सामाजिक और आर्थिक समावेश का पोषण करता कपड़ा क्षेत्र

जोहरा चटर्जी, पूर्व सचिव, भारत सरकार

कपड़ा क्षेत्र सबसे बडे़ नियोक्ता क्षेत्रों में एक है और यह भारत के निर्यात में उल्लेखनीय योगदान देता है।

प्रधानमंत्री के कपड़ा क्षेत्र को विनिर्माण क्षेत्र में सबसे बड़ा नियोक्ता तथा कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता बनाने के आह्वान से सामाजिक और आर्थिक समावेश की संभावनाओं का सरल और कारगर बनना तय है।

वर्तमान में, कपड़ा क्षेत्र साढ़े चार करोड़ से ज्यादा भारतीयों को सीधा रोजगार देता है जबकि लगभग 11 करोड़ लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देता है। कपड़ा मंत्रालय के तहत विचारार्थ नई कपड़ा नीति का लक्ष्य निर्यात को मौजूदा 40 अरब डॉलर के स्तर से अगले दशक तक 20 फीसदी बढ़ाने तथा इसे बढ़ाकर 2024-25 तक 300 अरब डॉलर तक पहुंचाना और इस क्षेत्र में 120 अरब डॉलर से अधिक निवेश आकर्षित करने के जरिये साढ़े तीन करोड़ नौकरियों का सृजन करना है। इस प्रकार, इस क्षेत्र के मौजूदा 140 अरब डॉलर के आकार को बढ़ाकर 2024-25 तक 650 अरब डॉलर तक पहुंचाने की परिकल्पना की गई है।

चीन बढ़ती वेतन लागत के कारण कपड़ा क्षेत्र में विनिर्माण से धीरे धीरे हटने लगा है, इससे यह लक्ष्य थोड़ा कठिन भले ही प्रतीत हो, लेकिन इसे हासिल किया जा सकता है। बदलती परिस्थितियों में, भारत को चीन एवं जापान की भारत की ओर मैत्रीपूर्ण निवेश नजरों के कारण लाभ मिल सकता है। इस प्रकार, यह क्षेत्र आने वाले समय में सुर्खियों में रहेगा। भारत पहले ही 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 1.5 अरब कपड़ा मजदूरों को प्रशिक्षित करने के लिए 19 अरब रूपये के निवेश के साथ कपड़ा मंत्रालय की एक पूर्णकालिक योजना के रूप में एकीकृत कौशल विकास योजना (आईएसडीएस) के शुभारंभ के साथ निकट भविष्य में एक तयशुदा निवेश धमाके की तैयारी कर रहा है।

कौशल विकास के लिए एक मंत्रालय के सृजन के साथ, कुशल बनाने की पहलों में बेशुमार तेजी का आना तय है जोकि समन्वय बढ़ाएगा और श्रमोन्मुखी विनिर्माण क्षेत्र में बड़ी संख्या में रोजगारों का सृजन करेगा।

समावेश के लिए इसके क्या मायने हैं? फाइबर से लेकर फैशन तक के रेंज और हस्तकला, हस्तशिल्प, बिजली करघों एवं मिल सेक्टर तथा रेशम उत्पादन, ऊन, मानव निर्मित रेशों तथा जूट उत्पादों तक कपड़ा क्षेत्र के असीम विस्तार को देखते हुए इसके निहितार्थ बहुत व्यापक हो सकते हैं। हर प्रकार के रेशों की अपनी एक विशिष्ट श्रृंखला होती है तथा साझीदार होते हैं जो कच्चे माल के उत्पादन, परिशोधन, कताई चरखी व घुमाव, बुनाई, रंगना एवं परिसंस्करण, मूल्य संवर्द्धन और अलंकरण, परिधान, खुदरा व्यवसाय तथा निर्यात से जुड़े होते हैं।

सभी क्षेत्रों के डिजायन एवं नवाचार एक विशिष्ट जातीयता एवं विविधता का समावेश करते हैं जो ‘ब्रांड इंडिया‘ को परिभाषित करते हैं, जो क्षेत्रों और लोगों की सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े हैं और जो सामाजिक और आर्थिक समावेश के इस ताने बाने को खूबसूरती से पिरोये हुए हैं।

जाहिर है कपड़ा क्षेत्र पूरे देश भर में विभिन्न कौशलों और पृष्ठभूमियों से जुड़े लोगों के लिए संभावनाओं का एक अनंत सागर खोल रहा है। वर्तमान कौशल खाई संचालनगत स्तर से लेकर पर्यवेक्षण, मध्य एवं वरिष्ठ प्रबंधन स्तरों तक फैली हुई है लेकिन कौशल पिरामिड में 85 फीसदी मांग मूलभूत तकनीकी कौशल के लिए है जिसे केंद्रित अल्पकालिक स्तर से लेकर उच्च विद्यालय स्तर तक की योग्यता से हासिल किया जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि माध्यमिक शिक्षा की योग्यता वाले ग्रामीण युवकों के लिए बेशुमार रोजगार अवसर हैं।

