कुछ पुरस्कार सराहना के लिए ही नहीं, वास्तविक भी होते हैं

गुरशरन धन्जल, संपादक, इनक्लुजन

उत्तराखंड के दरकान गांव की ग्राम प्रधान सुरोजना देवी स्कॉच पुरस्कार प्राप्त करती हुईं।

यह गर्व की बात है कि भारत का नाम एक बार फिर से सम्मानित नोबल पुरस्कार विजेताओं की फेहरिस्त में शुमार है। व्यक्तिगत  लिहाज से मदर टेरेसा ने 1979 में इसे प्राप्त किया था। अब यह कारनामा एक बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने कर दिखाया है जो नॉर्वे स्थित नोबल पुरस्कार समिति की पसंद बन कर उभरे।

सत्यार्थी का नामांकन बाल अधिकारों के लिए सतत काम करने की वजह से पहले भी किया गया था जिन्होंने 24 वर्षों में 80,000 से अधिक बच्चों का उद्धार किया। इस कार्य ने उन्हें दुनिया भर के 140 देशों में काम करने वाले 2,000 सामाजिक संगठनों का चेहरा बना दिया है।

क्या इसका अर्थ यही है कि वे बाल अधिकारों या बाल कल्याण या फिर बालिका अधिकारों से जुड़े एकमात्र कार्यकर्ता हैं? जबाव है, नहीं। इस बात की आलोचना की जा सकती है लेकिन सच्चाई यह है कि वे ऐसे व्यक्ति हैं जिनके प्रयासों पर पिछले कुछ समय से ध्यान दिया जा रहा है और उनका नामांकन और फिर सम्मान के लिए उनकी अनुशंसा की जा रही है। चयन की प्रक्रिया सितंबर में शुरू होती है और फिर ज्यूरी यानी निर्णायक समिति के मूल्यांकन के साथ अगले साल अगस्त में समाप्त हो जाती है। अंतिम चयन अक्तूबर होता है। नामांकन पूर्व नोबल पुरस्कार विजेताओं समेत विशेषज्ञों द्वारा न कि प्रत्याशियों-चाहे वे व्यक्ति हों या संगठन- द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

इन पुरस्कारों को देने का उद्वेश्य कुछ लोगों के अच्छे कार्यो के उदाहरणों को एक नजीर के रूप में पेश करना है जिससे ऐसे प्रयासों का अनुकरण किया जाए और अधिक लोगों की भलाई के लिय काम करने की प्रेरणा मिले। लेकिन सभी पुरस्कार इस बड़े उद्वेश्य को अर्जित करने में सफल नहीं होते। कुछ पुरस्कार सिर्फ दावतें उड़ाने और कोरी सराहना के लिए होते हैं तो कुछ का काम महज भाई भतीजावाद और कुनबापरस्ती को बढ़ावा देना होता है।

स्कॉच पुरस्कारों का गठन 2003 में किया गया था जो सर्वश्रेष्ठ प्रचलनों की पहचान करने के एक सख्त दृष्टिकोण का अनुसरण करता है जिसने भारत को बेहतर बनाया है। यह इस सिद्धांत से प्रेरित है कि पुरस्कार और सम्मान प्रेरणात्मक दिशानिर्देश को बढ़ावा देते हैं। स्कॉच पुरस्कार अपने नजरिये, चयन प्रक्रिया और एक सघन मानदंड को लेकर एक विशिष्ट स्थान रखते हैं जोकि परियोजना स्थलों और लाभार्थियों के साथ मेलजोल समेत एक गहरे मूल्यांकन के समान है। किसी परियोजना के प्रदर्शन की माप केवल समाज पर इसके प्रभाव और अन्य सार्थक और दृष्टिगोचर होने वाले परिणामों से की जाती है।

चयन प्रक्रिया में छह महीने लगते हैं और इसकी शुरूआत किसी नामांकित प्रत्याशी के चयन के लिए क्षेत्र मूल्यांकन द्वारा एक आंतरिक आकलन के साथ होता है। इसके बाद उन्हें निर्वाचन मंडल अर्थात ज्यूरी के सामने प्रतिवेदन के लिए आमंत्रित किया जाता है। निर्वाचन मंडल का गठन क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है। इसके आधार पर प्रत्याशियों का एक ऑडर-ऑफ-मेरिट के लिए चयन किया जाता है। इन्हें निर्वाचन मंडल के सदस्यों की उपस्थिति में गोल मेज बहसों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इसके बाद स्कॉच पुरस्कार प्रदान करने के लिए फाइनल में आने वाले की सूची निकाली जाती है। इन्हें व्यापक सीख और प्रतिकृति के लिए केस स्टडी के रूप में प्रकाशित किया जाता है।

