मुद्रास्फीति 5 वर्ष के निचले स्तर पर, रिजर्व बैंक अब तो छोड़े हठ

आर के रे, इनक्लुजन
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उपभोक्ता मूल्य और थोक मूल्य आधारित खाद्य महंगाई दर क्रमश. 7.6 और 3.5 फीसदी पर नीचे आ गई है

इसमें तो कोई संदेह नहीं कि महंगाई दर से खौफजदा रघुराम राजन को आर्थिक विकास की जरूरतों की बहुत परवाह नहीं रही है, पर सवाल यह है कि क्या भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति के बेहद निम्न आंकड़ों को भी नजरअंदाज कर रहा है?

नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, सितंबर के दौरान उपभोक्ता मूल्य आधारित सूचकांक 6 वर्षों के निम्नतम स्तर 6.5 फीसदी पर पहुंच गया, जबकि थोक मूल्य आधारित सूचकांक 5 वर्षों के निम्नतम स्तर 2.38 फीसदी पर आ गया।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उपभोक्ता मूल्य और थोक मूल्य आधारित खाद्य महंगाई दर क्रमश. 7.6 और 3.5 फीसदी पर नीचे आ गई है। उपभोक्ता मूल्य और थोक मूल्य के लिए मुख्य महंगाई दर के लिहाज से मापी गई विनिर्मित कीमत क्रमश. 5.9 और 2.8 फीसदी पर नीचे आ गई है जो विनिर्माताओं की मूल्य शक्ति में कमी और अर्थव्यवस्था में आम मंदी को प्रदर्शित करती है।

विकास गति में सुस्ती और नकारात्मक उत्पादन अंतर यानी वास्तविक और संभावित जीडीपी वृद्धि दर के बीच के फर्क की वजह से मुद्रास्फीति दर में कमी आई। मांग के निम्न स्तरों, जैसाकि उप-अधिकतम क्षमता उपयोग में प्रदर्शित हुआ, ने भारतीय कंपनियों खासकर एसएमई की मूल्य निर्धारण शक्ति में कमी ला दी है। क्या अब ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश नहीं बन रही?

देश में अभी भी विचारों में काफी अंतर दिख रहा है। ऐसा लगता है कि जहां सरकार के एक तबके ने विकास जरूरतों के प्रति रिजर्व बैंक के निष्क्रिय व्यवहार को खारिज कर दिया है, तथाकथित बाजारोन्मुखी अर्थशास्त्रियों का अब भी मानना है कि कच्चे तेल और वस्तुओं के वैश्विक मूल्य में नरमी, स्थिर रूपये और खाद्य मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए जारी आपूर्ति पक्ष प्रयासों को देखते हुए भले ही प्रत्यक्ष जोखिमों में काफी कमी आई है, भारतीय रिजर्व बैंक इस वर्ष के दौरान ब्याज दरों में कटौती नहीं करेगा।

सितंबर के दौरान उपभोक्ता मूल्य आधारित सूचकांक महंगाई दर के आंकड़े इस विचार को पुष्ट करते हैं कि रिजर्व बैंक का जनवरी 2015 का 8 फीसदी का उपभोक्ता मूल्य आधारित सूचकांक महंगाई दर का लक्ष्य आसानी से हासिल कर लिया जाएगा। फिर भी, विदेशी बैंकों से जुड़े अर्थशास्त्री कहते हैं कि ब्याज दरों में पहले की गई कटौती दो वजहों से ख्याली पुलाव साबित हो सकते हैं: मुद्रास्फीति उम्मीदें बढ़िया बनी रहे और जनवरी 2015 का 8 फीसदी का उपभोक्ता मूल्य आधारित सूचकांक महंगाई दर का लक्ष्य भी रिजर्व बैंक के रडार पर महत्वपूर्ण बन जाए-यह लक्ष्य खासकर ऐतिहासिक प्राप्तियों को देखते हुए ज्यादा महत्वाकांक्षी है।

भले ही, रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति और वृद्धि दर की बात अनसुनी कर दे, कुछ अन्य मानदंड भी ब्याज दरों में कमी की जरूरत इंगित कर रहे हैं- ऋण उठाव और ऋण-जमा अनुपात में कमी आ रही है जिससे संकेत मिल रहा है कि धन बाजार दरों में भी कमी आनी तय है। इसके अलावा, महंगाई दर में कमी ने वास्तविक कारगर विनिमय दर में कमी लाने में सहायता की है।

महंगाई दर में कमी का रूझान सकल मांग पर आर्थिक मंदी के व्यापक नकारात्मक प्रभाव का एक स्पष्ट प्रतिबिंब है। इसके कुछ बड़े उदाहरण अगस्त के औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े में देखने को मिल सकते हैं जो 12 वर्षों में निम्नतम अर्थात महज 0.4 फीसदी था। कारों की बिक्री जोकि उपभोक्ता मांग का एक पैमाना है, में लगातार चार महीनों की वृद्धि के बाद सितंबर में 1 फीसदी की कमी आई। वर्तमान दयनीय स्थिति को देखते हुए औद्योगिक वस्तुओं की सुस्त मांग जीडीपी वृद्धि दर को अप्रैल-जून में दर्ज 5.7 फीसदी से काफी नीचे रख सकती है।

भारतीय रिजर्व बैंक की बेपरवाह सख्त मौद्रिक नीति सुधार को बढ़ाने के बजाये अर्थव्यवस्था को और सुस्त गति की ओर धकेल सकती है। अब समय आ गया है कि सरकार अधिकारियों के एक पैनल का गठन करने के जरिये मौद्रिक नीति के सुधार का दायित्व ले और भारतीय रिजर्व बैंक दरों का निर्धारण करे न कि इस अहम नीति को रिजर्व बैंक के कुछ व्यक्तियों की इच्छाओं या सनकों पर छोड़ दे। अगर भारतीय रिजर्व बैंक का गठन संसद के एक अधिनियम के द्वारा हुआ है, तो रिजर्व बैंक के गवर्नर को ब्याज दरों पर अपने फैसले के लिए संसद के प्रति जबावदेह होना चाहिए जैसाकि अमेरिकी फेडेरल रिजर्व के मामले में होता है।

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