बुनियादी ढांचे और उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण

एन सी सक्सेना, डिस्टिंगुइश्ड फेलो, स्कॉच डेवेलपमेंट फाउंडेशन

पिछले कुछ समय से अपर्याप्त क्षतिपूर्ति और प्रभावित लोगों की आजीविका के नुकसान  तथा बिना उचित पुनर्वास के अनिच्छुक विस्थापन के कारण कई मामलों में सरकार और कंपनियों द्वारा भूमि अधिग्रहण का प्रतिरोध हो रहा है। नए कानूनों एवं बुनियादी ढांचे और उद्योग पर इसके प्रभाव के संदर्भ में भूमि अधिग्रहण से संबंधित मुद्वों का विश्लेषण कर रहे हैं एन सी सक्सेना

पिछले दो दशकों में तेज आर्थिक विकास ने बुनियादी ढांचे, उद्योग, संसाधन उत्खनन (जैसे खनन) और रियल एस्टेट समेत शहरीकरण जैसे कई क्षेत्रों से भूमि की मांग बढ़ा दी है। भले ही, इनमें से कई गतिविधियों का वित्तपोषण निजी तरीके से होता है और उनका उद्वेश्य लाभ अर्जित करना होता है पर वे रोजगार सृजन जैसे एक सामाजिक उद्वेश्य की भी पूर्ति करते हैं क्योंकि जमीन की प्रति इकाई रोजगार सृजन कृषि की तुलना में गैर कृषि उपयोगों में ज्यादा है।

उदाहरण के लिए, 4,000 मेगावाट का एक थर्मल संयंत्र भले ही लगभग 250 घरों को विस्थापित कर दे लेकिन यह छोटे उद्योग को बिजली मुहैया कराने के जरिये हजारों नई नौकरियों का सृजन करेगा और नलकूपों को बिजली देने के द्वारा फसल के क्षेत्र और उत्पादकता दोनों में ही इजाफा करेगा।

वर्तमान में, भारत की कुल आबादी में शहर में निवास करने वालों की हिस्सेदारी लगभग 31 फीसदी है लेकिन वे देश के कुल क्षेत्र के केवल 6 फीसदी हिस्से का ही स्थान लेते हैं। औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के जरिये विकास न केवल श्रम उत्पादकता को बढ़ाएगा बल्कि यह भूमि से गैर कृषि पेशों की तरफ लोगों को खींचने के जरिये कृषि भूमि से दबाव को भी कम करेगा। बहरहाल, भूमि अधिग्रहण भारत में तेज औद्योगिकीकरण और बुनियादी ढांचे में बेहतरी लाने की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक बाधा के रूप में उभर कर आया है। जमीन की खरीद में देरी का परिणाम अनिश्चितता और लागत वृद्धि के रूप में सामने आता है और इस प्रकार विकास को प्रभावित करता है।

पिछले कुछ समय से अपर्याप्त क्षतिपूर्ति और प्रभावित लोगों की आजीविका के नुकसान  तथा बिना उचित पुनर्वास के अनिच्छुक विस्थापन के कारण कई मामलों में सरकार और कंपनियों द्वारा भूमि अधिग्रहण का प्रतिरोध हो रहा है। इसके अतिरिक्त, लोग एक अनिश्चित भविष्य के लिए, जो पूरी तरह बाजार के उठापटक पर निर्भर है, अपने वर्तमान घर और खेती के पेशे को छोड़ने के इच्छुक नहीं हैं। 1894 का औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण कानून पूरी तरह भू स्वामियों के हितों के खिलाफ रहा है क्योंकि इसकी कोशिश सरकार के जरिये न्यूनतम कीमत पर उद्योग को जमीन उपलब्ध कराने की रहती है। अभी तक अधिकांश राज्यों में दबंग हस्तियों की कानूनी ताकतों का उपयोग करके लोगों को प्रताड़ित कर उन्हें उनकी जमीन छोड़ने को विवश करने का प्रचलन रहा है और कुछ मामलों में तो बलपूर्वक भी जमीन छोड़ने को विवश किया जाता है।

औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण कानून की सबसे ज्यादा आलोचना उसके अत्यावश्यक खंड को लेकर की जाती है। यह खंड वास्तव में कभी भी इसकी सच्ची व्याख्या नही करता कि किसी तात्कालिक जरूरत का क्या अर्थ है और इसे अधिग्रहण करने वाले प्राधिकरण के विवेक पर छोड़ देता है। इसके परिणामस्वरूप इस अधिनियम के तहत लगभग सभी अधिग्रहण, यहां तक कि निजी रियल एस्टेट के लिए भी, अत्यावश्यक खंड का उपयोग करते हैं। इसका परिणाम इस अधिनियम के तहत सूचीबद्ध प्रक्रियाओं की यहां तक कि इनकी सांकेतिक संतुष्टि के बगैर भी जमीन की पूरी बेदखली के रूप में सामने आता है।

