मुमकिन है ग्रामीण गरीबी को खत्म करना

एल सी गोयल

देश में बुनियादी ग्रामीण गरीबी का खात्मा अब केवल नारा भर नहीं रह गया है। यह निश्चित रूप से मुमकिन है। एल सी गोयल बता रहे हैं यह कैसे संभव है

व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि गांवों के गरीबों की बदहाली  पर बेहद कम ध्यान दिया जाता है। सार्वजनिक चर्चाओं में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब लोगों की समस्याओं पर ज्यादा स्थान दिए जाने की जरूरत है। मनरेगा ने गरीबों की आजीविका सुरक्षा और सामाजिक विकास दोनों को सक्षम बनाया है। मजदूरी की अदायगी में देरी तथा पर्याप्त टेक्निकल कर्मचारियों की कमी की समस्या अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसके अलावा, दूसरी सरकारी योजनाओं तथा कार्यक्रमों के साथ लगातार समन्वय के जरिये टिकाउ तथा गुणवत्तापूर्ण परिसंपत्तियों के सृजन पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। ज्यादा जबावदेही लाने, कुशलता बढ़ाने तथा कार्यक्रम के क्रियान्वयन में पारदर्शिता के लिए बड़े पैमाने पर सोशल ऑडिट किए जाने की जरूरत है।

मैं मानता हूं कि समानता या सामाजिक विकास के साथ सतत उच्च आर्थिक विकास भी ग्रामीण गरीबी के स्थायी उन्मूलन के लिए आवश्यक शर्त है। भारत की ग्रामीण आय के 2020 तक 18 हजार अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है जो वर्तमान में 572 अरब डॉलर के स्तर पर है। यह बिल्कुल संभव है कि देश में तेज आर्थिक विकास वर का अगला चरण केवल ग्रामीण क्षेत्रों में सतत विकास की शक्ति पर ही निर्भर होगा।

स्वास्थ्य, पोषण तथा शिक्षा के दूसरे क्षेत्रों, जिनका गरीबी में कमी लाने पर सीधा प्रभाव है, पर ज्यादा फोकस और संसाधन देने की जरूरत होगी।

ग्रामीण युवा भी आईसीटी और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग के मामले में पीछे नहीं हैं। किसी कुशल युवा की महत्वाकांक्षाएं लंबे समय तक अधूरी नहीं रह सकतीं। ज्यादातर कुशल नौकरियों की जरूरत लघु या मझोले उद्यमियों के माध्यम से औपचारिक या मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में पड़ती है। इसे सुलभ करने के लिए श्रम कानूनों तथा व्यवसाय करने की प्रक्रियाओं में सुधार को शीर्ष प्राथमिकता देनी होगी।

केंद्र सरकार, राज्य सरकारों तथा निजी क्षेत्र को समग्र तरीके तथा बेहद बड़े पैमाने पर कौशल विकास की जरूरतों पर ध्यान देने की जरूरत है। राजमिस्त्री से लेकर प्लंबरों, इलेक्ट्शियन, सिक्युरिटी गार्ड और नर्सो तथा शिक्षकों तक के पेशों में कौशल संबंधित भारी खाई या अंतर है।

भारत का शैक्षणिक रूप से कुशल श्रमबल केवल 10 फीसदी, औपचारिक रूप से प्रशिक्षित 2 फीसदी और अनौपचारिक रूप से प्रशिक्षित 8 फीसदी है। प्रशिक्षण क्षमता भी काफी अपर्याप्त है क्योंकि सभी टेक्निकल प्रशिक्षण संस्थान एक साथ मिलकर सालाना केवल 30 लाख लोगों को प्रशिक्षित कर सकते हैं जबकि हर वर्ष 1 करोड़ 20 लाख लोग श्रमबल में शामिल होते हैं।

समावेशी विकास और ग्रामीण गरीबी का खात्मा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। गरीबी का खात्मा संभव है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन यानी एनआएलएम ग्रामीण गरीबी से लड़ने में हमारी लड़ाई का आखिरी हथियार साबित होगा। सहयोगी संरचनाओं को पेशेवर होना होगा और इससे जुड़े लोगों को इसके महत्व के प्रति पूरी तरह जागरूक रहना होगा। आज उठाए गए कदमों पर कल का भविष्य निर्धारित होगा। आज जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले गरीबों की समस्याओं, गरीबी हटाने और समावेशी विकास के लक्ष्य को देश के विकास तथा सरकार के एजेंडा का मूल तत्व बनाया जाए। (लेखक ग्रामीण विकास मंत्रालय में सचिव हैं)

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