हैमलेट, हैदर और नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर

समीर कोचर, मुख्य संपादक, इनक्लूजन और मोदीनोमिक्स के लेखक एवं गुरशरन धन्जल, संपादक, इनक्लुजन
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विशाल भारद्वाज की हालिया चर्चित फिल्म हैदर के एक पोस्टर में अभिनेता शाहिद कपूर

नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर यानी एनआईसी के संदर्भ में ‘हो या न हो‘ का यक्ष प्रश्न लंबे समय से उठाया जाता रहा है। जब इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग यानी डेयटी के सचिव यह कहते हैं कि एनआईसी के पास प्रधानमंत्री द्वारा परिकल्पित ‘डिजिटल इंडिया‘ को क्रियान्वित करने की क्षमता का एक अंश भी नहीं है तो इस वक्तव्य को या तो एनआईसी की एक आलोचना या फिर एनआईसी को जीवंत बनाने की एक योजना शुरू करने की पूर्व-भूमिका के रूप में देखा जा सकता है जो एनआईसी को एक ऐसे मजबूत सूचना प्रणाली संगठन के रूप में बदल देने में मदद करे जिसपर कोई भी देश गर्व महसूस करे।

एनआईसी के महानिदेशक के रूप में बी के गैरोला के कार्यकाल को एनआईसी के शेक्सपियर के विख्यात ट्रैजेडी नाटक हैमलेट की महान दुविधा के रूप में तबदील हो जाने के लिए याद किया जाएगा। फिल्मों के दीवानों को विशाल भारद्वाज की हालिया फिल्म हैदर की दुविधा में इसकी झलक मिल सकती है।

बी के गैरोला ने 2006 में एन विजयादित्य से पद भार ग्रहण किया और अगले छह वर्षों तक एनआईसी का संचालन किया। जिस वक्त वह यहां आए, उनकी छवि एक बेदाग और सम्मानित अधिकारी की थी पर उन्हें एक आंतरिक बखेड़े का भी सामना करना पड़ा था। वह लगातार प्रौद्योगिकी और विचारधारा, नौकरशाही और प्रशासन, और आधिकारिक नीतियों के मुकाबले वैज्ञानिकों के प्रभुत्व में संतुलन बनाये रखने के लिए लड़ते रहे। इनमें से ज्यादातर वैचारिक लड़ाई थी जिसकी किसी वैज्ञानिक संस्थान में कोई जगह नहीं थी।

भारतीय प्रशासनिक सेवा से उन्हें काफी चिढ़ थी। वह एक राष्ट्रीय मानक के रूप में भारत द्वारा मुक्त स्त्रोत को अपनाए जाने के घोर समर्थक थे, भले ही हर परिदृश्य में वह लागू होता हो या नहीं। जहां उन्होंने सभी के लिए प्रशासन की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली के रूप में पंचायती राज का समर्थन किया, प्रौद्योगिकी के मामले में उन्होंने सभी प्रौद्योगिकी फैसलों के पूर्ण केंद्रीयकरण को बढ़ावा दिया।

उनके प्रोफाइल में इसका जिक्र है कि वह देश के शीर्ष राजनीतिक और कार्यकारी नीति निर्माताओं के बीच आईटी संस्कृति को फैलाने के लिए जिम्मेदार थे। वह राजनीतिज्ञों को प्रभावित करने के जरिये बदलाव लाना चाहते थे और इस क्रम में उन्होंने कांग्रेस के प्रति वफादारी ओढ़ ली। ऐसी राजनीतिक निष्ठाओं और झुकावों का रोजमर्रा के कामों में प्रभाव दिखना निहायत लाजिमी है। इसके परिणामस्वरूप एक भारी राजनीतिक रूझान वाले एनआईसी का वजूद सामने आया। और फिर इसने वर्तमान ‘हैदर‘ जैसी अशांति और दुविधा की स्थिति को जन्म दिया।

गैरोला के बाद अगले कुछ वर्षों तक एनआईसी का संचालन उनके विश्वासपात्र वाई के शर्मा ने किया जो गैरोला की विरासत को आगे बढ़ाने के माध्यम थे और जो तब तक इलेक्ट्रिनक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग में प्रवेश कर चुके थे।

तब से, यह संगठन लगातार राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है जहां एक डीडीजी अन्य डीडीजी के खिलाफ भिड़ते नजर आते हैं और ऐसा लगता है मानों शतरंज की बिसात बिछी हुई हो। लोगों को डीजी के बतौर प्रमोट किया गया, भले ही वह 24 घंटे की अवधि के लिए ही क्यों न हो और इस तरह किसी संगठन का मजाक बना कर रख दिया गया।

गैरोला और शर्मा दोनों ही भले आदमी हैं, देश के लिए अच्छे हैं और उन्होंने ढेर सारे उल्लेखनीय काम भी किए हैं। वे शायद सरकार से बाहर रखकर देश की ज्यादा अच्छी तरह सेवा कर सकते थे जितना इसके अंदर रहकर किया।

