समृद्धि की ओर ले जाता मोदी का स्वच्छ भारत अभियान

गुरशरन धन्जल, संपादक, इनक्लुजन

4 फरवरी 1916। महात्मा गांधी ने काशी विश्वनाथ मंदिर की यात्रा की और इस दौरान उन्हें लगातार गंदगी का सामना करना पड़ा। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के अवसर पर भी भाषण दिया जहां वह इसके संस्थापक मदन मोहन मालवीय के आमंत्रण पर आए थे। चूंकि वह इस पवित्र नगरी में अपने अनुभव से खुश नहीं थे, इसलिए उन्होंने कहा‘ क्या यह महान मंदिर हमारे अपने चरित्र का प्रतिबिंब नहीं है?

दुख की बात यह है कि महात्मा गांधी का देश अभी भी स्वच्छ नहीं है बल्कि पहले से कहीं ज्यादा गंदा है। गौरतलब है कि स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत आज उनकी 150वीं वर्षगांठ पर की गई है और उनके प्रति एक तरह की श्रद्धांजलि है जो सभी चीजों से अधिक मस्तिष्क, आत्मा और वातावरण की स्वच्छता को प्यार करते थे। हमने भागीदारी वाले लोकतंत्र का उपदेश तो दिया है (हालांकि उसका उतना अनुसरण किया नहीं है) और अब हम वास्तविक लोकतांत्रिक बनने की उम्मीद में एक कदम और आगे बढ़कर भागीदारी वाली स्वच्छता की दिशा में जा रहे हैं।

हालांकि स्वच्छ भारत अभियान की डगर बहुत आसान नहीं है और इसके लिए ढेर सारी चुनौतियों से जूझने की जरूरत होगी। अभी भी लगभग 62.6 करोड़ भारतीय खुले में शौच करते हैं क्योंकि उनके पास शौचालय की सुविधा नहीं है। पूरी दुनिया के 20 सबसे ज्यादा गंदे शहरों में 13 भारत के हैं जिनमें नई दिल्ली, पटना, ग्वालियर और रायपुर शीर्ष चार स्थानों पर हैं। रोजाना 7 करोड़ से ज्यादा म्युनिसीपल ठोस अपशिष्ट का सृजन होता है। अकेले दिल्ली में रोजाना 500 टन अपशिष्ट का सृजन होता है और सालाना 44 लाख से ज्यादा टन हानिकारक अपव्ययों का सृजन होता है। इससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह है कि सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ रहे उपयोग के कारण ई- अपव्यय बढ़ रहा है और ताजा आकलनों के अनुसार देश में उत्पादित कुल ई-अपव्यय में से केवल 10 फीसदी की ही रिसाईक्लिंग हो पाती है। एक दशक के खत्म होते होते भारत में निपटान के लिए 13 करोड़ पुराने कंप्यूटर और 90 करोड़ लैपटॉप होंगे।

इसमें कोई शक नहीं कि काम दुष्कर है पर दृढ़ संकल्प, लगन और अतिरिक्त प्रयास से लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।  पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि अपशिष्ट से भी पैसे कमाए जा सकते हैं। चेन्नई स्थित एक कंपनी रिसाईक्लिंग से सौ करोड़ रूपये का राजस्व अर्जित करती है। बैंगलोर स्थित एक अन्य कंपनी मोबाइल फोन में सोने की तलाश कर रही है (250 मिलीग्राम चांदी, 24 मिग्रा सोना और 9 मिग्रा पेलाडियम) और अगले दो वर्षो में 500 करोड़ रूपये के लक्ष्य पर उसकी नजर है।

इस अशोधित अपशिष्ट में फ्यिूज्ड डेराइव्ड फ्यूएल यानी आरडीएफ समेत ज्वलनशील अपशिष्टों से रोजाना 32,890 टन से 439 मेगावाट बिजली उत्पादन, 13 लाख क्यूबिक मीटर बायोगैस रोजाना या बायोगैस से 72 मेगावाट बिजली का उत्पादन और कृषि की सहायता के लिए सालाना 54 लाख मीट्कि टन कंपोस्ट का उत्पादन करने की क्षमता है। मौजूदा नीतियां, कार्यक्रम और प्रबंधन संरचना इस अपशिष्ट के निपटान की भीषण चुनौती का पर्याप्त रूप से समाधान नहीं करती जिसके 2031 तक 16.5 करोड़ टन तथा 2050 43.6 करोड़ टन हो जाने के आसार हैं।