बदकिस्मती से नुकसान उठाने वाले सबसे गरीब, बिना कौशल के और अक्सर आदिवासी लोग होते हैं जो बाजार की ताकतों का मुकाबला नहीं कर पाते। उन्हें उनकी जमीन से जबर्दस्ती बेदखल कर दिया जाता है और उनकी स्थिति अधिग्रहण से पहले की तुलना में भी बदतर हो जाती है। कुछ आकलनों के अनुसार, 1947 और 2004 के बीच कम से कम 6 करोड़ लोग विस्थापित हुए जिनमें कम से कम 40 फीसदी आदिवासी और 20 फीसदी अनुसूचित जातियों के थे। इन विस्थापित लोगों में से 18 से भी कम फीसदी का पुनर्वास हुआ। इसने लाखों स्वतंत्र उत्पादकों को धनविहीन श्रमिकों में तबदील कर दिया। कल्पनाशील भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास नीतियों के साथ इस परिस्थिति से बचा जा सकता था।

बलपूर्वक अधिग्रहण को लेकर संघर्ष

1990 के पहले, अधिकांश भूमि का अधिग्रहण सरकार द्वारा बड़ी सिंचाई परियोजनाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और चंडीगढ़, गांधीनगर और भुवनेश्वर जैसे नए नगरों की स्थापना जैसे स्पष्ट सार्वजनिक उद्वेश्यों के लिए किया गया था, इसलिए प्रताड़नापूर्ण कानूनी अधिकारों के इस्तेमाल की आम जनता की नजरों में कुछ विश्वसनीयता थी। बहरहाल, पिछले दो दशकों में दबंग व्यक्तियों की ताकत का इस्तेमाल निजी उद्योग और रियल एस्टेट के लिए भी हुआ है जिसका उद्वेश्य ‘राष्ट्रीय विकास की उदात्त भावना नहीं बल्कि मुनाफाखोरी‘ रहा है। हालांकि ऐसी निजी क्षेत्र की कंपनियां प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन में योगदान देती हैं, लेकिन लोगों की नजरों में ये गतिविधियां ‘सार्वजनिक हित‘ में नहीं होती हैं इसलिए वे क्षेत्र को छोड़कर जाने या अनुचित मुआवजे को स्वीकार करने के प्रति कम सहनशील होते हैं। इसके परिणमस्वरूप, भूमि अधिग्रहण का विरोध और उग्रवाद बढ़ रहा है जिससे तनाव, संघर्ष और हिंसा बढ़ रही है, साथ ही, मुकदमेबाजी भी बढ़ रही है। इससे अनिश्चितता बढ़ती है और जमीन के स्वामित्व में देरी से संबंधित लागत भी बढ़ती है।

निम्न मुआवजा ही प्रतिरोध का एकमात्र कारण नहीं है। सरकार और किसानों के बीच भरोसे की कमी भी इसकी एक बड़ी वजह है क्योंकि पुनर्वास और भुगतान के उनसे पहले किए गए वायदे पूरे नहीं किए गए हैं और मुआवजे की राशि भी अनिश्चित और अनियमित रही है।

नया भूमि अधिग्रहण कानून

जिन समस्याओं पर उपर चर्चा की गई है उन पर ‘ भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्निपटान अधिनियम, 2013 में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार‘ नामक नए कानून में ध्यान दिया गया है जिसे संसद ने सितंबर 2013 में पारित किया। इस अधिनियम के संचालन के लिए नियमों को अगस्त 2014 में अधिसूचित किया गया। नया कानून न केवल भू स्वामियों की क्षतिपूर्ति को उल्लेखनीय रूप् से बढ़ाता है बल्कि अधिग्रहित भूमि पर निर्भर रहे भूमिहीन श्रमिकों एवं किरायेदारों समेत प्रत्येक प्रभावित परिवारों को रोजगार मुहैया कराने या 20 वर्षों के लिए 2000 रूप्ये की मासिक राशि (आगे के वर्षों के लिए मुद्रास्फीति के लिए संवैधानिक बढोतरी के साथ) या एकमुश्त 5 लाख रूपये की अनुशंसा के जरिये न्याय करने की भी कोशिश करता है।