अब सत्ता मोदी सरकार के हाथों में है और ‘डिजिटल इंडिया‘ मुहिम परिवर्तन की एक प्रमुख रणनीति बन चुकी है, उम्मीद है कि अतीत की गलती दुरूस्त कर दी जाएगी। एनआईसी की भूमिका को एक ऐप्लीकेशन डेवेलपर, कोड लिखने वाले और सिस्टम एनालिटिक्स करने वाले से बदल कर ज्यादा मोनीटर और डिजायन करने वाले तथा एक समग्र सिस्टम ढांचा डेवलप करने वाले की होनी चाहिए और मास्टर कोडर्स की एक टीम बनाई जानी चाहिए।

इसे फिर से अत्याधुनिक कौशलों वाले एक संगठन के रूप में उभर कर आने की जरूरत है। और यह तभी होगा जब एक नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स कैडर सृजित होगा।

एनआईसी के लिए सर्वश्रेष्ठ भूमिका ऐप्लीकेशंस के एक स्ट्रैटजिक कंट्रोलर की होगी जबकि नियमावलियों को पूरी तरह बाहरी स्त्रोत को ठेके पर दिया जाए। यह एक पुराना संस्थान है जिसके लिए उद्योग के गठबंधनों के अवसर ढूंढने की जरूरत है बजाये उनके साथ प्रतिस्पर्धा करने की।

ल्ेकिन हकीकत कुछ और ही है। एनआईसी एक वर्ष से अधिक समय से प्रमुखविहीन है, एनआईसी के टेक्निकल कर्मचारियों की प्रोन्नति पिछले चार वर्षों से नहीं की गई है, ग्रामीण ई-गवर्नेंस को सहायता देने के लिए टेक्निकल अधिकारियों के प्रखंड स्तरीय विस्तार कार्य, जिसे सिद्धांत रूप में इलेक्ट्रिनक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग से मंजूरी भी मिल चुकी है, का भी अनुपालन नहीं किया गया है, और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद आर्हता की तारीख से पुराने प्रमोशन का मामला विचाराधीन पड़ा हुआ है।

एनआईसी को 2000-06 के दौरान एन विजयादित्य के कार्यकाल में बेपनाह इज्जत मिली। उस समय अंकीय हस्ताक्षर, भौगोलिक सूचना प्रणाली, वेब नाम पंजीकरण जैसेकि गॉव डॉट इन और एनआईसी डॉट इन, इंटरनेट आंकड़ा केंद्र, वीडियो दूर सम्मेलन, जैव चिकित्सा और पैटेन्ट सूचना विज्ञान तथा दफ्तर प्रक्रिया स्वचलीकरण जैसी उल्लेखनीय पहलें दर्ज की गईं।

ऐतिहासिक रूप से, एनआईसी सबसे मजबूत संस्थानों में रहा है जिस पर सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली को विकसित करने की जिम्मेदारी रही है और इसे पंचायतों के स्तर तक भी प्रक्रियाओं को संस्थागत बनानेे का श्रेय दिया जा सकता है। शासन कोई और करता रहा हो पर नेटवर्क्स, जेनरिक और विशिष्ट वेब सेवा का संचालन एनआईसी करता रहा। इस प्रक्रिया में, इसने कई ऐप्लीकेशंस डेवेलप किए जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश में शुरू किया गया। बाद में इसे 2004 में घोषित नेशनल ई-गवर्नेंस प्लान यानी एनईजीपी से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा जिसने बहुचर्चित पीपीपी प्रणाली में निजी भागीदारी को आमंत्रित किया। सी-डैक और एनआईएसजी जैसे संस्थानों की स्थापना को प्रतिस्पर्धा के बतौर लिया गया। एनआईसी ने तब भी अपना महत्व बनाये रखा क्योंकि इसके साथ एक विरासत जुड़ी थी और जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी बनाये रखने का आत्म विश्वास था जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती थी और जो निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए ‘बहुत आकर्षक‘ क्षेत्र नहीं था। इसकी ताकत का एक कारण यह भी था कि एनआईसी का वेब पता सरकार के एक सूचना प्रौद्योगिकी विभाग और सेवा संगठन होने तक ही सीमित था।

इन सबके अलावा, राजनीतिकरण के बाद विभाजन और शासन की नीति ने मौजूदा परिस्थिति में एनआईसी के विकास को अवरूद्ध कर दिया। प्रारंभ में यह केवल धारणा थी लेकिन धीरे धीरे यह हकीकत में तबदील होती जा रही है। यह प्रतिस्पर्धा को खुले दिल से नहीं ले सकी। कोढ़ में खाज यह कि शीर्ष स्तर पर निम्न परिचालन ने इसके नेतृत्व की सीमा बाधित कर दी जिसका सुख ऐतिहासिक रूप से एनआईसी उठाती रही थी।

अगर पूरे देश भर में फैले 4000 से अधिक टेक्निशियनों के इस बड़े प्रतिभावान समूह के साथ समझौता किया गया तो यह संस्थागत क्षरण पूरे ई-गवर्नेंस तथा डिजिटल इंडिया इको सिस्टम के लिए बाधक साबित हो सकता है। कहने की जरूरत नहीं कि इसके राष्ट्रीय सुरक्षा निहितार्थ भी बहुत व्यापक होंगे।

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