शिल्प, संस्कृति और पर्यटन: पारंपरिक कौशलों को आजीविका से जोड़ने पर बनेगी बात

जया जेटली, संस्थापक और अध्यक्षा, दस्तकारी हाट समिति

भारतीय आबादी की एक बड़ी संख्या अपनी आजीविका के लिए पारंपरिक शिल्पों पर निर्भर करती है

अलग-अलग मंत्रालयों को दूसरे मंत्रालयों की गतिविधियों के बारे में अपनी आंख और दरवाजे खोलने में सक्षम बनाने और प्रोत्साहित करने पर जिससे समन्वय की भावना पैदा होती है, लंबे समय से विचार होता रहा है। इसके लिए किसी ‘बाहरी व्यक्ति‘ जैसाकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को परिभाषित करते हैं, की जरूरत थी जो इसकी पहचान करे और मंत्रालयों को आपस में सहयोग करने के लिए प्रेरित करे न कि आपस में होड़ करने और कलहपूर्ण जागीरदारी की भावना पैदा करने को।

बदलते रूझान और कदमों की ये पद्धतियां प्रशासनिक सुधारों को लेकर एक नए रास्ते का संकेत देती हैं जो बेहतर सुशासन की किसी भी कोशिश के लिए अहम हैं। एक स्पष्ट और सरल संयोजन कपड़ा मंत्रालय में दिखता है जो पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालयों के अधिदेश के साथ शिल्प एवं वस्त्र के विकास की चौकसी करता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि एक पूर्ण विकसित एवं समन्वित संयोजन धीरे-धीरे भारत में मौजूद अमूर्त और साकार धरोहर स्थलों, विचारों, कौशलों और आजीविकाओं की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जागरूकता को बेहतर बनाएगा। इस प्रकार का एकीकरण सबसे सरल व्यवसायों के उत्थान और समावेश को भी सक्षम बनाएगा। इस एकीकरण को पूर्ण बनाने के लिए खादी और ग्रामोद्योग के ध्वज तले ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत जो आजीविकाएं संचालित की जाती हैं उन्हें अभी भी शिल्प और हस्तकरघाओं पर नीति के साथ जोड़े जाने की जरूरत है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कदम प्रधानमंत्री की 15 अगस्त 2014 को हरेक सांसद से विकास के लिए वित्तीय दुरूपयोग की शिकार एमपीलैड योजना से फंड के साथ एक गांव को गोद लेने की अपील थी। किसी गांव के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे में बेहतरी की सूची बनाना अपेक्षाकृत आसान है क्योंकि सड़कों, पुलों, जल स्थलों, बिजली, स्वास्थ्य क्लिनिकों, पीने का पानी के लिए स्थानीय मांग विशिष्ट हैं और किसी विकास के लिए अनिवार्य शर्त हैं।

स्थानीय आजीविकाओं, स्थानीय रचनात्मक अभिव्यक्तियों, विनिर्माण में पारंपरिक ज्ञानों और तकनीकों, कौशलों जिन्हें उन्नत करने की जरूरत है और गैरलाभकारी व्यवसायों से जुड़े लोगों की पहचान करना अगली और ज्यादा कठिन आवश्यकता है।

एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि कौन व्यक्ति या कौन सी एजेंसी एक एकीकृत तथा समग्र तरीके से विकास, रचनात्मक आजीविकाओं को शामिल करने तथा पर्यटन की संभावनाओं पर नजर रखने वाले ऐसे सांसदों को सहायता देने के लिए सामने आएगी?

शिल्प, संस्कृति  और पर्यटन का एकीकरण

ऐसे गांवों में शिल्प, संस्कृति  और पर्यटन के एकीकरण के लिए इसकी विशिष्ट आत्मा को खोजने की जरूरत होगी जो इसे अनूठी बनाती है। सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और पर्यटन विशेषज्ञों को स्थानीय परिसंपत्तियों को प्रदर्शित करने के लिए संभावना की खोज करनी होगी। इसके विशिष्ट एवं पारंपरिक कौशलों का मानचित्र बनाना होगा। इसके सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों तथा विशिष्ट दिलचस्पी के स्थानों को सामाजिक एवं सांस्कृतिक मिलन स्थलों के बतौर विकसित किया जा सकता है जो संवाद तथा रचनाशीलता को बढ़ाते हैं। अगर ये स्थानीय हाटों की जगह पर हैं तो इन्हें बरकरार रखा जा सकता है और भारत के पारंपरिक आर्थिक और सामाजिक हब के रूप में इन्हें और बेहतर बनाया जा सकता है। समुदाय के प्रत्येक खंड को साझीदार बनाने के जरिये हरेक गांव को अपनी विशिष्टता प्रदर्शित करनी होगी।

