टीआरपी की होड़ करा सकता है भारत-पाक में जंग

गुरशरन धन्जल, संपादक, इनक्लुजन
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पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सीमा में की गई गोलाबारी: चित्र पीटीआई

मोदी सरकार ने संप्रग 2 से विरासत में प्राप्त खराब आर्थिक स्थिति से उबरने, भारत को एक निवेश गंतव्य के रूप में विश्व के ध्यान केंद्र में लाने की कोशिश में अभी अभी अपने पांव जमाना शुरू ही किया है कि एक युद्ध जैसे हालात का खतरा मंडराने लगा है जो देश को एक अभूतपूर्व आर्थिक विषाद में डाल सकता है। अगर युद्ध का साया मंडराता है तो क्या कोई महसूस करता है कि इससे सबसे ज्यादा प्रभावित कौन होंगे- भारत के गरीब। भारत को स्मार्ट शहरों, स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया और सबसे महत्वपूर्ण मेक इन इंडिया जैसी अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं से हाथ धोना पड़ सकता है। इसका सबसे ज्यादा लाभ चीन को होगा जिसने पहले ही भारत को अपने एक संभावित प्रतिद्वंदी के रूप में देखना शुरू कर दिया है। यह अब सर्वविदित बात है कि पाकिस्तान और चीन के बेहद अच्छे सामरिक ताल्लुकात हैं।

अगर कारगिल जैसी पहाड़ी लड़ाई से देश को 10,000 करोड़ रूपये का नुकसान हो सकता है तो भारत-पाकिस्तान सीमा संघर्ष पर इससे चार से पांच गुना ज्यादा नुकसान हो सकता है। युद्ध पर ऐसे खर्च का मतलब होगा बुनियादी ढांचे और सामाजिक क्षेत्रों पर सरकार का कम व्यय।

ऐसी स्थिति में मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में एक सकारात्मक सार्वजनिक विचारधारा का निर्माण करने में अहम और जिम्मेदार भूमिका का निर्वाह करता है। इसे आम लोगों की आवाज का प्रतिनिधि, एक मंच समझा जाता रहा है और ऐसा माना जाता है कि निश्चित रूप से इसे तटस्थ, सच्चा लोकतांत्रिक और रचनात्मक होना चाहिए।

लेकिन इस लोकतांत्रिक भूमिका के विपरीत भारतीय मीडिया, खासकर, टेलीविजन न्यूज चैनल जिनपर चर्चित पत्रकारों का दबदबा है, टीआरपी की होड़ में इस कदर से शामिल हो गए हैं जो वास्तविक पत्रकारिता की मूल भावना के भी खिलाफ जाती दिख रही है।

एक बेहद प्रतिस्पर्धी वातावरण में, प्राइम टाइम यानी मुख्य समय पर दिखाए जाने वाले समाचार कार्यक्रमों में इस तरह के कर्णकटु कार्यक्रमों का वर्चस्व रहा है जिनमें पूरे जोर शोर से एक दूसरे पर चिल्लाने, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने, समाचार उद्घोषक यानी न्यूज एंकर की सोच और विचारधारा को बदलने पर बाध्य करने, अनिर्णायक बहसों और आम तौर पर दर्शकों के लिए सरदर्द से ज्यादा कुछ नहीं रहा है। बहस जितनी ज्यादा शोर गुल वाली होगी, टीआरपी उतनी अधिक होगी और विज्ञापन का राजस्व भी उतना बड़ा होगा। मीडिया के ये मठाधीश क्या इस बात को महसूस करते हैं कि पैनल या बहस में भाग लेने वाले या फिर एंकर भी अपनी आवाज का सुर बेहद उंचा करके, एक दूसरे के खिलाफ सभी प्रकार के कठोर शब्दों का प्रयोग करके, क्या हम एक दूसरे या फिर देश की भावना को संतुष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं या कोई काल्पनिक युद्ध छेड़ने जा रहे हैं।

एक टेलीविजन बहस में अभी हाल में पाकिस्तानी सेना द्वारा नियंत्रण रेखा से पांच किलोमीटर भीतर भारतीय सीमा में गोलाबारी पर चर्चा हो रही थी जिसमें एक 13 वर्ष के बच्चे समेत कुछ नागरिकों की मौत हो गई थी। इस चर्चा में चार लोग भाग ले रहे थे जिनमें दो भारत के थे और दो पाकिस्तान के।

