अरविंद सुब्रमण्यन: भविष्य की वित्तीय सुनामी से मुक्ति का रास्ता सुझाने वाला चिंतक

समीर कोचर, प्रधान संपादक, इनक्लुजन एवं मोदीनोमिक्स के लेखक

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन नई दिल्ली में मीडिया के साथ बात करते हुए

मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद अक्सर ही विवादों से घिर जाता है। कुछ लोग इसे केवल वित्त मंत्री का एक सहयोगी भर मानते हैं तो कुछ लोग इस पद को आर्थिक परेशानियों से निजात दिलाने वाले मुख्य सरकारी सलाहकार के रूप में देखते हैं। आप चाहें जैसे इसे देखें लेकिन मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमण्यन का दायित्व खासकर 2008 के लेहमैन संकट के तुरंत बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में उनकी खुद की भविष्यवाणी को देखते हुए बहुत आसान नहीं होगा।

मीडिया का फोकस भले ही नए सीईए की अमेरिकी विश्वविद्यालयों एवं बहुपक्षीय संस्थानों में शैक्षणिक उपलब्धियों पर हो, पर बहुत कम लोग ही यह जानते हैं कि सुब्रमण्यन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अपनी नजर हमेशा ही जमीनी हकीकत पर रखी है। भारत पर लेहमैन संकट के प्रभाव (जीडीपी वृद्धि पर वित्त वर्ष 2008 के 9.3 फीसदी से गिरकर वित्त वर्ष 2009 में 6.7 फीसदी पर आ गई थी, विदेशी मुद्रा भंडार 309 अरब डॉलर से घटकर 252 अरब डॉलर पर आ गया था और दो महीने के भीतर रूपये के मूल्य में 25 फीसदी की गिरावट आ गई थी) को लेकर सुब्रमण्यन ने आगाह किया था कि भारत पर खतरा बना हुआ है और उन्होंने यह सलाह भी दी थी कि अगर 10 वर्षों के बाद भी इस तरह का दूसरा संकट आता है तो नीति निर्माताओं को उसे टालने के लिए क्या उपाय करने चाहिए। विजय केलकर के सम्मान में कई निबंधों के संकलन ‘इंडिया ऑन ग्रोथ टर्नपाइक‘ नामक मेरे द्वारा संपादित पुस्तक में -प्रीवेंटिंग एंड रेस्पॉंडिंग टू द क्राइसिस ऑफ 2008-शीर्षक एक लेख में सुब्रमण्यन ने तर्क दिया था कि भारत को अपनी वृहद आर्थिक नीति, खासकर विनिमय दर और प्रबंधन तथा पूंजी खाता परिवर्तनीयता पर फिर से विचार करने की जरूरत है। पीटरसन इंस्टीच्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स एंड सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के सीनियर फेलो सुब्रमण्यन ने तर्क दिया कि भारत को दूसरे संकट को टालने के एक स्व-बीमा के रूप में विदेशी मुद्रा भंडार का एक युद्ध कोष बनाना चाहिए, निर्यातोन्मुखी रणनीति को आगे बढ़ाने के जोखिम की माप करनी चाहिए और मुद्रा की मजबूती से बचना चाहिए, ऋणःजीडीपी अनुपात को 30-40 फीसदी पर सीमित करने के जरिये सरकारी बैलेंस शीट को मजबूत बनाना चाहिए।

दूसरा सवाल है कि विदेशी मुद्रा भंडार की कितनी मात्रा होनी चाहिए जिसे ‘पर्याप्त‘ माना जा सकता है। इस सवाल के जबाव में सुब्रमण्यन एक बेशकीमती मशविरा देते हैं-पुराने नियम कि विदेशी मुद्रा भंडार को उतना होना चाहिए जितना एक वर्ष के भीतर ऋण संभावित है, पर फिर से विचार करने की जरूरत है और भारत को सभी वित्तीय संस्थानों और कंपनियों की सकल विदेशी बाध्यताओं जो 12-18 महीनों में संभावित है, इक्विटियों तथा अन्य माध्यमों में विदेशी निवेश में कारक होना होगा।

चीन के अनुभव का उदाहरण देते हुए सुब्रमण्यन ने लिखा‘ किसी व्यक्ति को केवल छोटी परेशानी के लिए ही बचत नहीं करनी चाहिए बल्कि बड़ी आफत के लिए भी तैयारी करनी चाहिए। आदमी को अंग्रजी दंतकथा के एक नायक नोह की तरह तूफान से बचने के लिए एक बड़े पोत का निर्माण करना चाहिए। पूंजी खाता जितना ज्यादा खुला होगा, संभावित तूफान उतना ही ज्यादा आ सकता है और उससे निपटने के लिए उतने ही बड़े पोत की आवश्यकता होगी।

भारतीय नीति निर्माताओं को इस तथ्य से सबक लेनी होगी कि हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 300 अरब डॉलर से थोड़ा ही अधिक है जबकि चीन का 30 खरब डॉलर है और यहां चीन की तुलना में पूंजी नियंत्रण में ज्यादा छूट मिली हुई है। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी संकट की स्थिति में भारत से विदेशी पूंजी ज्यादा तेजी से बाहर जा सकती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।

सुब्रमण्यन की भविष्यवाणी कि यह देखते हुए कि भारत का निर्यात ‘ अति प्रतिस्पर्धी‘ है और डॉलर के मुकाबले रूपये का मूल्य 50 है, जीडीपी वृद्धि दर फिर से 8-9 फीसदी पर वापस आ जाएगी, सच्ची साबित हुई। जीडीपी वृद्धि दर वित्त वर्ष 2010 में 8.6 फीसदी पर और वित्त वर्ष 2011 में 8.9 फीसदी पर वापस आ गई जो लेहमैन के साल के दौरान 6.7 फीसदी पर थी। अब एक सुनहरा प्रश्न सामने आता है- अगर भारत 500 अरब डॉलर या 10 खरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार का भी निर्माण करना चाहता है तो क्या उसे रूपये को मजबूत होने की अनुमति देनी चाहिए ? उन्होंने 5 वर्ष पहले लिखा था‘ यह एक अगली बड़ी नीतिगत चुनौती होगी‘। बदकिस्मती की बात है कि भारत इस मुद्वे का समाधान करने में विफल रहा है-विदेशी मुद्रा भंडार वित्त वर्ष 09 के आखिर में 252 अरब डॉलर था जो वित्त वर्ष 2010 में 279 अरब डॉलर तक और वित्त वर्ष 2011 में 305 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, पर 2012 और 2013 के दौरान यह 300 अरब डॉलर से थोड़ा नीचे ही रहा और फिर वित्त वर्ष 2014 में बढ़कर 304 अरब डॉलर तक पहुंच गया। 10 अक्तूबर 2014 को यह 312.7 अरब डॉलर पर था।

जाहिर है, हम 500 अरब डॉलर से काफी दूर हैं और हमें 10 खरब डॉलर की संख्या तक पहुंचने के लिए कुछ बड़े कदम उठाने की जरूरत होगी जिसका संकेत सुब्रमण्यन ने दिया था। यह देखना अभी बाकी है कि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में सुब्रमण्यन अर्थव्यवस्था की गुत्थियों को सुलझाने में वित्त मंत्रालय को किस प्रकार बुद्धिमतापूर्ण सलाह देते हैं और भारत के लिए विदेशी मुद्रा भंडार के कितने मजबूत ऱक्षापोत का निर्माण करने में  मददगार साबित होते हैं जिससे देश भविष्य की किसी भी वित्तीय सुनामी से पार पाने में समर्थ हो सके।

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