परिधान क्षेत्र में वस्त्रों के लिए सबसे अधिक मांग है जिसके लिए सिलाई करने वाले यांत्रिकों, डिजायनरों, कंप्यूटरों की जानकारी रखने वाले डिजायन, कटाई करने वाले दर्जी और वस्त्र प्रौद्योगिकीविदों की जरूरत है। गुणवत्ता नियंत्रण के लिए अनिवार्य तकनीकी कौशलों में परीक्षण, गुणवत्ता प्रबंधन और अनुपालन शामिल है। इसके अलावा, व्यापार और आपूर्ति प्रबंधन के लिए प्रबंधकीय और संवाद कौशल भी महत्वपूर्ण है। फैशन की चकाचौंधपूर्ण दुनिया युवाओं, ब्रांड के प्रति जागरूकों, नई पीढ़ी को कपड़ा क्षेत्र के खुदरा कारोबार में नौकरियों की बेशुमार संभावनाओं की एक दूसरी दुनिया की ओर इंगित करती है। 100 अरब डॉलर का कपड़ा उद्योग 2013-14 में 12 फीसदी की चक्रवृद्धि ब्याज दर से बढ़ रहा है और इसके 2025 तक 350 अरब डॉलर के आकार तक पहुंच जाने की उम्मीद है। इस प्रकार, इस क्षेत्र का समग्र समावेशी विकास गाथा लिखा जाना तय है।

आज की महती जरूरत कौशल आकलन एवं प्रमाणपत्र के लिए एक भरोसेमंद तंत्र के साथ, उद्योग की साझीदारी में कौशल नवाचारों को एकीकृत करने तथा उन्हें आगे बढ़ाने की है। कपड़ा क्षेत्र में कुशल श्रमिकों की भारी मांग और नौकरी छोड़ने की तेज दर को देखते हुए इस क्षेत्र की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा की क्षमता पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए निजी क्षेत्र प्रशिक्षण पहलों या नवाचारों को विस्तारित करने के लिए सरकार को सहायता देने को पूरी तरह तैयार है। कंपनियों द्वारा कंपनी सामाजिक दायित्वों यानी सीएसआर के तहत उठाए गए कदम बेहद कामयाब साबित हुए हैं और वे समावेशी विकास के बेहतरीन उदाहरण हैं।

इसके अलावा, निजी क्षेत्र के साथ भागीदारी के लिए सरकारी नियमों को सरल बनाये जाने की जरूरत है जिससे कि संभावित क्षमता का दिशा निर्धारण किया जा सके। और साथ ही, सेवा कर से छूट देने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में वस्त्र इकाइयों जैसे उत्पादक उपक्रमों की स्थापना के साथ इसे जोड़ने जैसे उपायों के जरिये निजी क्षेत्र द्वारा प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करने की भी जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों में नई इकाइयों के लिए एक विशिष्ट अवधि में मनरेगा के तहत सक्षमकारी प्रशिक्षण इन इकाइयों की व्यावहार्यता को बेहतर बनाएगा और खासकर, महिलाओं के लिए रोजगार अवसरों को खोलेगा जिनकी संख्या में मनरेगा के तहत गिरावट बताई जा रही है।

वास्तव में, कपड़ा क्षेत्र स़्त्री-पुरूष यानी जेंडर अंतराल को पाटने में एक अहम भूमिका अदा करता है। समग्र रूप से विकासशील देशों में विनिर्माण श्रम बल के एक तिहाई से अधिक और एशियाई देशों में पचास फीसदी तक महिलाएं हैं। भारत में परिधान क्षेत्र के श्रमबल की लगभग 50.4 फीसदी महिलाएं हैं। गौरतलब है कि देश में 23 लाख बुनकरों में से 80 फीसदी महिलाएं हैं। उत्तर पूर्व के कई राज्यों में बुनकर का काम विशिष्ट रूप से महिलाओं का ही कार्य क्षेत्र है जहां रेशम से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी 54 फीसदी तक है।