इस बहस का उद्वेश्य शुरू से ही बिल्कुल स्पष्ट था कि पाकिस्तान के पैनलिस्टों को यह स्वीकार करने को विवश किया जाए कि पाकिस्तानी सेना गलत कर रही है। जब यह मुद्वा उठाया गया कि कुछ दिन पहले भारतीय सेना द्वारा किए गए हमले में भी चार पाकिस्तानी मारे गए थे, चैनल ने चालाकी से आवाज का स्तर कम कर दिया और भारतीय पैनलिस्ट को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया जिसने पाकिस्तानी सेना को एक ‘दुष्ट सेना‘ बताया ( इस बार आवाज बढ़ा दी गई-एंकर से भी ज्यादा तेज कर दी गई)।

मुझे पूरा भरोसा है, इस कार्यक्रम को देखने से भारत के कट्टर समर्थकों की भावनाएं पर्याप्त रूप से भड़की होंगी और विज्ञापनदाताओं के दिल बल्ले बल्ले हो गए होंगे क्योंकि उंची टीआरपी दर्ज की गई होगी। पाकिस्तानी पक्ष के बारे में जितना कम कहा जाए, उतना बेहतर। यह अनुमान लगाने के लिए कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि इलेक्ट्रानिक चैनलों पर भड़काने वाले कार्यक्रमों ने पहले ही मामले को इतना उकसा दिया है कि सीमा सुरक्षा बल को जबावी कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा।

ऐसे ही एक दूसरे बहस में, पाकिस्तानी पक्ष में बैठे पैनलिस्ट को बोलने का भी अवसर नहीं दिया गया, हालांकि कार्यक्रम के दौरान उन्हें बोलने के लिए कई बार आमंत्रित किया गया। वास्तव में, जब भी उन्होंने मुंह खोलना चाहा, ‘चर्चित एंकर‘ ने बार बार उसमें बाधा पहुंचाई और इतनी बाधा पहुंचाई कि वह लाइव प्रसारण के दौरान कार्यक्रम से उठकर बाहर चले गए।

उस पीड़ा और उकसावे को समझिए जो स्टूडियो से बाहर तक चला जाता है। भारतीय पक्ष के हम लोग यह महसूस कर सकते हैं कि हमने एक पाकिस्तानी को खूंटी पर उल्टा लटका दिया, सीमा पार के लोगों में इसकी विपरीत भावना हो सकती है। न्यूज चैनलों के लिए यह कोई अच्छा समाचार भले ही न बने, दर्शकों के लिए मुर्गों की लड़ाई जैसा एक अच्छा कार्यक्रम तो निश्चित रूप से बनता ही है जिससे कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

टेलीविजन कार्यक्रमों में पैनल में भाग लेने वालों के बोलने की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल उठते हैं। समाचार उद्घोषक जो चाहे, बोलने के लिए स्वतंत्र है। क्या किसी को यह कहने की अनुमति दी जानी चाहिए कि ‘देश जानना चाहता है‘। सेंसर बोर्ड की ही तरह एक समाचार नियामक की भी अत्यंत आवश्यकता है जो ऐसी खबरों पर रोक लगाए जो देश के हित में नहीं है और संघर्ष या सांप्रदायिक तनाव पैदा कर सकता है।

भारतीय टेलीविजन के इतिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि समाचार कार्यक्रमों को ‘मनोरंजन‘ के बतौर लिया गया हो। ज्यादातर मामलों में, प्राइम टाइम के समाचार कार्यक्रमों को विज्ञापनदाताओं द्वारा हिन्दी के धारावाहिकों की तुलना में भी ज्यादा पसंद किया जाता है। मोदी सरकार के हाथों को मजबूत बनाने के लिए एक जिम्मेदार मीडिया की अभी सख्त जरूरत है जो दोनों देशों के संबंध में लंबे समय तक रही खाई को भरने में प्रेरक हो। एक युद्ध का दुष्परिणाम देश के बुनियादी ढांचे के विनाश, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के अवरूद्ध होने और उत्पादन तथा आवागमन के अस्त व्यस्त हो जाने के रूप में सामने आएगा। भारत आर्थिक रूप से मजबूत बने और आर्थिक शक्ति के साथ क्षेत्रीय मुद्वों पर जीत हासिल करे, जिसमें वह सक्षम है, इसके लिए दक्षिण एशिया क्षेत्र में शांति होनी चाहिए। अभी समय भारत के आर्थिक मूल्य को दुनिया भर में विस्तारित करने का है, आपस में भिड़ने या संघर्ष करने का नहीं। देशभक्त बनना पाकिस्तान की आलोचना करने के बराबर नहीं है अगर आप इस चक्कर में अपने ही देश का नुकसान कर बैठें।

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