कच्छ में ऐसे गांव, जहां शिल्पकार समुदाय वास करते हैं, आगे की सोच रखने वाले समूहों के अनूठे उदाहरण हैं जो समझ चुके हैं कि आर्थिक समृद्धि का उनका रास्ता पर्यटन की संरचना के भीतर उनकी पारंपरिक संस्कृतियों और कौशलों को प्रदर्शित करने से होकर जाता है। राबारी कशीदाकारों, बुनकरों, हरिजन कशीदाकारों और चमड़े के कारीगरों, तांबे की घंटी बनाने वाले और अन्य लोग समेकित रूप से विकास की उस धारा में जुड़ चुके हैं जो 2001 के भूकंप के बाद कच्छ में प्रवाहित हुआ था। छोटे रण में जलरहित सूखा क्षेत्र बन्नी अपने गांवों से आच्छादित एक पर्यटक रिसॉर्ट बन चुका है। कुछ पारंपरिक बुंगा (गोल झोपड़ियां जो भूकंप में बच गई थीं) अब अपनी अनोखी सजावट और संबद्ध शॉवर तथा पश्चिमी शैली के शौचालयों के साथ आकर्षक चक्राकार शयनकक्ष बन चुके हैं। स्थानीय गायक सामुदायिक शैली के भोजन क्षेत्रों में रात के खाने के समय स्थानीय वाद्य यंत्रों से यात्रियों का मनोरंजन करते हैं। पीतल की थालियों में ताजे मक्खन और उनके अपने पशुओं के दूध के साथ पौष्टिक रोटियां परोसी जाती हैं।

गांव की महिलाओं को बेहद कम उम्र से ही कशीदाकारी सिखाई जाती है जिससे कि वे अपनी स्त्रियोचित कौशलों का विकास कर सकें। वे रजाई से लेकर चाबी के छल्लों तक कशीदाकारी की वस्तुएं बनाती हैं। जब पर्यटक आते हैं तो उन्हें इन वस्तुओं की सरकारी शोरूमों या बिचौलियों की तुलना में पांच गुनी तक अधिक कीमत मिलती है।

यह सारा कुछ इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि उन्हें गुजरात सरकार द्वारा लगातार पानी तथा बिजली की आपूर्ति की जा रही है। अब वे छोटे शोरूम और मार्केटिंग के लिए ज्यादा अवसर चाहते हैं।

विदेशी संस्कृतियों या ‘विकास‘ के शहरी पैमानों की नकल करने की जगह उन्होंने महसूस किया कि उन्हें केवल उनकी अपनी जीवन शैली पर ध्यान केंद्रित करने और उसे गर्व के साथ पेश करने से उनका जीवन अनूठा प्रतीत होगा और यह उनकी आय में मूल्य संवर्द्धन करेगा।

भुजोदी भुज के निकट के एक बुनकर के गांव का एक उदाहरण है। कंबलों और रूखे उनों से उंटों के कवर बनाने के बुनकरों की निम्न शुरूआत से उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं की उंचाई तक की प्रगति हासिल कर ली है। उनके कपड़ों की श्रृंखला और संपदा उल्लेखनीय है। कई बुनकरों के घरों, जहां वे काम भी करते हैं, के आगे एक छोटा शोरूम भी जुड़ चुका है। खरीददारों को उसमें प्रवेश करने तथा बुनाई की प्रक्रिया को देखने के लिए आमंत्रित किया जाता है। बुनकरों तथा ग्राम पंचायतों के अन्य सदस्यों ने राज्य एवं क्रेद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक मुलाकात में पर्यटकों के लिए उनके अभिलेखीय कार्यों के लिए एक कॉफीघर तथा एक छोटे संग्रहालय की इच्छा भी जाहिर की। अगर सरकार संग्रहालय के लिए सहायता देती है तो पंचायत जमीन मुहैया कराने के लिए तैयार है। कोई निजी उद्यमी भी कॉफीघर स्थापित कर सकता है।

