटी के रूप में केन्द्र और राज्य सरकारें एक ही साथ जीएसटी को अमल में लाएंगी। इस प्रकार होने वाली करों के दुहराव की प्रबल आशंका से कैसे निपटा जाए, यही सवाल नियामकों के दिमाग पर छाया हुआ है। इसके अलावा, इस कानून के तहत निर्यात तो शून्य रेटिंग वाला रहेगा और आयात पर वही कर लगाए जाएंगे जो घरेलू वस्तुओं और सेवाओं पर लगेंगे-क्या इससे पूरी व्यवस्था उतनी व्यापक बनी रह पाएगी जितना दावा किया जा रहा है? तब क्या हमें पूरी तरह करों के मकड़जाल से निजात मिल जाएगी?

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