बांग्लादेश से लें ‘स्वच्छ भारत‘ के सबक

ज्ञानेन्द्र केशरी, कार्यकारी संपादक, इनक्लुजन

भारत के 1.25 अरब लोगों में से आधे से ज्यादा खुले में शौच करते हैं और दुनिया में जितने लोग खुले में शौच करते हैं, उनमें से आधे से ज्यादा भारत में रहते हैं।

खुले में शौच करने के गंभीर स्वास्थ्य संबंधी, आर्थिक और सामाजिक परिणाम होते हैं। इनसे ऐसे कीटाणु निकलते हैं जो भूजल को प्रदूषित करते हैं और डायरिया, हैजा और टायफायड जैसी जान को खतरे में डालने वाली बीमारियां फैलाते हैं जो हर साल हजारों लोगों, ज्यादातर बच्चों को मार डालते हैं।

यह शारीरिक विकास को अवरूद्ध करता है, वयस्क की आर्थिक उत्पादकता को सीमित करता है और स्वास्थ्य देखभाल के खर्च को बढ़ाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सफाई और स्वच्छता की कमी से औसतन 6,500 रूपये प्रति व्यक्ति का नुकसान हुआ। खुले में शौच करने के कारण हजारों औरतों के साथ बलात्कार और यौन दुर्व्यवहार होता है।

इस खतरे की भयावहता को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान नामक एक पहल की है जिसका लक्ष्य 2019 तक खुले शौच को समाप्त करना और गंदगी मुक्त बनाना है।

यह चुनौती बेहद बड़ी है। लेकिन बहुत गरीब देशों समेत कई देशों ने इस चुनौती का काफी सफलतापूर्वक सामना किया है और भारत को भी अनिवार्य रूप से ऐसा करना चाहिए। भारत दूसरे देशों के अनुभवों से आखिर क्या सीख सकता है? यहां मैं उच्च आय वाले देशों की बात नहीं कर रहा हूं जिन्होंने खुले में शौच का उन्मूलन कर दिया है। एक दिलचस्प उदाहरण बांग्लादेश का हो सकता है। बांग्लादेश में तीन फीसदी से भी कम व्यक्ति खुले में शौच करते हैं जबकि भारत में यह आंकड़ा 53 फीसदी का है। पाकिस्तान में यह आंकड़ा 23 फीसदी और चीन में 1 फीसदी का है।

भारत में बड़ी संख्या में खुले में शौच करने के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि ज्यादातर लोग गरीबी के कारण शौचालय नहीं बनवा सकते। लेकिन क्या वास्तव में इसका देश की आर्थिक स्थिति से कोई लेना देना है? अगर ऐसा होता तो बांग्लादेश की स्थिति भारत की तुलना में बहुत खराब होती। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय 2013 में 829 डॉलर थी जबकि भारत की 1,499 डॉलर थी। इसका अर्थ यह हुआ कि भारतीय बांग्लादेशियों की तुलना में लगभग दोगुने धनी हैं। दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि यह एक सांस्कृतिक समस्या है। लेकिन भारत और बांग्लादेश में सांस्कृतिक रूप से बहुत का अंतर नहीं है। फिर खुले में शौच करने में अंकुश लगाने में बांग्ला देश की सफलता के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

हम शौचालय के प्रति मूलभूत रूप से क्या नजरिया रखते हैं, इसे आंशिक रूप से इस प्रकार समझा जा सकता है। भारत में ज्यादातर लोग जो खुले में शौच करते हैं, शौचालय को एक विलासिता के माध्यम के रूप में देखते हैं। या तो वे बेहतरीन शौचालय चाहते हैं या फिर खुले में शौच करना पसंद करते हैं। बांग्लादेश में खुले में शौच करने के खात्मे के लिए जिन सरल शौचालयों का उपयोग किया गया है, उनकी लागत क्रय शक्ति समता पर लगभग 2,500 रूपये आती है। इसकी तुलना भारत के साथ करें। भारत सरकार शौचालयों के निर्माण के लिए 10,000 करोड़ रूपये की सब्सिडी देती रही थी। विभिन्न शौचालय निर्माण कार्यक्रमों के तहत, केंद्र सरकार ने 2001 के बाद से 9.35 करोड़ शौचालयों के निर्माण पर 150 अरब रूपये से अधिक खर्च किए हैं। स्वच्छ भारत अभियान की नई पहल के अंतर्गत शौचालयों के निर्माण के लिए सब्सिडी दोगुनी कर दी गई है।

वास्तव में, पोर फ्लश कम्पोस्ट शौचालय जिसका उपयोग बांग्लादेश, चीन और वियतनाम जैसे देशों में खुले में शौच करने की समस्या से निपटने के लिए किया जा रहा है, का आविष्कार भारत में बिंदेश्वरी पाठक के नेतृत्व वाली सैनिटेशन चैरिटी कंपनी सुलभ इंटरनेशनल द्वारा किया गया था। इसकी प्रौद्योगिकी सरल और सस्ती है। शौचालय सुविधा के लिए दो गड्ढे किए जाते हैं। जब एक गड्ढा भर जाता है तो उसे ढंक दिया जाता है और दूसरे गड्ढे का उपयोग किया जाता है। लगभग दो वर्षों में ढंके हुए गड्ढे का अपशिष्ट सूख जाता है, उसमें से रोगाणु खत्म हो जाते हैं और वह खाद के लिए तैयार हो जाता है। ऐसे शौचालयों में पारंपरिक शौचालयों की तुलना में कम पानी का इस्तेमाल होता है। इनमें फ्लश के लिए केवल 1.5 से 2 लीटर पानी की जरूरत होती है जबकि आधुनिक शौचालयों में प्रति फ्लश 12 से 15 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। इसके अतिरिक्त, दो गड्ढों वाले शौचालयों में भूमिगत सीवर लाइनों से जुड़ने की जरूरत नहीं होती जिनकी वैसे भी गांवों में कोई उपलब्धता नहीं होती।

आचरण में बदलाव भी एक अन्य बड़ी चुनौती है। केवल शौचालयों के निर्माण से समस्या का समाधान नहीं होगा। फोकस शौचालयों के उपयोग को बढ़ावा देने पर भी होना चाहिए। हम अक्सर जन सुविधा मूत्रालय केंद्रों के बाहर लोगों को पेशाब करते देखते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। एक कारण जन सुविधा केंद्रों का निम्न डिजायन और स्वच्छता हो सकता है। यह एक व्यवहारगत मुद्वा है।

खुले में शौच करना बेहद आम है, उन घरों में भी यह देखा जाता है जहां शौचालय की सुविधा है। इसलिए इस व्यवहारगत समस्या को बदलने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि लोग इसे रोजाना की मूलभूत आवश्यकता के रूप में देखें और इन सुविधाओं की मांग करें, एक व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है।

यह केवल एक आपूर्ति पक्ष का मुद्वा नहीं है। शौचालयों का केवल निर्माण ही खुले में शौच की समस्या के उन्मूलन के लिए पर्याप्त नहीं है। यह मांग आधारित होनी चाहिए। लोगों को सामने आना चाहिए, इसकी मांग करनी चाहिए और जहां भी संभव हो, इसका उपयोग करना चाहिए।

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