उपरोक्त उदाहरण हमें राष्ट्रीय धरोहर गांवों (और वाराणसी जैसे राष्ट्रीय धरोहर शहर) की घोषणा की धारणा की ओर ले जाते हैं। इस मानदंड को प्राप्त करने के लिए किसी गांव या शहर को सामूहिक रूप से सहमति प्राप्त करनी होगी और पर्यटन एवं संस्कृति जैसे उनके विकास से जुड़े विभागों से और सहयोग प्राप्त करने का पात्र बनना होगा।

कशीदाकारी के लिए बन्नी में होडका, हस्तकरघा बुनाई के लिए भुजोदी, हस्तब्लॉक छपाई के लिए अजरखपुर जैसे गांव ग्रामीण प्रयासों की बदौलत सृजित हुए हैं। श्रुजन और खमीर जैसे अन्य संगठनों ने पर्यटकों को आकर्षित करने और कच्छ के सांस्कृतिक कौशलों की रक्षा के लिए संग्रहालयों तथा शोरूम की स्थापना की है।

विकास करने योग्य एक अन्य धारणा स्व-निर्भर गांव या गांवों के समूह (क्लस्टर) के ‘आधुनिक‘ संस्करण की है। नखतराना जिला एक संभावित क्षेत्र है जहां कपास किसानों को प्रोत्साहित किया जा सकता है कि वे स्थानीय कातने वालों की जरूरतों तथा कपास कपड़े की जरूरत वाले बुनकरों के साथ अपने उत्पादन को संघटित करें।

रूर्बन
किसी आदर्श ‘रूर्बन‘ गांव जो बहिर्गमन को निरूत्साहित करता है, की दिशा में काम करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका वहां अच्छी सड़कों, आवागमन और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराना है। ऐसे गांवों में सृजनशील समुदाय के बीच सांस्कृतिक पर्यटन और यहां तक कि कृषि पर्यटन को भी आकर्षित करने के लिए सहयोग की भावना पैदा की जा सकती है। सराहना तथा अनुकरण करने का एक उदाहरण महाराष्ट् के अहमदनगर जिले का हिवारे बाजार है जहां एक पंचायत प्रमुख ने सिंचाई और जल प्रबंधन, शराब की दूकानों को बंद करवाने तथा गांवों से बाहर चले गए लोगों को वापस गांव की तरफ आकर्षित करने के मामले में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। आज इस गांव ने कई पुरस्कार हासिल किए हैं, इस गांव में रोजाना 400 पर्यटक आते हैं और हर ग्रामीण विकास का एक लाभार्थी है जो वित्तीय समावेश लेकर आया है। इस स्तर का गांव अपने टिकाउ पारंपरिक खेती और जल प्रबंधन पद्धतियों के लिए निश्चित रूप से एक राष्ट्रीय धरोहर गांव के रूप में मान्यता पाने का हकदार है।

प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट् को एक और महत्वपूर्ण दिशा दिखाई जो सफाई एवं स्वच्छता की जरूरत को लेकर थी। हमें इस तथ्य को अवश्य स्वीकार करना चाहिए कि संस्कृति, पर्यटन और करघा कारीगरों के लिए आर्थिक लाभ के लिए शिल्प कलाओं के प्रस्तुतीकरण की कोई भी चर्चा गंदगी एवं कूड़े को गांव के लोगों की प्राकृतिक छवि, स्वास्थ्य तथा कुशलता को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दे सकती।

मुख्य बात यह है कि जब हम ‘संस्कृति‘ की एक आम समझ को विस्तारित करें, उससे पहले ‘स्वच्छता की संस्कृति‘ के प्रचार प्रसार के लिए नागरिकों का एक सामूहिक अभियान होना चाहिए। अपने देश, संस्कृति तथा आत्म-महत्व के प्रति गर्व तभी पैदा हो सकता है जब हमारे आसपास का वातावरण साफ और बढ़िया हो।

राष्ट्रीय धरोहर नगर
जब हम राष्ट्रीय धरोहर गांव की तर्ज पर राष्ट्रीय धरोहर नगर की बात करते हैं तो सबसे पहले वाराणसी का ध्यान आता है।

इसलिए, वाराणसी में विकास के सभी पहलुओं पर बड़े पैमाने पर स्वच्छता के लिए अभियान चलाने की जरूरत है। ‘स्वच्छता की संस्कृति‘ का विचार वाराणसी की संस्कृति को रेखांकित करने की किसी भी योजना से पहले आना चाहिए। दुनिया के लोगों को यहां आने के लिए प्रेरित किया जाए उससे पहले यह बेहद महत्वपूर्ण है।