जैसे कपड़ा क्षेत्र का विकास होता है, यह महिला अधिकारिता और महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक समावेश में एक महत्वपूर्ण योगदान देने वाला भी बन जाता है। पूरे देश में वंचित पृश्ठभूमि वाली महिलाओं की अनगिनत कहानियां हैं जो कामयाब उद्यमी बन गईं और बुनकरी, वस्त्र कशीदाकारी तथा ऐसे अन्य कौशलों के जरिये अपने परिवार एवं समाज में सम्मान की हकदार बनीं। उन्होंने अन्य समूह की महिलाओं को भी बेहद सफल स्वयं सहायता समूहों के जरिये सामाजिक एवं आर्थिक समावेश अर्जित करने को प्रेरित किया।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां ग्रामीण आबादी की 30 फीसदी अभी भी गरीबी रेखा से नीचे रहती है, कृषि उद्यमों के विविधीकरण से जुड़ी गतिविधियां और अतिरिक्त आमदनी का सृजन सामाजिक और आर्थिक समावेश को बढ़ावा देता है। हस्तकरघा (43 लाख बुनकर), बिजली करघे (55 लाख बुनकर) और हस्त शिल्प (68 लाख कारीगर) के अतिरिक्त, रेशम उत्पादन जो लगभग 78 लाख भारतीयों को आजीविका के अवसर मुहैया कराता है, एक कामयाबी की कहानी है जिसने टसर सिल्क के कीड़ों के पालन के लिए वन आधारित टसर वनरोपण के न्यायोचित दोहन के जरिये आदिवासी समुदायों के लिए एक सतत आय और समावेश को प्रेरित किया है। ‘उत्प्रेरक विकास कार्यक्रम‘ (सीडीपी) के तहत आम तौर पर किसान भी रेशम उत्पादन समूहों में लाभान्वित हो रहे हैं जहां वे महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी के साथ समुदाय आधारित संगठनों में संघबद्ध होते हैं। चौकी पालन केंद्रों, रेशम पॉलिक्लिनिक्स और किसान नर्सरियों को लोगों की भागीदारी के जरिये प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इन गतिविधियों की किसानों, खासकर महिला स्वयं सहायता समूहों के संघों द्वारा संचालित जन आधारित गतिविधियों के रूप में पहचान की गई है। सीडीपी का केंद्रित दृष्टिकोण सिल्क वैल्यू चेन में विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए महिलाओं का ‘संवर्द्धन‘ भर नहीं रहा है बल्कि विकासात्मक एजेंडा को आकार देने एवं उन्हें क्रियान्वित करने में महिलाओं की भागीदारी के लिए जगह का सृजन करने में भी रहा है।

समावेश की ओर कपड़ा मंत्रालय की एक और पहल श्रमिकों के आवास के लिए पायलट योजना और पिछड़े क्षेत्रों की महिलाओं को उत्पादक श्रमबल में जोड़ने तथा उद्योग में रोजगार छोड़ने की दर में कमी लाने के लिए महिलाओं की सहायता करने की है। इस योजना के तहत, रसोई घर, भोजन कक्ष तथा मनोरंजन स्थल जैसी आम सुविधाओं समेत 125 वर्ग फीट प्रति व्यक्ति के निर्माण क्षेत्र के साथ न्यूनतम 250 श्रमिकों एवं अधिकतम 1000 लोगों के लिए शयनागारों से निर्मित श्रमिकों के निवास स्थान को प्रोत्साहित किया जाएगा।

कपड़ा मंत्रालय जमीन की लागत को छोड़कर अधिकतम 3 करोड़ रूपये प्रति छात्रावास की परियोजना लागत का 50 फीसदी अनुदान मुहैया कराएगा। एसआईटीपी योजना के अंतर्गत गठित स्पेशल पर्पस वेहीकल्स (एसपीवी) तथा कपड़ा मंत्रालय की अन्य योजनाओं के तहत सवंर्द्धित एसपीवी इस योजना के तहत सहायता का लाभ उठाने के पात्र होंगे।

कपड़ा मंत्रालय का एक और पथ प्रदर्शक प्रयास परिधान विनिर्माण में प्रशिक्षण-सह-अनुकूलन केंद्रों की स्थापना के लिए एक योजना है जिसमें उद्योग में निवेशित हर एक लाख रूपये पर औसतन 7 अतिरिक्त रोजगारों का सृजन किया जाएगा। इस योजना की परिकल्पना पहली पीढ़ी के उद्यमियों और नई कंपनियों को जमीन और भवनों आदि के लिए पूंजी निवेश की कमी की बाधाओं को दूर करने तथा परिधान क्षेत्र के लिए मौजूदा विकास संभावनाओं का दोहन करने के लिए वस्त्र इकाइयों की स्थापना में तेजी लाने के लिए की गई है।

