शहरी विकास यानी प्रगति के वाहक

एम रामचंद्रन, डिस्टिंगुइश्ड फेलो, स्कॉच डेवेलपमेंट फाउंडेशन

नगर विकास के वाहक हैं। हालांकि केवल 30 फीसदी भारतीय नगरों में निवास करते हैं, वे देश के जीडीपी में 60 फीसदी से अधिक तथा कर राजस्व में 80 फीसदी का योगदान देते हैं। लेकिन नगरों में रहने वालों को पानी, बिजली की कम आपूर्ति से लेकर अन्य ढांचागत संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन्हीं समस्याओं से रूबरू कराता एम रामचंद्रन का यह लेख

 भारत की शहरी आबादी 31 फीसदी के स्तर पर है। भले ही, चीन की 50 फीसदी, दक्षिण अफ्रीका की 61 फीसदी तथा ब्राजील की 87 फीसदी के मुकाबले यह कम है लेकिन संख्या के लिहाज से 1950 की 17 फीसदी से बढ़कर यह वर्तमान स्तर पर पहुंच गई है। केरल, गोवा, नागालैंड और सिक्किम ने पहली बार अपनी ग्रामीण आबादी में गिरावट दर्ज कराई है। पिछले दशक के दौरान शहरी आबादी में बढ़ोतरी सिक्किम में 153 फीसदी, केरल में 93 फीसदी और त्रिपुरा में 76 फीसदी रही है। इस क्रम में सबसे अधिक शहरीकृत राज्य गोवा, मिजोरम एवं तमिलनाडु हैं जबकि सबसे कम शहरीकृत राज्य असम, बिहार और हिमाचल प्रदेश हैं। हमारे देश में आज 7,935 नगर एवं शहर हैं, इनमें से 3,894 जनगणना शहर हैं जिनके अपने व्यापक निहितार्थ हैं। शीर्ष तीन क्रम में हमारे पास 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले 53 नगर हैं, जिनमें 7-7 उत्तर प्रदेश एवं केरल में हैं, 6 महाराष्ट् में हैं, 4-4 गुजरात एवं मध्य प्रदेश में हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 100 सबसे तेज गति से बढ़ने वाले शहरों में 25 भारत में हैं। हमारे शहरी क्षेत्र देश के जीडीपी में 60 फीसदी से अधिक तथा हमारे कर राजस्व में 80 फीसदी का योगदान देते हैं। फिर हमारे शहरी क्षेत्रों तथा नगरों को लेकर सकारात्मक खबरें क्या हैं?

हमारे शहरी घरों के लगभग 93 फीसदी बिजली का उपयोग करते हैं, 81 फीसदी घरों में परिसर के भीतर शौचालय की सुविधा है, 68 फीसदी घर बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठाते हैं, 77 फीसदी के पास टीवी है, 82 फीसदी के पास टेलीफोन है, 76 फीसदी के पास मोबाइल है जबकि 35 फीसदी के पास दुपहिया वाहन हैं। शहरी क्षेत्रों में कंप्यूटर साक्षरों की संख्या साढ़े 19 करोड़ है जिसकी वजह से इंटरनेट एक्सेस करने के लिए मोबाइल इंटरनेट के मुख्य प्लेटफार्म बन जाने की उम्मीद है। इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के 13.7 करोड़ की संख्या पार कर जाने के आसार हैं।

लेकिन फिर शहरी भारत के सामने मुद्वों की जो जटिलता है, वह बेहद चुनौतीपूर्ण है। शहरी भारत में रहने वाले हरेक 6 परिवारों में एक झुग्गियों में रहता है। शहरी भारत का 25 फीसदी झुग्गियों में निवास करता है। पांच शहरों-विशाखापट्टनम, जबलपुर, मुंबई, विजयवाड़ा और मेरठ में 40 फीसदी से अधिक झुग्गियों में रहने वाले परिवार हैं। इस समस्या की गंभीरता तब स्पष्ट होती है जब नवीनतम जनगणना से पता चलता है कि देश के 4,041 वैधानिक शहरों में से 2,543 ने झुग्गियों का अस्तित्व दर्ज कराया है। सबसे ज्यादा झुग्गी आबादी वाले शीर्ष पांच राज्यों में अविभाजित आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल हैं। चंडीगढ़, गुजरात, झारखंड, असम और केरल इस सूची के सबसे नीचे के पांच राज्यों में शामिल हैं।