बेशक, हमें गलियों की सफाई करने, खुले में शौच, पेशाब करने से रोकने और स्वच्छता की संस्कृति का अनुसरण करके इसकी शुरूआत करनी होगी। बहुत जल्द हमें ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, अपशिष्ट से उर्जा तथा औद्योगिक अपशिष्ट की चुनौती का सामना करना पड़ेगा जिसका खतरा हमारे सर मंडरा रहा है। सूरत, राजकोट, शिमला, नई दिल्ली नगरपालिका परिषद, विशाखापट्टनम जैसी विभिन्न नगरपालिकाओं के कई उदाहरण हैं जिन्होंने किसी न किसी क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है और दूसरों को भी उनसे प्रेरणा लेने और बहुत कुछ सीखने जरूरत है।

अगर हम थोड़ा पीछे देखें तो 1986 में कांग्रेस सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई सुविधाएं मुहैया कराने के लिए केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम यानी सीआरएसपी की शुरूआत की थी, लेकिन जमीनी स्तर पर ढेर सारी समस्याओं का समाधान करने में ये सफल नहीं हो सकीं। निर्मल ग्राम योजना या निर्मल भारत अभियान यानी एनबीए भी फिसड्डी साबित हुईं।

कई बार इसकी विफलता का ठीकरा निम्न वित्तीय आवंटनों पर फोड़ा गया जिसे स्वीकार करना मुश्किल है क्योंकि क्रियान्वयन की त्रृटियों को आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट है कि कुछ राज्यों में समुदाय आधारित, जागरूकता बढ़ाने वाले अभियान आधारित कार्यक्रमों के अनुभव और सीआरएसपी के मूल्यांकन के परिणामों ने 1999 में संपूर्ण स्वच्छता अभियान यानी टीएससी दृष्टिकोण के निर्माण के लिए प्रेरित किया।

इस कार्यक्रम का लक्ष्य था कि घरों, विद्यालयों में स्वच्छता सुविधाओं तथा एक स्वच्छ वातावरण के लिए मांग सृजन और जागरूकता पैदा करने पर अतिरिक्त जोर के साथ एक ‘मांग आधारित दृष्टिकोण‘ अपनाया जाए। टीएससी के तहत बेहद कम प्रोत्साहन इस कार्यक्रम के हितों के खिलाफ गया। इसलिए, आखिरकार ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता की प्रगति में तेजी लाने के लिए यूपीए सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान संपूर्ण स्वच्छता अभियान का पुनर्गठन निर्मल भारत अभियान यानी एनबीए के रूप में किया। हालांकि इसकी शुरूआत बड़े धूमधड़ाके के साथ की गई पर जल्द ही यह भी निस्तेज हो गया।

स्वच्छ भारत के एक अन्य पहलू जिसके बारे में ज्यादा चर्चा नही की गई है-बढ़ते प्रदूषण को रोकने और स्वच्छ वातावरण का निर्माण करने से जुड़ा है जो खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है और इसका स्वच्छता के साथ भी बहुत करीबी संबंध है। इसलिए सरकार को बेतहाशा बढ़ते प्रदूषण और सुरक्षा को नुकसान पहुचाने वाले तत्वों पर लगाम लगाने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ नई पहल करने की जरूरत है।

भारत 2025 तक एक मध्य आय वाला देश बने, एक निश्चित समय अवधि के भीतर और वैश्विक मानदंड के अनुरूप तथा न केवल अपशिष्ट के प्रबंधन में बल्कि स्मार्ट तरीके से रहने के मामले में भी अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी का लाभ उठाने वाला 100 स्मार्ट शहरों के स्वप्न को साकार करें, इसके लिए इनमें से कुछ और कई और मुद्वों का समाधान करना बेहद जरूरी है। जब हम एक राष्ट् के रूप में एक साथ मिल-जुल कर आएंगे और प्रतिबद्धता के साथ जमीनी स्तर पर इन मुद्वों के समाधान की ओर कदम बढ़ाएंगे तो भले ही इंडिया 2.0 का विजन दिखने में चुनौतीपूर्ण लगे-इसे साकार करना बहुत मुश्किल नहीं होगा।

comments powered by Disqus