इस योजना का मुख्य उद्वेश्य नई कंपनियों के लिए एकीकृत कार्यस्थल तथा एक पारिस्तिथिकीय प्रणाली पर आधारित संयोजनों का सृजन करना है जो संचालन एवं वित्तीय लिहाज से व्यवहार्य हैं। यह योजना उनकी सफलता की संभावना को बढ़ाता है और नए व्यवसायों को स्थापित करने तथा उन्हें बढ़ाने के लिए आवश्यक समय एवं लागत में कमी लाता है। 15,000 वर्ग फीट क्षेत्र में निर्मित प्लग एंड प्ले फैक्टरी भवन तथा प्रति इनक्यूबैटी 100 मशीन तीन वर्ष की अवधि के लिए मुहैया कराए जाएंगे। साथ में, प्रति इनक्यूबैटी 200 श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण समर्थन और डिजायन सेवाओं के लिए सहायता तथा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मेलों में भागीदारी के लिए मदद दी जाएगी। प्लग एंड प्ले फैक्टरी भवन तथा मशीनों के प्रावधान के अतिरिक्त प्रति इनक्यूबैटी कुल सहायता 31 लाख रूपये की होगी।

उच्च उद्यमी उत्साह और कुशल श्रमशक्ति के बावजूद धन की कमी इस क्षेत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती लगातार बनी हुई है। इसके बावजूद कि 1999 में शुरू प्रौद्योगिकी उन्नयन कोष योजना यानी टफ्स मिलों में निवेश को प्रोत्साहित करने में काफी सफल रही है। यह योजना अपनी शुरूआत के बाद से केवल 18,000 करोड़ रूपये की सब्सिडी मुहैया कराने के जरिये इस क्षेत्र में 2.5 लाख करोड़ रूपये के निवेश को प्रेरित कर चुकी है। इसकी बदौलत सूत उत्पादन में उल्लेखनीय बढोतरी हुई है जिससे कपड़ा क्षेत्र की कुल ताकत और प्रतिस्पर्धा की क्षमता में बेहतरी आई है।

देश का 61 फीसदी वस्त्र उत्पादन बिजली करघा क्षेत्रों में, 23 फीसदी बुने हुए क्षेत्रों में और लगभग 11 फीसदी हस्तकरघा क्षेत्र में होता है जबकि लगभग सारा हस्तशिल्प उत्पादन लघु उद्योग क्षेत्र में है। इसलिए, यह आवश्यक है कि कपड़ा क्षेत्र के संतुलित विकास को सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिकता के आधार पर छोटे व्यवसायों की वित्तीय जरूरतों की पूर्ति की जाए और मूल्य श्रृंखला में सभी खंडों के वित्तीय समावेश को हासिल किया जाए।

हालांकि हस्तकरघा पहले ही उधारी के लिए प्राथमिकता क्षेत्रों में शामिल है, बैंक असंगठित क्षेत्र में उधारी के लिए कर्ज देने के लिए बहुत उत्साहित नहीं हैं। कपड़ा मंत्रालय की मांग हस्तकरघा को प्राथमिकता क्षेत्र उधारी के भीतर एक उप-खंड के रूप में पहचान देने और बैंकों एवं वित्तीय सेवा विभाग द्वारा सघन निगरानी के जरिये हस्तकरघा, बिजली करघा और हस्तकरघा क्षेत्रों को पर्याप्त कर्ज प्रवाह सुनिश्चित करने की है। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र हमारे देश की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है और यह सरकार तथा साथ में कॉर्पोरेट सेक्टर की भी जिम्मेदारी है कि वे  हस्तकरघा एवं हस्तशिल्प कृतियों के वित्तपोषण तथा उपभोग दोनों के ही जरिये उस खाई को पाटने का प्रयास करे जो शाही संरक्षण के खत्म होने के बाद से पैदा हुआ है।

इस बीच सूक्ष्म वित्त यानी माइक्रोफाइनेंस ने इस खाई को कुछ हद तक पाटने में मदद की है। गुजरात में श्रुजन ट्रस्ट के कच्छ की कशीदाकारी को पुनर्जीवित तथा दस्तावेजीकरण करने के प्रयासों को काफी सफलता मिली है जिसका अनुसरण देश के उद्योगपतियों द्वारा किया जा सकता है। बहरहाल, इस क्षेत्र की जरूरतों पर औपचारिक उधारदाताओं को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।