गंगा की पवित्रता का सर्वश्रेष्ठ अर्थ है मानव जीवन के किसी भी रूप को बनाए रखने के लिए जल की महती जरूरत को मान्यता देना। बजबजाती गंदगी, खुले सीवर और गंदा पानी ऐसी बीमारियों को जन्म देता है जो मानव जीवन को नष्ट कर देते हैं। सार्वजनिक एवं निजी एजेंसियों को एक साथ मिलकर लंबे समय से मौजूद गंदे स्थानों को साफ सुथरे कमल के छोटे तालाबों में तबदील कर देना चाहिए और स्थान की सुरक्षा के लिए जाली लगा देनी चाहिए और दिखा देनी चाहिए कि किस प्रकार गंदगी को खूबसूरती में बदला जा सकता है।

वाराणसी के हथकरघे, खासकर, इसके जरी वस्त्र सदियों से विख्यात रहे हैं। अगर हम किसी पर्यटक को यह दिखाना चाहें कि किस प्रकार हथकरघे बुने जाते हैं तो बुनकरों की मौजूदा स्थिति हमें शर्मशार कर देगी। वाराणसी के हथकरघा बुनकरों को ज्ञात विशिष्ट कौशलों तथा तकनीकों को हमें जीवित रखने की जरूरत है क्योंकि दूसरे देशों में उनका कोई वजूद नहीं है। वे हमारी धरोहर के हिस्से हैं। निजी क्षेत्र साझीदार द्वारा निर्मित एक खूबसूरत कैफेटेरिया किसी पुराने खस्ताहाल भवन को तत्काल एक जीवंत पर्यटन स्थल में बदल देगा जो गर्व के साथ वाराणसी की हथकरघा कला को बनाये रखने के लिए उठाए गए कदमों को रेखांकित करेगा। कपड़ा एवं पर्यटन मंत्रालयों के बीच एक समन्वित तथा कल्पनापूर्ण सहयोग बाधाओं को दूर करने में सहायक होगा और जरूरतमंदों के जीवन को लाभ पहुंचाएगा।

रिक्शों को कलात्मक पुट
उत्तर भारत में बड़ी संख्या में रिक्शों का प्रचलन है। परिवहन मंत्रालय के बीच एक स्वस्थ समन्वय और वाराणसी, आगरा तथा अन्य धरोहर नगरों के समग्र विकास से संबंधित विभागों को श्रम दक्षता के लिहाज से बेहतर रिक्शों के निर्माण के लिए फंड का आवंटन करना चाहिए। रिक्शा मालिकों, चालकों तथा यात्रियों, खासकर पर्यटकों को वाराणसी की साफ तंग गलियों में कलात्मक रूप से सजे, ज्यादा आरामदायक रिक्शों में भ्रमण करने का लाभ मिल सकता है।

पारंपरिक चित्रकारी
वाराणसी के प्रसिद्ध घाटों की दीवारें कुरूचिपूर्ण विज्ञापनों से पटी हैं जबकि यहां के भित्ति चित्र एक लुप्त प्राय परंपरा है जिसका पुनरोत्थान कर इस शैली के चित्रकारों को प्रोत्साहित किया जा सकता है और घाटों को एक शानदार आर्ट गैलरी में तबदील किया जा सकता है। इसी प्रकार यहां के पारंपरिक लकड़ी के खिलौना निर्माताओं तथा चित्रकारों की कला को भी पुनरूजीवित किया जा सकता है। कबीर चौराहा स्थित परिसर को भी शैक्षणिक तथा पर्यटन कार्यक्रमों में शामिल किया जा सकता है जिससे कि सामाजिक समरसता और सरल आजीविका के लिए सम्मान की विरासत को रेखांकित किया जा सके।

अगर हम संरक्षण को समाज के सभी वर्गों के बीच सृजनशील सहयोग के रूप में देखें तो एक व्यापक कैनवास पूरे देश भर में खुलता प्रतीत होता है। एकबार हम सामूहिक रूप से महसूस कर लें कि न तो सरकार और न ही प्रणाली के खिलाफ संघर्ष कर रहे व्यक्तिविशेष खुद अपने दम पर बदलाव ला सकते हैं, तो हो सकता है कि हम एक नए वातावरण का सृजन करने का रास्ता ढूंढ लें।

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