कौशल विकास योजनाओं को युक्तिसंगत बनाने की है दरकार

बी के झा, विशेष संवाददाता, इनक्लुजन

कौशल का अंतर देश में बड़ी संख्या में युवाओं के रोजगार के लिए एक बड़ी चुनौती है। नई सरकार ने कौशल विकास को शीर्ष प्राथमिकता दी है और काफी सलाह मशविरों के बाद परिणाम पर फोकस के साथ इस नई योजना को साल के अंत तक लागू कर दिया जाएगा। कौशल विकास पर केंद्रीय सरकार की योजनाओं को युक्तिसंगत बनाने पर सचिवों की एक समिति ने अपनी अनुशंसाएं सौंप दी है और कौशल विकास मंत्रालय ने समिति की अनुशंसाओं को 15 अक्तूबर 2014  तक टिपण्णियों के लिए इसे सार्वजनिक वेबसाइट पर डाल दिया है।

समिति ने कौशल अंतर से संबंधित कुछ बड़ी चुनौतियों का हल करने का प्रयास किया है। इस कवायद का उद्वेश्य ‘कुशल भारत‘ के विकास को प्रभावित करने वाली कमियों को दूर करना और भारत को कौशलपूर्ण बनाने से संबंधित नई चुनौतियों का सामना करने में योजना को कारगर बनाना है। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि सरकार दिसंबर के अंत तक एक सुपरिभाषित, पुनर्गठित और विवेकपूर्ण कौशल विकास योजना का आगाज कर देगी।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि भारत के कामकाजी उम्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा वैसे क्षेत्रों के साथ उत्पादकतापूर्ण तरीके से जुड़ने में अक्षम है जिनकी पहचान देश के भविष्य के विकास को आगे बढ़ाने के लिए की गई है। बाजार के लिए जरूरी कौशलों की कमी की वजह से बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। प्रशिक्षण और भौतिक बुनियादी ढांचे की निम्न गुणवत्ता और नौकरी के अवसरों की कमी ने वर्तमान में जारी स्व-रोजगार शिक्षा प्रशिक्षण प्रणाली यानी वेट को निरर्थक बना दिया है।

भारत ने 2022 तक उत्पादक तरीके से जुड़े 50 करोड़ कुशल युवकों का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, इसलिए प्रशिक्षण प्रणाली को बीच में छोड़ देने वाले-वेट प्रशिक्षुओं की समस्या को हल करने की जरूरत है जो रोजगार की रूपरेखा, रोजगार के माहौल या तनख्वाह के कारण रोजगार की पेशकश को स्वीकार नहीं करते या नौकरी छोड़ देते है।

प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश अपनी बड़ी आबादी की पूरी क्षमता का लाभ उठाए और इसके लिए उन्होंने तीन पहलुओं-कौशल विकास, पैमाना और गति पर जोर देते हैं। पिछली सरकार ने कौशल विकास पर गुजरात मॉडल को स्वीकार किया था। अब कौशल विकास मंत्रालय को कौशल विकास योजनाओं को युक्तिसंगत बनाने के लिए कौशल्य वर्द्धन केंद्र यानी केवीके जैसी योजनाओं को शामिल करने की जरूरत है।

गुजरात ने सर्वश्रेष्ठ कीमत पर सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को सीधे नियुक्त करने के लिए निजी कंपनियों और उद्यमियों के लिए एक मिलन बिंदु सृजित करने का अनोखा तरीका निर्मित किया है। केवीके पाठ्यक्रमों का डिजायन भागीदारी वाले दृष्टिकोण के साथ गांवों में कौशल्य सभाओं के गठन पर बनाया गया है। ऐसे भागीदारी वाले दृष्टिकोण निश्चित रूप से प्रशिक्षण वैल्यू चेन के बीच के उम्मीद-आपूर्ति अंतरों को मिटा देंगे तथा प्रशिक्षु के बीच में ही छोड़ देने की संभाव्यता को कम कर देंगे।

कई अध्ययनों एवं अनुसंधानों से पता चलता है कि अभी तक स्व-रोजगार शिक्षा नियोक्ता मांग से ही प्रेरित रही है। प्रशिक्षण देने वाले बड़ी संख्या में कुशल श्रमिकों को प्रशिक्षण देते हैं जिन्हें व्यवसायों में खपाया जा सकता है लेकिन वे जल्द ही नौकरी छोड़ देते हैं या अपनी नौकरी गवां देते हैं क्योंकि रोजगारयोग्य नहीं होते।

इसके अतिरिक्त, कुशल भारत कार्यक्रमों ने अभी तक किशोरों को लक्षित नहीं किया है। पहला कदम लोगों को बेहद कम उम्र में, संभव हो तो 15 से 18 वर्ष की उम्र में स्व रोजगार शिक्षा के लिए आकर्षित किया जाना चाहिए था।

परिणाम पर फोकस के साथ विवेकीकरण प्रयास निश्चित रूप से प्रशिक्षुओं के लिए एक बेहतर वातावरण का निर्माण  करने में मददगार  होंगे  जिससे कि वे स्व रोजगार कैरियरों को चुनें तथा देश को एक तेज, समावेशी और टिकाउ विकास अर्जित करने में सहायता करें।

प्रधानमंत्री के पास गुजरात के एक कारगर, समग्र और सफल कौशल विकास कार्यक्रम का व्यक्तिगत तजुर्बा है। ऐसा नहीं लगता कि समिति ने नई नीति के लिए सलाह मशविरों की प्रक्रिया के दौरान गुजरात मॉडल के दिशानिर्देशकारी सिद्धांतों को नजरअंदाज किया होगा। समिति ने परिणामोन्मुखी प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कौशल विकास की पुनर्परिभाषा, सख्त निगरानी, राज्यों के साथ बेहतर समन्वय और सभी केंद्रीय योजनाओं, कार्यक्रमों और उप योजनाओं के लिए कौशल विकास गतिविधियों के हेतु न्यूनतम 7.5 फीसदी आवंटन की जोरदार अनुशंसा की है।

कौशल उद्यमशीलता मंत्रालय के सचिव सुनील अरोड़ा बहुत भरोसे के साथ कहते हैं ‘ कौशल विकास मंत्रालय परिणाम आधारित प्रशिक्षण पर फोकस करेगा। हम वास्तव में यह समझना चाहते हैं कि हमारे द्वारा दिया गया प्रशिक्षण लाभार्थियों के लिए रोजगार की गुणवत्ता को बढ़ा रहा है या नहीं ‘।

प्रधानमंत्री द्वारा परिकल्पित ‘कुशल भारत‘ मिशन तभी अर्जित किया जा सकता है जब सरकार सभी प्रयासों को एकजुट तथा समन्वय करे। स्थानीय अपेक्षाओं, मांग और स्थितियों की पूर्ति के लिए कौशलों की आपूर्ति की जरूरत होगी। क्षेत्रीय असमानता एक अलग चुनौती है। हमारे देश की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में रहती है। इन लाखों युवाओं को आधुनिक श्रम बल का हिस्सा बनने के लिए आवश्यक कौशलों से उचित तरीके से सुसज्जित करने के लिए कौशल विकास और औपचारिक शिक्षा प्रणाली के समेकन की जरूरत है। इसके लिए केंद्रीय और राज्य सरकारों के बीच समन्वय के लिए एक अखंड दृष्टिकोण को भी संस्थागत बनाने की आवश्यकता है।

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