कपड़ा क्षेत्र के समग्र विकास के लिए, जिससे आबादी के एक बड़े हिस्से के सामाजिक और वित्तीय समावेश को भी मदद मिलेगी, कपड़ा मंत्रालय ने बुनाई, प्रसंस्करण और क्षेत्र के व्यापक विकास के लिए कई कदम उठाए हैं। 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 12,500 करोड़ रूपये की लागत के टफ्स, 1,972 करोड़ रूपये की लागत के एसआईटीपी और 1,900 करोड़ रूपये की लागत के आईएसडीएस जैसी तीन प्रमुख योजनाओं के अतिरिक्त, पायलट आधार पर टफ्स के तहत एक किराया-खरीद योजना भी शामिल की गई है जिससे कि छोटे बिजली करघा बुनकरों को उनकी मशीनरी को उन्नत बनाने में सक्षम बनाया जा सके ताकि वे ‘त्रुटिहीन‘ सूत उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने में समर्थ हो सकें। बिजली करघों के संस्थागत उन्नयन तथा एक टैक्स वेंचर कैपिटल यानी टीवीसी को भी लागू किया गया है।

12वीं पंचवर्षीय योजना में 1038 करोड़ रूपये की लागत के साथ उत्तर पूर्व में कपड़े के संवर्द्धन एवं विकास के लिए एक व्यापक कार्यक्रम बनाना योजनाओं के निर्माण में सक्षमकारी बनने, क्षेत्र की विशिष्ट जरूरतों को पूरी करने के लिए पर्याप्त लचीलापन रखने के जरिये इन सुदूर क्षेत्रों के समावेश की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम है। अन्य नई योजनाओं में श्रमिक आवास, एसआईटीपी में परिधान विनिर्माण इकाइयों की स्थापना, एकीकृत परिसंस्करण पार्क, इनक्यूबेशन केंद्र और उत्तर पूर्व में कृषि कपड़ों के संवर्द्धन के लिए एक योजना शामिल है।

दुर्गम लद्वाख क्षेत्र के खानाबदोशों, जो दुनिया की सबसे बेहतरीन गुणवत्ता वाले पशमीनाऊन का उत्पादन करने वाले पशमीना बकरों का पालन पोषण करने में काफी परेशानियों का सामना करते हैं, को भी समावेशी विकास की इन कोशिशों में भुलाया नहीं गया है। वर्तमान में, पशमीना ऊन विकास की एक योजना के तहत एक एकल ऊन उतारने वाला संयंत्र इस क्षेत्र में उत्पादित केवल 5,000 मीट्कि टन पशमीना ऊन उतारने के जरिये मूल्य संवर्द्धन करता है। उत्पादन का शेष 50,000 मीट्कि टन कच्चे माल के रूप में ज्यादातर पंजाब के व्यापारियों को बेचा जाता है जो इसका परिशोधन करते हैं और इसे इटली तथा दूसरे देशों के अन्य उच्च फैशन वाले स्थानों को निर्यात करते हैं।

पशमीना संवर्द्धन के लिए एक नई योजना की घोषणा अभी हाल में 2014-15 के लिए घोषित अंतरिम बजट में की गई। जांच की सुविधाओं तथा सौर उर्जा संचालित समुदाय छप्पर युक्त एक अन्य ऊन उतारने वाले संयंत्र की स्थापना की जाएगी जो कातने के हल्के मशीन के जरिये ऊन की हाथ से कताई करने में खानाबदोश महिलाओं के लिए सहायक साबित होगा। मूल्य संवर्द्धन में सक्षम बनाने के लिए एक परीक्षण तथा क्रम निर्धारण केंद्र की भी स्थापना की जाएगी। पशमीना उत्पादन और परिशोधन की पूरी प्रक्रिया झंस्कार और पैंगोंग झील का भ्रमण करने वाले पर्यटकों (फिल्म थ्री इडियट्स की शूटिंग के बाद एक लोकप्रिय पर्यटन गंतव्य) के लिए काफी दिलचस्पी भरी होगी। इस प्रकार, वहां पशमीना ऊन कहानी पर आधारित एक पर्यटक प्रदर्शनी केंद्र-सह-कैफे और स्मारिका दूकान की पूरी संभावना है।

भारतीय बुनाई एवं हस्त शिल्प के लिए पर्यटकों के आकर्षण को देखते हुए और खुद प्रधानमंत्री द्वारा व्यक्त की गई भावना के अनुरूप कपड़ा मंत्रालय देश में कपड़ा पर्यटन को बढ़ावा देने में जुटा है। पिछले जुलाई में कपड़ा, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालयों ने एक साथ मिलकर कपड़ा पर्यटन को बढ़ावा देने की एक रूपरेखा तैयार की। यह कपड़े की विकास गाथा में सभी नागरिकों एवं विदेशी आगंतुकों को शामिल करेगा क्योंकि यह सामाजिक और वित्तीय समावेश के ताने बाने से जुड़ा है।

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