‘नीति जड़ता‘ दूर करने के लिए वित्तीय सलाहकार पदों का खात्मा जरूरी

ज्ञानेन्द्र केशरी, कार्यकारी संपादक, इनक्लुजन

वित्तीय सलाहकार संबंधित विभागों में स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और वित्त मंत्रालय को रिपोर्ट करते हैं

भारत में आर्थिक सुधारों से संबंधित विचाराधीन कार्यों में एक अहम कार्य व्यय की प्रक्रिया और प्रबंधन से जुड़ा है। सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में व्यय सुधारों के विभिन्न पहलुओं पर गौर करने और राजकोषीय अनुशासन को बेहतर बनाने के रास्ते सुझाने के लिए एक पैनल नियुक्त किया है।

इस संदर्भ में सुधार का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र आंतरिक सलाहकारों से संबंधित है जो परियोजनाओं में अनावश्यक देरी करते हैं और शायद ही कोई मूल्य संवर्द्वन करते हैं। उनकी उस विभाग के प्रति कोई जबावदेही नहीं है जिसमें वे तैनात हैं और अक्सर अविवेकपूर्ण फैसले करते हैं जिससे देरी होती है। परियोजनाओं की मंजूरी मुख्य रूप से वित्तीय सलाहकारों के साथ प्रशासनिक सचिव के ‘व्यक्तिगत संबंधों‘ पर निर्भर करती है। कई बार तो किसी वित्तीय सलाहकार के अहं की तुष्टि न होने से परियोजना को मंजूरी नहीं मिल पाती है।

वित्तीय सलाहकार की धारणा 1970 के दशक के मध्य में शुरू हुई थी। प्रारंभ में कुछ ही चुने हुए विभाग इसके तहत थे और फिर धीरे धीरे इसे सभी विभागों तक विस्तारित कर दिया गया। इन सबका दायित्व संबंधित विभागों को सलाह देना तथा उनकी सहायता करना है और इसके साथ साथ वित्त मंत्रालय की ‘आंख और कान‘ बने रहना भी है।

बहरहाल, जमीनी हकीकत परेशान करने वाली है। वित्तीय सलाहकार संबंधित विभागों में स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और वित्त मंत्रालय को रिपोर्ट करते हैं। इसलिए,उनकी जबावदेही केवल वित्त मंत्रालय के प्रति है।

राष्ट्रीय बजट में प्रत्येक विभाग को विकास एवं प्रशासनिक व्ययों के लिए कुछ विशिष्ट राशि आवंटित की जाती है। बजट का फैसला वित्त मंत्री करते हैं और हरेक विभाग को इसका अनुपालन करना पड़ता है। फिर वित्तीय सलाहकारों का क्या उपयोग है? क्या वे इस प्रक्रिया में केवल एक अनुत्पादक अतिरिक्त सतह भर नहीं हैं जो ‘न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन‘ की मूल भावना को ही धता बताते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि वित्तीय सलाहकार संबंधित विभागों में किसी अनियमितता या फंड के कुप्रबंधन के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराए जाते। फिर उनकी जरूरत ही क्या है? वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि के रूप में वित्तीय सलाहकारों को सार्वजनिक वित्त का संरक्षक होना चाहिए। लेकिन क्या संबंधित विभागों के सचिव या अन्य वरिष्ठ अधिकारी सार्वजनिक वित्त के संरक्षक नहीं हैं? हमें क्यों इतने सारे संरक्षकों की जरूरत है? एयर इंडिया का ही उदाहरण लें। इसे लगातार वित्तीय घाटे हो रहे हैं। फिर नागरिक उड्डयन विभाग का वित्तीय सलाहकार क्या कर रहा था ?

वित्तीय सलाहकार की नियुक्ति विभागों और अधिकारियों के बीच अविश्वास का माहौल बनाती है। वित्त मंत्रालय के सभी संवाद संबंधित सचिवों और विभागों के अधिकारियों को भेजे जाने चाहिए न कि वित्तीय सलाहकारों को जैसाकि वर्तमान में प्रचलन है। ऐसा लगता है मानो वित्त मंत्रालय अपने एजेंट के माध्यम से अन्य विभागों पर नजर रख रहा हो। सचिवों के लिए वित्तीय सलाहकारों के पीछे भागना काफी हताश करने वाला मामला होता है क्योंकि आम तौर पर वित्तीय सलाहकार उनसे जूनियर अधिकारी ही होते हैं।

पिछले चार दशकों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था काफी परिपक्व हुई है और इसमें काफी बदलाव आए हैं। प्रौद्योगिकी बदल गई है। अब चीजों पर बटन दबाने भर से निगरानी की जा सकती है। वित्तीय सलाहकार के नाम पर एजेंटों की नियुक्ति करने के बजाये सरकार को आधुनिक प्रौद्योगिकी पर फोकस करना चाहिए जो कुशलता बढ़ाएगी और पारदर्शिता और जबावदेही सुनिश्चित करेगी।

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