खाद्य सुरक्षा के लिए करें गुजरात मॉडल का अनुसरण

अशोक गुलाटी (लेखक इक्रियर में कृषि के चेयर प्रोफेसर हैं)
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वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारतीय श्रम बल का 54 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा कृषि से जुड़ा हुआ है। पिछले 20 वर्षों से हम कृषि में 4 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं और विफल हो रहे हैं। जब से सुधारों का दौर शुरू हुआ तब से ही कृषि की विकास दर 3.2 से 3.3 फीसदी के इर्द-गिर्द मंडराती रही है। फिर एक राज्य सामने आता है जो पूरे एक दशक तक, 2001 से 2011 तक 9.8 फीसदी की कृषि विकास दर हासिल करता है और उसका यह शानदार प्रदर्शन बदस्तूर जारी है। आंकड़ों के लिहाज से यह शेष भारत की तुलना में तीन गुना ज्यादा है। एक दशक पहले तक गुजरात में कृषि 2 फीसदी की दर से बढ़ रही थी, फिर अचानक यह 10 फीसदी तक पहुंच जाती है। समावेशन के लिहाज से यह अंतर काफी अधिक है क्योंकि कृषि कामकाजी लोगों की बहुसंख्यक आबादी को रोजगार देता है। अगर हम देश के स्तर पर कृषि में 5 फीसदी की वृद्धि दर भी हासिल कर लें तो यह हमें वास्तविक समावेशन की तरफ ले जाएगा।

यह जानना महत्वपूर्ण है कि गुजरात में इस तेज वृद्धि के क्या कारक रहे हैं और कैसे इसका राष्ट्रीय स्तर पर अनुसरण किया जा सकता है? पिछले 10 वर्षों के दौरान गुजरात में कॉटन उत्पादन में 800 फीसदी और खाद्यान्न उत्पादन में 300 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जिला स्तर पर हमारे विश्लेषण बताते हैं कि इस तेज वृद्धि का बड़ा हिस्सा सौराष्ट् से आया जहां उस वक्त नर्मदा का पानी नहीं पहुंचा था और यह सब चेक डैम यानी रोधक बांधों की बदौलत हुआ। एक दशक पहले जब मोदी ने गुजरात का पद भार संभाला उस वक्त 10,000 चेक डैम थे जबकि आज डेढ़ लाख चेक डैम हैं जो भूजल को रिचार्ज करते हैं। आज कॉटन की खेती से जुड़े 60 फीसदी क्षेत्र सिंचित हैं।

ठीक उलट स्थिति महाराष्ट् के विदर्भ की है जहां कॉटन खेती के ज्यादा बड़े क्षेत्र हैं लेकिन आत्महत्याओं की असामान्य रूप से बड़ी दर है क्योंकि कॉटन की खेती से जुड़े केवल 3 फीसदी क्षेत्र सिंचित हैं। गुजरात सभी पहलुओं में अच्छा कर रहा है। गुजरात में बागवानी की क्रांति आ चुकी है। वहां एपीएमसी सीधे किसानों के संपर्क में है। कोई भी, जो निजी क्षेत्र की मंडी स्थापित करना चाहता है, उसका गुजरात में स्वागत है। जबकि केंद्र के स्तर पर या भारी कृषि उत्पादन के लिए विख्यात पंजाब में भी एपीएमसी उतना सफल नहीं रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी के मामले में बिहार जैसे राज्यों की स्थिति बेहद खराब है जहां किसी बढ़िया प्रणाली, एपीएमसी या किसी अन्य विकल्प के अभाव में किसानों को एमएसपी से कम पर अपने उत्पादों को बेचना पड़ रहा है। अन्य राज्यों के विपरीत गुजरात में राज्य सरकार भी किसानों को हर प्रकार का सक्रिय सहयोग देती है। खाद्य सुरक्षा के लिए पानी बहुतायत में चाहिए जो पूर्वोत्तर भारत में है और जहां से अगली हरित क्रांति की संभावना बन सकती है बशर्ते संबंधित त्रुटियां दूर हो जाएं।

सरकारी सहयोग, निवेश को उचित प्रोत्साहन, प्रौद्योगिकी से जुडे अभिनव पहलों और कारगर वेयरहाउस प्रबंधन से बेतहाशा बढ़ रही कीमतों पर अंकुश लगाया जा सकता है। गुजरात ने हमें दूध का मॉडल दिया, ऐसे ही मॉडलों को फलों और सब्जियों के मामले में भी दुहराए जाने की जरूरत है। तब रोजगार सृजन, आमदनी और समावेशन सब एक साथ चले आएंगे। गुजरात ने हमें रास्ता जो दिखा दिया है।

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