जल की कमी

जब जल की कमी की बात आती है तो लगभग 71 फीसदी शहरी घरों में परिसर के भीतर जल का श्रोत है जबकि 8 फीसदी को 100 मीटर से अधिक की दूरी से पानी लाना पड़ता है। ऐसा लगता है कि किसी भी राज्य ने शहर के भीतर सभी के लिए पानी की समान पहुंच सुनिश्चित करने या 24 घंटे पानी की सुलभता के लिए कोई बड़ी पहल नहीं की है।

महाराष्ट् सुजल निर्मल अभियान जिसका उद्वेश्य जल आपूर्ति की चुनौतियों का सामना करने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना है, एक दीर्घकालिक योजना है जो समग्र रूप से इस मुद्वे का समाधान करती रहती है। महाराष्ट् में मल्कापुर संभवत पहला शहर है जिसने 24 घंटे जल मुहैया कराया है। नागपुर का पूरे शहर को 24 घंटे जलापूर्ति का एजेंडा एक पायलट परियोजना के पूरी होने के बाद जारी है। कर्नाटक हुबली-धारवार-बेलगाम में ऐसी आपूर्ति में अपनी पायलट परियोजना की सफलता के बाद राज्य के सभी शहरों में इसे दुहरा पाने में ज्यादा सफल नहीं हो पाया है। गुजरात सरकार ने अधिकृत रूप से कहा है कि उसने 8 नगर निगमों के अतिरिक्त राज्य के 159 नगरपालिकाओं द्वारा शामिल सभी क्षेत्रों को पीने का पानी मुहैया कराने की एक दीर्घकालिक योजना बनाई है। सभी 159 शहरों को 140 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन यानी एलपीसीडी पीने के पानी की नियमित आपूर्ति के लिए 2,500 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। चूंकि राज्य सरकार की नियमानुसार सभी को पीने का पानी मुहैया कराने को लेकर एक विजन है, उसे उम्मीद है कि 2014 के आखिर तक वह सभी शहरी निकायों को 140 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन पीने के पानी की नियमित आपूर्ति करने के मील के पत्थर को पार कर पाने में समर्थ हो जाएगा।

सभी शहरी नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण पीने के पानी की सुलभता मुहैया कराने की प्रतिबद्धता और आपूर्ति के घोषित घंटों के दौरान समान पहुंच सुनिश्चित करना अभी भी ज्यादातर राज्य सरकारों के लिए एक उपेक्षित काम रहा है।

शहरी जल एजेंडा जैसेकि सभी तक पहुंच, अपशिष्ट में कमी, रिसाइक्लिंग की शुरूआत, जल संयंत्रों का बेहतर प्रबंधन, सेवा आपूर्ति में बेहतरी आदि की समग्र जटिलताओं के महत्व पर विचार करते हुए केंद्र सरकार ने नए प्रस्तावित 500 पर्यावास कार्यक्रम के एक हिस्से के रूप में बेहतर जल प्रबंधन पर एक मिशन की शुरूआत करने का फैसला किया है जिससे कि न केवल जल आपूर्ति प्रणाली में बेहतरी आए बल्कि उन्हें एक ठोस मंच भी मुहैया कराया जा सके।

अपशिष्ट प्रबंधन

शहरी उपेक्षा का एक अन्य प्रमुख क्षेत्र स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन और सीवेज कार्यक्षेत्र है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में शहरी नागरिकों द्वारा सालाना अनुमानित 6.2 करोड़ टन पालिका ठोस अपशिष्ट का सृजन किया जाता है जिसमें से 80 फीसदी से अधिक का निपटान शहरी निकायों द्वारा गैर स्वच्छतापूर्ण तरीके से कचरे के मैदानों में कर दिया जाता है जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए हानिकारक समस्याएं पैदा हो जाती है। शहरी मिशन के तहत अपशिष्ट के बेहतर तरीके से निपटान की पीपीपी की कोशिशों को उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जटिलता में फंस जाने की खबर है।

