भविष्य के लिए माइक्रोफाइनेंस एजेन्डा

चंदशेखर घोष
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माइक्रोफाइनेंस एक व्यवहार्य व्यवसाय साबित हुआ है जो गरीबों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। इस सेक्टर के और विकसित होने के लिए एमएफआई को बचत जमाओं को लेने की अनुमति दी जानी चाहिए और विनियमन को उन्हें इजाजत देनी चाहिए कि वे निम्न आय समूहों के लिए पूर्ण वित्तीय सेवा चैनल बन सकें

एक सम्मानित जीवन और अति गरीबी के खिलाफ संघर्ष अभी भी मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। दुनिया में 4 अरब लोग गरीबी में जीते हैं। हाल में आई बेहतरी के बावजूद लगभग 98 करोड़ लोग जोकि विश्व की आबादी के 6ठे हिस्से से अधिक हैं- को रोजाना 1 डॉलर से कम पर गुजारा करना पड़ता है। गरीबी की वजह से ही 7.7 करोड़ बच्चों को कोई प्राथमिक शिक्षा नहीं मिलती। इसमें कोई शक नहीं कि सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों यानी मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल्स तक पहुंचने की दिशा में कुछ प्रगति हुई है लेकिन अभी लंबा फासला तय करना है। भारत की ग्रामीण आबादी के लगभग 30 फीसदी हिस्से के लिए गरीबी एक स्थायी स्थिति बनी हुई है।

भारतीय आबादी के 50 फीसदी से भी ज्यादा हिस्से की मूलभूत वित्तीय सेवाओं तक पहुंच नहीं है। भारत में 41 फीसदी आबादी बैंकों की सुविधाओं से वंचित हैं। शहरों में 40 फीसदी तथा गांवों में 61 फीसदी तक बैंकों की पहुंच नहीं है। पूर्वी क्षेत्रों में स्थिति और खराब है। भारत में लगभग 20.3 करोड़ परिवार हैं जिनमें से 14.7 करोड़ ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। 8.9 करोड़ खेतिहर परिवारों में से 51.4 फीसदी की ऋण के औपचारिक या अनौपचारिक स्त्रोतों तक कोई पहुंच नहीं है। पूरी बैंकिंग प्रणाली ऐसी रही है कि वे बिना बैंक सुविधा वाली या जिन तक कोई सुविधा नहीं पहुंच रही है, उन्हें बैंकिंग सुविधा देने से बचते रहे हैं। ऐसा विभिन्न कारणों से होता रहा है जैसे- काफी जोखिम एवं लागत का शामिल होना, आमदनी की अनियमित प्रणाली, जमानती अग्रिम की पेशकश करने में अक्षमता, छोटे ऋणों की मांग तथा ऐसी ही अन्य वजहें।

इन्हीं कारणों की वजह से माइक्रोफाइनेंस की क्रांति आई। भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर एक उद्योग के रूप में परिपक्व हो गया है और गरीबों के वित्तीय समावेश को अर्जित करने के एक कारगर माध्यम के रूप में स्थापित हो चुका है। यह देखना बहुत उत्साहवर्द्धक है कि इस अपरिभाषित सेक्टर को आकार देने के लिए बहुत सारे काम किए जा रहे हैं।

इस सेक्टर के लिए आंध्र प्रदेश में 2010 में आया अध्यादेश एक बड़ा झटका साबित हुआ लेकिन उस संकट से कुछ सकारात्मक चीजें भी निकल कर सामने आईं। एमएफआई को बैंक सुविधा रहित लोगों तक पहुंचने के लिए बैंकों की विस्तारित शाखाओं के रूप में मान्यता दे दी गई है। भारतीय रिजर्व बैंक ने गैर बैंकिंग वित कंपनियों यानी एनबीएफसी के एक विशेष कैटेगरी के रूप् में एमएफआई को मान्यता दे दी है और इस सेक्टर के लिए एक सुस्पष्ट दिशानिर्देश देते हुए एक सर्कुलर जारी किया है।

हालांकि माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में विभिन्न संस्थानों ने  बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन इस क्षेत्र की धूमिल हो चुकी छवि को ध्यान में रखते हुए साझीदारों और आम लोगों की नजरों में इसे स्वच्छ दिखने के लिए इसकी पूरी पुर्नसज्जा की जरूरत है। एमएफआई ग्राहक सुरक्षा प्रचलन सुनिश्चित करने, जिम्मेदारीपूर्ण उधारी देने से जुड़ने और आचार संहिता को सख्ती से बनाये रखने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रही है। साथ ही, अपने वित्तीय और सामाजिक लक्ष्यों के बीच एक संतुलन बनाये रखने की दिशा में भी लगातार ध्यान दे रही है।

मुख्य बातें:

1     वित वर्ष 2012-13 की तुलना में इंडस्ट्री जीएलपी में 29 फीसदी की बढ़ोतरी

2     वित वर्ष 2013-14 की तीसरी तिमाही के दौरान ऋण संवितरण में 52 फीसदी की बढोतरी

3    वित वर्ष 2013-14 की तीसरी तिमाही के दौरान पीएआर संख्या 2 फीसदी के नीचे बनी रही

4     पूरे देश के आधार पर औसत ऋण राशि संवितरण 15,000 रूपये से नीचे बना रहा

5     उद्योग की उत्पादकता का अनुपात वित वर्ष 2013-14 की तीसरी तिमाही के दौरान लगातार बेहतर बना रहा

6     पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू, केरल, बिहार, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उधारी ने उच्च विकास प्रदर्शित किया है

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