ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली में फूंकें नया प्राण

एन सी सक्सेना: लेखक स्कॉच के डिस्टिंगुइश्ड फेलो हैं

2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम की शुरूआत से ही भारत ने शिशु उत्तरजीविता, मातृत्व मृत्यु दर, प्रतिरक्षण और जनसंख्या स्थिरीकरण जैसे अपने प्रमुख स्वास्थ्य संकेतकों में उल्लेखनीय बेहतरी हासिल की है। बहरहाल, हम अब भी 2015 तक स्वास्थ्य में मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (एमडीजी) के लक्ष्य को अर्जित करने में सक्षम नहीं हो पाए हैं। ये कमियां ग्रामीण भारत में एक निर्बल सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की ऐतिहासिक विरासत की वजह से हैं।

देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का या तो अस्तित्व नहीं है या फिर उनमें कर्मचारियों और आवश्यक वस्तुओं की भारी किल्लत है। शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकों की उपलब्धता से लेकर भौतिक चीजों तक का बड़ा अभाव है।

वित्तीय हो या गैर वित्तीय, देश में किसी भी प्रकार के प्रोत्साहन देने की कोई प्रणाली नहीं है जो ऐसे लोगों, जिनसे इस क्षेत्र में ज्यादा प्रयास किए जाने की जरूरत है, को सामाजिक मान्यता दे या आर्थिक लाभ मुहैया कराए।

दूसरी बड़ी समस्या ठेके वाले और नियमित कर्मचारियों के बीच कार्य आवंटन और पारिश्रमिक पर समानता का अभाव तथा ठेके वाले कर्मचारियों की जरूरतों को लेकर व्याप्त असंवेदनशीलता है। इससे नौकरी छोड़ने के मामलों में तेजी आती है जिसका परिणाम निम्न गुणवत्ता और कमजोर प्रदर्शन के रूप में सामने आता है।

कई राज्यों में डायग्नोस्टिक्स तथा फैसिलिटी प्रबंधन के लिए आउटसोर्सिंग की पहले की गई कोशिशों का परिणाम अपेक्षित नहीं रहा है। यह निर्धारण करना मुश्किल है कि इसकी वजह निम्न कांट्रैक्ट डिजायन रही है या मौजूदा प्रणालियों के साथ उनका तालमेल नहीं बन पाना रहा है या फिर यह समस्या हमारी व्यवस्था में ही अंतर्निहित है।

निजी अस्पतालों में दाखिल कई गरीब स्वास्थ्य बीमा योजना यानी आरएसबीवाई के तहत शामिल नहीं होते। आरएसबीवाई द्वारा अस्पतालों को की गई भरपाई पूरी नहीं होती या फिर समय पर नहीं की जाती। दावों को तकनीकी आधार जैसेकि स्मार्ट कार्ड रीडर काम नहीं कर रहा है या फिर सामाजिक पद्धति जैसे कि पांच सदस्यों का परिवार छोटी लड़की या बुजुर्ग का नाम हटा सकता है, जैसे कारणों का हवाला देकर खारिज कर दिया जाता है।

आशा ऐसा कार्यक्रम है जिसके कामकाज और उत्साही भागीदारी के बारे में सभी राज्यों से समान रूप से सकारात्मक खबरें आती हैं। आज देश में 8,48,940 आशा कार्यरत हैं। बहरहाल, पेमेंट के तंत्र, ड्ग लॉजिसटिक्स, समर्थक पर्यवेक्षण तथा प्रदर्शन आकलन उन राज्यों में एक चुनौती बनी हुई है जो एक सुप्रशिक्षित समर्थक संरचना में निवेश करने में विफल रहे हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र कई प्रकार की शाश्वत समस्याओं से जूझता रहा है जिनमें सेवाओं की गुणवत्ता, गैर मौजूदगी, अनिवार्य दवाओं की आपूर्ति में कदाचार और अंतर शामिल हैं।

स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में वित पोषण, खरीद, आपूर्ति तथा नियमन में शामिल संस्थानों की सख्त निगरानी और गुणवत्तापूर्ण प्रशासन ही निर्धारित करेगा कि क्या स्वास्थ्य क्षेत्र में अतिरिक्त निवेश स्वास्थ्य परिणामों में उल्लेखनीय बेहतरी ला सकेगा?

कम से कम डॉक्टरों को अपने प्रिसक्रिप्शन में दवाओं के जेनरिक नाम अवश्य लिखने चाहिए जिससे कि मरीजों के पास यह विकल्प तो हो कि वे ब्रांडेड दवाएं खरीदना चाहते हैं या सस्ती जेनरिक दवाएं।

एनआरएचएम के बावजूद, जीडीपी के एक हिस्से के रूप में स्वास्थ्य पर सरकार के व्यय में केवल मामूली बढोत्तरी - वित वर्ष 2004-05 के 0.9 फीसदी से 2011-12 में 1.04 फीसदी-हुई है। इनमें से बहुत कम व्यय सुदूर के गांवों तक पहुंच पाता है। वर्तमान में कोई भी- चाहे वह ग्रामीण स्तर का स्वास्थ्य कर्मी, सहायक परिचारिका, कंपाडंडर, पीएचसी चिकित्सक या फिर सीएमओ हो- किसी भी काम के करने या न करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता।

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