सरकार को मुद्रास्फीति का लक्ष्य निर्धारित करने की जरूरत

ज्ञानेन्द्र केशरी, कार्यकारी संपादक, इनक्लुजन

वित्त मंत्री अरूण जेटली

मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की पिछले चार वर्षों से ब्याज दरों पर गिद्ध दृष्टि रही है। चुने हुए प्रतिनिधियों और सरकार के प्रतिरोध के बावजूद रिजर्व बैंक ने सख्त मौद्रिक नीति बरकरार रखी है। पर त्रासदी यह है कि इस गिद्ध दृष्टि का महंगाई पर कोई अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ा है क्योंकि मुद्रास्फीति दर लगातार उंची बनी हुई है।

यह मुद्रास्फीति पर रिजर्व बैंक की नीति के असर पर एक सवालिया निशान लगाता है। समय आ गया है कि मौद्रिक नीति संरचना पर नए तरीके से फिर से विचार किया जाए और इसे सर्वश्रेष्ठ वैश्विक प्रचलनों के साथ जोड़ा जाए। एक अच्छा विकल्प ब्रिटेन, और कुछ अन्य उन्नत देशों की ही तरह एक मौद्रिक नीति समिति प्रणाली यानी एमपीसी की दिशा में कदम बढ़ाने का हो सकता है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर की अध्यक्षता में एक 9 सदस्यीय समिति की हर महीने बैठक होती है जो देश की मौद्रिक नीति पर फैसला करती है। सरकार मुद्रास्फीति के लिए एक लक्ष्य निर्धारित करती है और समिति मौद्रिक नीति उपायों के जरिये उस लक्ष्य को अर्जित करती है।

अमेरिका में, एक 12 सदस्यीय फेडेरल ओपेन मार्केट कमिटी मौद्रिक नीति पर फैसला करती है जिनमें ब्याज दरों, मनी सप्लाई और डॉलर के विनिमय मूल्य पर फैसला शामिल है।

भारत को ऐसी ही प्रणाली को अपनाने की जरूरत है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने जुलाई में आम बजट भाषण में घोषणा की थी कि सरकार लगातार जटिल होती अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटने के लिए एक आधुनिक मौद्रिक नीति संरचना के निर्माण का प्रयास करेगी। तीन महीने गुजर चुके हैं लेकिन इस पर कोई स्पष्टता नजर नहीं आ रही।

मौद्रिक नीति संरचना में अनिवार्य रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों और सरकार का प्रतिनिधित्व होना चाहिए क्योंकि महंगाई के काफी राजनीतिक दुष्परिणाम होते हैं। भारत तथा दुनिया के अन्य हिस्सों में स्थित देशों की कई सरकारों को महंगाई पर अंकुश लगाने में विफलता की वजह से सत्ता से हाथ धोने को मजबूर होना पड़ा है। महंगाई पर अंकुश लगाने में विफलता इस साल हुए राष्ट्ीय चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की हार के प्रमुख कारणों में एक थी।

वर्तमान संरचना के तहत, रिजर्व बैंक महंगाई दर लक्ष्यों का निर्धारण करने तथा उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नीति के निर्माण के लिए जिम्मेदार है। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान रिजर्व बैंक और सरकार के बीच मतभेद खुल कर सामने आ गए थे। तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम तथा तत्कालीन रिजर्व बैंक गर्वनर डी सुब्बा राव नीति दरों में कटौती को लेकर एक दूसरे के सामने आ गए थे। रिजर्व बैंक ने आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए दरों में कटौती करने की वित्त मंत्री की पुरजोर अपील के बावजूद ब्याज दरों पर सावधानी बनाए रखी।

सुब्बा राव के उत्तराधिकारी रघुराम राजन ने भी वित्त मंत्री की सलाह के बावजूद ब्याज दरों पर गिद्ध दृष्टि रखी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि सुब्बा राव और राजन दोनों ही जब वित्त मंत्रालय में कार्यरत थे तो विकासोन्मुखी मौद्रिक नीति की दलीलें दिया करते थे।

पिछले चार वर्षों के दौरान 33 मौद्रिक नीति घोषणाओं में भारतीय रिजर्व बैंक ने 15 अवसरों पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। इनमें सबसे ज्यादा-12 बार सुब्बा राव के कार्यकाल के दौरान बढ़ोतरी की गई। विडंबना यह है कि पिछले चार वर्षों के ज्यादातर समय के दौरान महंगाई दर लगातार ज्यादा बनी रही-उपभोक्ता मूल्य सूचकांक महंगाई दर लगभग 10 फीसदी पर रही जबकि थोक मूल्य सूचकांक महंगाई दर 7-8 फीसदी पर रही जबकि रिजर्व बैंक का अनधिकृत लक्ष्य 4-5 फीसदी था।

स्पष्ट है कि रिजर्व बैंक महंगाई दर पर लगाम लगाने में सफल नहीं रहा है। हालांकि लोग ऐसी विफलताओं के लिए अक्सर चुने हुए प्रतिनिधियों को दंडित करते है।

मौद्रिक नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू भविष्य का दिशानिर्देश होना चाहिए। इसे केवल मुद्रास्फीति या विकास पर किसी विशिष्ट आंकड़े पर केवल प्रतिक्रिया भर नहीं होनी चाहिए। इसका संबंध मौजूदा आर्थिक परिदृश्य और भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है, इससे जुड़ा होना चाहिए।

मौद्रिक नीति समिति प्रणाली निर्णय-निर्माण में ज्यादा पारदर्शिता तथा सरकार और रिजर्व बैंक के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करेगी। इसके अलावा, समिति को संसद के प्रति जबावदेह बनाया जाना चाहिए।
निवेश को आकर्षित करने तथा आर्थिक विकास को फिर से पटरी पर लाने के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है।

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