ऐसी खबरें कि हैदराबाद नगर पालिका आयुक्त ने स्वच्छता कर्मचारियों को कूड़े का ढेर साफ करने को कहा जिसकी वजह से शहर में एक महीने से बदबू आ रही थी, पुणे की ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना जिसके पास प्रबंधन व्यवस्था में दो हजार से ज्यादा कबाड़ी वालों को शामिल करने करने का अधिकार था, को समस्याओं का सामना करना पड़ा, लगभग तीन वर्षों से केरल की राजधानी में अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर राजनीतिक मतभेद के कारण कुव्यवस्था का माहौल रहा जहां कूड़े के जमा होने तथा लगातार बारिश से निपटान व्यवस्था के पंगु हो जाने के कारण राज्य की राजधानी कूडा शहर में तबदील हो गई, इंगित करती हैं कि जहां तक इस बुनियादी मुद्वे के प्रबंधन का सवाल है, प्रणाली में कोई बहुत बड़ी खामी है।

वे दिन गए जब इस विषय को केवल स्थानीय निकायों के लिए छोड़ दिया जाता था। इसके लिए राज्य सरकारों को बेहद सक्रिय तरीके से आगे आना होगा क्योंकि ये अपशिष्ट के एकत्र होने, निपटान की प्रौद्योगिकी, सामान्य निपटान संयंत्रों के लिए वित्त पोषण और जमीन भरने के स्थलों की पहचान करने के मुद्वे हैं जिनपर राज्य सरकारों को सार्वजनिक पहल करने की जरूरत है और शून्य अपशिष्ट नगरों के लक्ष्य को हासिल करने में स्थानीय निकायों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है।

अहमदाबाद भी एक ऐसा ही नगर है जिसके पास वर्ष 2031 तक शून्य अपशिष्ट नगर होने का एक रोडमैप है। बहुत कम भारतीय नगरों के पास पर्याप्त जलमल निपटान सुविधाएं हैं। इसके परिणामस्वरूप, बगैर निस्तारित जलमल का निपटान नदियों और खुले क्षेत्रों में कर दिया जाता है। अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार नए प्रस्तावित 500 निवास कार्यक्रम के एक हिस्से के रूप में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर एक उप मिशन बनाये जिससे कि कूड़ा मुक्त शहरों तथा नियमित आधार पर नगरों को स्वच्छ रखने के एजेंडा पर ध्यान दिया जा सके और स्थायी परिणाम सुनिश्चित हो सके।

खुले में शौच से मुक्ति हमारे सभी नगरों का एक प्रमुख लक्ष्य है जिसे अर्जित करने की जरूरत है। इस ध्येय को वर्तमान सरकार के 2019 तक सभी के लिए शौचालय के मिशन लक्ष्य से भी उपयुक्त तरीके से फिर से बल मिला है। 2008 की राष्ट्रीय शहरी स्वच्छता नीति में राज्य स्वच्छता रणनीतियों के विकास और नगर स्वच्छता योजनाओं की तैयारी को सभी राज्यों के लिए दो अनिवार्य प्रारंभ बिन्दुओं के रूप में परिकल्पना की गई थी। अगर राज्यों ने इस एजेंडा को गंभीरतापूर्वक लिया होता तो वे वर्तमान सरकार द्वारा तय की गई प्राथमिकता के लिहाज से इसे क्रियान्वित करने की बेहतर स्थिति में होते। इस मामले में मध्य प्रदेश अपवाद साबित हुआ जिसने 2012 में मुख्यमंत्री शहरी स्वच्छता योजना की शुरूआत की जिसका उद्वेश्य चरणबद्ध तरीके से पांच वर्षों की अवधि में राज्य के सभी शहरी निकायों को कवर कर लेना था। 2011-12 के दौरान बताया जाता है कि राज्य के 52 शहरों में 178 समुदाय शौचालयों का और 13 नगरों व शहरों में 14,281 शौचालयों निर्माण हो चुका है। 2012 से 2017 तक की अवधि में इस कार्यक्रम के लिए 459 करोड़ रूपये का आवंटन किया जा चुका है।