वैकल्पिक रूप से, कॉलेज ऑफ स्कॉच पुरस्कार विजेताओं या स्कॉच संपादकीय द्वारा भी कुछ खोज की जाती है। मसलन, उड़ीसा के कालाहांडी जिले के एक छोटे से गांव में स्कॉच की एक टीम ने एक ऐसी अशिक्षित महिला की खोज की जिसने भारतीय स्टेट बैंक के ऋण संपर्क से प्रोत्साहित होकर वित्तीय साक्षरता के जरिये 110 स्व सहायता समूहों से ज्यादा निर्मित एक स्व सहायता समूह संगठन का निर्माण किया।

एक अन्य मामले में, उत्तराखंड में 7,000 फीट की उंचाई पर बसे एक दरकान नामक एक गांव में सुरोजना देवी नामक एक अशिक्षित महिला अपने गांव में पहली निर्वाचित ग्राम प्रधान बन गई। प्राथमिकता के आधार पर लेते हुए उन्होंने एक विभाजित बांस बिछाकर पानी की समस्या का समाधान किया जहां पानी गुरूत्वाकर्षण के साथ आता था। इसके परिणामस्वरूप, गांव के लगभग प्रत्येक 140 घरों के सामने 24 घंटे पानी की आपूर्ति शुरू हो गई। इसके बाद उन्होंने केवल 16 लाख रूपये की लागत पर बिजली की समस्या का समाधान किया जो प्रशासन पिछले कई वर्षों से नही कर सका था। दोनों ही महिलाओं को स्कॉच चैलेंजर पुरस्कार से नवाजा गया।

चेन्नई के नागपट्टनम गांव में सुनामी ने नवजातों समेत हजारों बच्चों को अनाथ कर दिया। उस गांव के पादरी ने, जो अपने परिवार में अकेले बच गए थे,  ने इन बच्चों की देखभाल का जिम्मा उठा लिया। एक दशक से ज्यादा का समय गुजर चुका है, बच्चे बड़े हो चुके हैं, अपना परिवार बसा चुके हैं और पादरी बुजुर्ग हो चुके हैं। गिरिजाघर और कुछ सामाजिक रूप से सजग अप्रवासी भारतीयों, जिन्होंने उनका पता लगाया, की मदद से उन्होंने अपने प्रयासों को जारी रखा है और वह अन्य गांवों की भी मदद कर रहे है।

एक अन्य प्र्रयास में, पंजाब के तरन तारन के एक छोटे गांव में 60 से अधिक उम्र के एक दंपत्ति ने 10 वर्ष पहले एक परित्यक्त लड़की के पालन पोषण की जिम्मेदारी उठाई। जल्द ही उसमें लगभग दो वर्ष की उम्र की तीन और लड़कियां भी शामिल हो गईं जिनके उनके माता पिता ने छोड़ दिया था। आज यह दंपत्ति 2 से 13 वर्ष की उम्र की लगभग 90 बच्चियों की देखभाल करता है, उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य देखभाल और अन्य सांसारिक जरूरतों में सहायता करता है। उन्हें पड़ोसियों, समाज या सरकार से लगभग कोई मदद नहीं मिली। यहां भी, गुरूद्वारा से दिए गए दान या कुछ लोगों की व्यक्तिगत सामाजिक जिम्मेदारी की मदद से उन्हें अपने प्रयासों में मदद मिली।

ऐसे कई सारे और प्रयास हैं। कहने की जरूरत नहीं कि सभी प्रयासों को पुरस्कृत नहीं किया जा सकता लेकिन कम से कम इस काम और ऐसे ध्येय के आधार पर उन्हें सराहा तो जा ही सकता है। किसी के काम को नजरंदाज करना या उसकी आलोचना करना मानव की प्रकृति है और आसान है लेकिन प्रशंसा या प्रोत्साहन के दो बोल बोलना उतना ही मुश्किल है। कोई भी पुरस्कार तीन चीजों के लिए जाना जाता है: निष्पक्ष चयन प्रक्रिया, परियोजना के परिणाम का आकलनः और इसे बनाये रखने तथा और आगे बढ़ाने की संभावना। और ये ही चीजें हमें विशिष्ट बनाती हैं।

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