भारत में बैंकिंग के नए युग का सूत्रपात

अतुल ठाकुर, सीनियर एसोसिएट एडीटर, इनक्लुजन
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भारतीय बैंकिंग प्रणाली वर्तमान में कुछ असामान्य संरचनात्मक बदलावों से गुजर रही है और स्वाभाविक रूप से जिस एक की चर्चा फिजां में ज्यादा गूंज रही है उसका नाम ‘विभेदी बैंक‘ है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन इस व्यावहारिक विचार के समर्थक बताये जाते हैं।

सिद्धांत रूप से, अदा करने वाले बैंक और छोटे बैंक ‘ विभेदी बैंक‘ होते हैं जिनका सामान्य लक्ष्य वित्तीय समावेश को बढ़ावा देना होता है। छोटे बैंक सभी मूलभूत बैंकिंग उत्पाद मुहैया कराएंगे लेकिन संचालन का दायरा उनका सीमित होता है। अदा करने वाले बैंक डिमांड डिपोजिट को स्वीकार करने और फंडों का विप्रेषण जैसे सीमित दायरे के उत्पाद मुहैया कराएंगे लेकिन उनका खासकर सुदूर क्षेत्रों में पहुंच स्थलों का नेटवर्क व्यापक होगा।

ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में काम करने वाले अन्य सभी मौजूदा बैंकों की तरह प्रौद्योगिकी और व्यवसाय मित्रों की भूमिका इन नए बैंकों के लिए अहम होगी। फिर इनमें नया क्या है ? ज्यादा कुछ नहीं। स्थानीय क्षेत्रीय बैंकों की धारणा भारत में बहुत पहले आ गई थी और वास्तव में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों यानी आरआरबी ने स्थानीय बैंकों का विचार पहले के अनुमान से काफी पहले ले लिया था।

आज कुल 57 आरआरबी के 16,664 से ज्यादा शाखाएं हैं और खास बात यह है कि ये बैंक अभी भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और ग्रामीण क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के बैंकों की तुलना में कम लागत पर संचालन करते हैं और उनमें से अधिकांश लाभ में हैं।

आश्चर्य की बात है कि रिजर्व बैंक की इन बैंकों को ज्यादा आक्रामक बनाने और डाकघरों को नए बैंकिंग संस्थानों के रूप में जोड़ने की कोई योजना नहीं है। नाबार्ड ने भी भारत में ग्रामीण बैंकिंग के लिए किसी नए समाधान की लंबे समय से कोई पेशकश नहीं की है।

इंदिरा गांधी ने 1960 के उतरार्ध में उस वक्त के 14 बड़े व्यावसायिक बैंकों को एक ही झटके में राष्ट्रीयकरण करके भारतीय बैंकिंग के चरित्र को ही बदल डाला था। इन बैंकों ने अपनी भूमिका का निर्वहन काफी हद तक किया था और आम लोगों के बीच बैंकिंग सुनिश्चित किया था जिसे भारत में सबसे बड़े वित्तीय समावेश मुहिम के रूप में देखा जा सकता है।

वित्तीय समावेश को अव्यावहारिक भावों से मुक्त कारगर और ग्रामीण बैंकिंग पहुंच के अधीन लाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को सबसे पहले कदम के रूप में, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के बैंकों के प्रति कम लाड़ प्यार दिखाने के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रीय बैंकों पर ज्यादा भरोसा करना चाहिए जिससे कि वे काम कर सकें और यह बहाना न कर सकें कि बैंकिंग गरीबों के लिए महंगा है। उन्हें गरीबों के साथ बैंकिंग करके मुनाफा अर्जित करना चाहिए लेकिन उन्हें बैंक मित्रों का, जो न केवल गरीब बल्कि विपन्न हैं, संवैधानिक प्रावधानों द्वारा निर्धारित न्यूनतम तनख्वाह के एक तिहाई से कम की पेशकश नहीं करनी चाहिए।

डाकघरों का पहले से ही जगहों का एक विशाल नेटवर्क है जिसकी पहुंच देश के कोने कोने तक है। अगर वित मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक वास्तव में वित्तीय समावेश को लेकर संजीदा हैं तो अगला बैंकिंग लाईसेंस डाकघरों को ही मिलना चाहिए।

एक बात और समझने की यह है कि भारतीय बैंकिंग किसी नवजात स्थिति में नहीं है और निश्चित रूप से इसके मूलभूत तत्व काफी मजबूत हैं जो बैंकों को अपनी व्यवसाय संभावनाओं के प्रति गंभीर होने के पर्याप्त कारण मुहैया करते हैं।

सच्चाई यह है कि भारत के गांवों के पास उन बैंकों को देने के लिए काफी कुछ है अगर ये बैंक अपने मूल तत्वों का अनुसरण करें। जरूरत इस बात की है कि ये बैंक सुनियोजित योजनाएं बनाएं और उनका दृढ़ता से पालन करें। नए युग में बैंकों के पास इसके अनुसरण के अलावा और कोई चारा नहीं है।

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