शहरी रणनीति

हमारे नगरों एवं शहरों के सामने कई तरह की समस्याएं हैं। अभी तक कोई भी राज्य एक सुस्पष्ट तथा सुविचारित शहरी रणनीति लेकर सामने नहीं आया है। शहरी नागरिकों के लिए बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित करने के लिए संसाधनों की भारी आवश्यकता और निजी साझादारी और निवेश को आकर्षित करने की जरूरत के संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। तीन राज्यों ने इस बारे में कुछ पहल की है जैसे केरल एक राज्य शहरीकरण रिपोर्ट तैयार कर रहा है, कर्नाटक की पूर्व राज्य सरकार ने एक नियमित शहरी नीति की दिशा में कदम आगे बढ़ाया था और राजस्थान ने ऐसी रणनीति को आकार देने के लिए एक समिति का गठन किया है। इन राज्यों से और ज्यादा कुछ सुनने को नहीं मिला है। महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र सरकार को एक द्वितीय राष्ट्रीय शहरीकरण आयोग के गठन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए जिससे कि शहरी विकास के विभिन्न वर्गों के लिए रणनीतियां बनाई जा सके और राज्यों को इन्हें शुरू करने की सलाह दी जा सके।

नियमित सावधिक आधार पर शहरी पहलों और प्रदर्शनों के राज्यवार विस्तृत विवरणों के अभाव में एकमात्र कदम जहां राज्यों में कुछ काम हो रहा दिखता है, वह जेएनएनयूआरएम का क्रियान्वयन है। सात साल के इस मिशन की अवधि दो वर्ष और बढ़ाकर मार्च 2014 कर दी गई है। मार्च 2014 के आखिर तक 65 मिशन नगरों के ढांचागत भाग के तहत 602.01 अरब रूपये की अनुमानित लागत पर कुल 538 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई जिसमें केंद्र सरकार से 276.55 अरब रूपये की अतिरिक्त केंद्रीय सहायता शामिल है। 227 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और शेष पर अभी भी काम चल रहा है।

नगरों की तुलना

मिशन द्वारा प्रेरित तथा शुरू की गई कई अन्य नई पहलें भी थी। सेवा स्तरीय मानदंड एक ऐसी धारणा है जो राज्यों एवं नगरों को इसका जायजा लेने में सक्षम बनाएगा कि जल आपूर्ति बेहतरी, ठोस अपशिष्ठ प्रबंधन, जलनिकासी एवं मल-जल निस्तारण प्रणाली, नगर परिवहन और सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिहाज से नागरिकों को सेवाएं देने में वे कहां ठहरते हैं? ऐसा नियमित अभ्यास एक तरफ शहरों को सतत बेहतरी के लिए योजनाएं बनाने में सक्षम बनाएगा और दूसरी तरफ नागरिकों को सीधा फीडबैक मिल पाएगा कि सेवा का स्तर क्या है और उसमें बेहतरी लाने की क्या योजना बनाई गई है? किसी भी राज्य ने इस एजेंडा को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया है और इस प्रक्रिया में सेवा आपूर्ति जोकि स्थानीय निकाय स्तर पर शासन के केंद्रबिंदु में होनी चाहिए, में उल्लेखनीय सुधार नहीं हो पा रहा है। ऋण पात्रता निर्धारण के लिए भी कदम उठाया गया था लेकिन शहरों द्वारा अपनी रेटिंग में सुधार लाने पर भी खास ध्यान नही दिया गया। इसी तरह, स्थानीय निकाय स्तर पर क्षमता निर्माण के अहम एजेंडा पर भी अविभाजित आंध्र प्रदेश को छोड़कर किसी अन्य राज्य ने कोई तवज्जो नहीं दिया। एक अध्ययन से प्रदर्शित होता है कि आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों, जिन्होंने लंबे समय से नगरीय ढांचे का क्रियान्वयन किया है, को शहरी विकास पर प्रगतिशील तरीके से काम करने के रूप में अभिस्वीकृति दी गई है।

राज्य सरकार की भूमिका

कुछ विशिष्ट शहरी पहलों के लिए श्रेय स्वाभाविक रूप से संबंधित राज्यों को जाएगा। गुजरात के सूरत और राजकोट जैसे नगरों ने बेहतर सेवा आपूर्ति के लिए ई-गवर्नेंस को क्रियान्वित किया है, तमिलनाडु के कोयंबतूर ने इलेक्ट्रानिक प्रणाली के जरिये मंजूरी और शिकायत प्रबंधन की स्थापना की है, नागपुर ने डिजिटल इनक्लुजन और म्युनिसिपल ई-गवर्नेंस को क्रियान्वित किया है, भोपाल ने ऑनलाइन म्युनिसिपल प्रशासनिक प्रणाली की शुरूआत की है तो अब इंदौर के पास स्वचालित भवन योजना मंजूरी प्रणाली है।

खासकर, शहरी परिवहन के क्षेत्र में कुछ बड़ी परियोजनाएं लगातार केंद्रीय वित्त पोषण और सहायता पर निर्भर बनी हुई हैं। मेट्रो रेल प्रणाली वर्षों तक कोलकाता नगर तक सीमित रही लेकिन जब दिल्ली को केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच 50-50 फीसदी के संयुक्त उद्यम के जरिये केंद्रीय सहायता मिली तो इसे मानों पंख लग गए और इसकी प्रेरणा से अब देश के कई बड़े शहरों में मेट्रो रेल योजना पैर पसार रही है। पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों के पास हमारे नगरों के चेहरे को बदलने के लिए बेहतर क्षमता और झुकाव है। गुजरात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्य शहरी क्षेत्रों में बदलाव लाने की प्रतिबद्धता में सबसे आगे बने हुए हैं।

स्मार्ट शहर

शहरी एजेंडा का विस्तारित होना तय है और केंद्र सरकार द्वारा भारत के नगरों एवं शहरों के लिए योजनाओं की श्रृंखला घोषित करने के साथ ज्यादा गतिविधयों की संभावना है। इनमें सौ स्मार्ट शहर, औद्योगिक गलियारे के साथ परिवहन संपर्क से जुड़े स्मार्ट शहर, चेन्नई- बंगलुरू औद्योगिक गलियारे में तीन नए स्मार्ट शहर, 2019 तक कुल स्वच्छता के दायरे में हरेक घर को शामिल करना, ढांचागत बेहतरी के लिए कम से कम 500 शहरी पर्यावास को सहायता, ज्यादा शहरी मेट्रो परियोजनाओं के लिए समर्थन, 2022 तक सभी के लिए आवास, राष्ट्रीय धरोहर नगर विकास योजना, ‘नमामी गंगे‘ जिससे नदी से जुड़े सभी शहर लाभान्वित होंगे और दिल्ली को एक विश्व स्तरीय नगर बनाना शामिल है।

राज्यों के लिए उनकी क्षमताओं में वृद्धि करने, परियोजनाओं के समय से क्रियान्वयन के लिए तैयारी, निजी भागीदारी लाने के लिए नीतिगत समर्थन एवं उपायों में सक्रियता दिखाने, हमारे शहरों एवं नगरों के चेहरे को बेहतर बनाने के लिए जो भी संभव और व्यवहार्य तरीके हों उन्हें लागू करने, सेवा आपूर्ति एवं नागरिक संतुष्टि में उल्लेखनीय उपलब्धियों को सुनिश्चित करने के लिए एक बार फिर से इसमें प्रचुर अवसर उपलब्ध हैं।

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