नया कानून सरकारी जरूरतों और निजी (सार्वजनिक-निजी-साझीदारी समेत) परियोजनाओं के बीच अंतर करता है। पहले वर्ग में रक्षा जरूरतों और बुनियादी ढांचे के लिए परियोजनाओं, सरकार द्वारा संचालित उद्योगों या खनन गतिविधियों, सरकार प्रशासित या समर्थित शैक्षणिक और निर्धनों या भूमिहीनों या प्राकृतिक आपदा प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए चिकित्सा संस्थानों परियोजनाएं शामिल हैं। ऐसे मामलों में प्रभावित भूमि स्वामियों की सहमति की जरूरत नहीं है। बहरहाल, अगर निजी उद्योग या रियल एस्टेट के लिए जमीन की आवश्यकता है तो 80 फीसदी भूमि स्वामियों की सहमति अनिवार्य है। सार्वजनिक-निजी-साझीदारी (पीपीपी) परियोजनाओं के लिए इसे घटाकर 70 फीसदी कर दिया गया है। निजी कंपनियों समेत ऐसी परियोजनाओं के लिए संबंधित निकाय को भूमि स्वामियों के साथ पुनर्वास और मुआवजे की शर्तों पर चर्चा करनी होगी और उनकी सहमति लेनी होगी। संबंधित निकाय की भूमि स्वामियों के साथ पुनर्वास और मुआवजे की प्रस्तावित शर्तों पर अनौपचारिक सहमति को जिला अधिकारियों को संप्रेषित कर दिया जाएगा जो इसे प्रभावित भूमि स्वामियों के साथ प्रशासन की बैठक से, जहां उनसे औपचारिक लिखित सहमति मांगी जाएगी, कम से कम तीन महीने पहले स्थानीय भाषाओं में प्रत्येक प्रभावित भूमि स्वामी को उपलब्ध कराएंगे। प्रभावित भूमि स्वामियों के साथ प्रशासन की बैठक के दौरान प्रभावित भूमि स्वामी की सहमति लेने की सारी प्रक्रियाएं वीडियो में रिकॉर्ड की जाएगी और सारी प्रक्रियाओं का लिखित दस्तावेज तैयार किया जाएगा।

सरकारी परियोजनाओं के लिए, जहां सहमति की आवश्यकता नहीं है, मुआवजा शहरी क्षेत्रों के लिए बाजार मूल्य से दोगुना और अधिग्रहित भूमि की शहरों से दूरी के लिहाज से ग्रामीण क्षेत्रों के लिए दो से चार गुना अधिक होगा। हालांकि भूमि और पुनर्वास की कीमत हर परियोजना में अलग अलग होगी, बगैर देरी या कानूनी पचड़े के उद्योग को उपलब्ध कराई भूमि की कुल लागत परियोजना लागत के 2 से 5 फीसदी से अधिक नहीं होगी।

नया अधिनियम आदिवासी समुदायों और अन्य वंचित समूहों के लिए विशेष सुरक्षोपायों की अनुशंसा करता है जिसके अनुसार भले ही सरकारी परियोजना ही क्यों न हो, बिना ग्राम सभाओं की सहमति के अनुसूचित क्षेत्रों में कोई जमीन अधिगृहित नहीं की जाएगी। नए अधिनियम में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की जमीनों के लिए विशेष और बढ़े हुए लाभ हैं।

अधिग्रहण की जगह पट्टे पर क्यों न दें जमीन?

नए अधिनियम के खंड 105 में कहा गया है कि सरकार अधिग्रहण की जगह पट्टे पर जमीन लेने के विकल्प का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है। बहरहाल, चूंकि यह राज्य का विषय है इसलिए राज्यों को भूमि बाजार में उद्योग के प्रवेश को सुगम बनाने के लिए अपने काश्तकारी कानूनों में संशोधन करना चाहिए और इच्छुक क्रेता-इच्छुक विक्रेता सौदों को बढ़ावा देना चाहिए जोकि भूमि अधिग्रहण कानूनों के बाध्यकारी प्रावधानों को अप्रासंगिक बना देगा।

पट्टेदारी को संभव बनाने के लिए दो कानून हैं जिनपर ध्यान देने की जरूरत है। पंजाब, हरियाण, असम और आंध्र प्रदेश (लेकिन तेलंगाना नहीं) और तमिलनाडु को छोड़कर लगभग सभी राज्यों में ऐसे काश्तकारी कानून हैं जो खेती के लिए काश्तकारों को जमीन पट्टे पर दिए जाने की अनुमति नहीं देते। महाराष्ट्र में तो किसी गैर कृषक को कृषि की जमीन की बिक्री पर भी पाबंदी है। दूसरा, लगभग सभी राज्यों में ऐसे प्रावधान हैं कि जबतक किसी मनोनीत प्राधिकरण से लिखित अनुमति नहीं ली जाती कृषि भूमि का उपयोग औद्योगिक उद्वेश्यों के लिए नहीं किया जा सकता। यह समय नष्ट करने वाला है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। अक्सर राजनेता और भू माफिया जमीन के उपयोग में बदलाव के लिए सरकार से आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया को सुगम बनाने हेतू बिचौलियों की तरह काम करते हैं। इन दोनों कानूनों को हटाने की जरूरत है।

आजादी के बाद लगभग सभी राज्यों में स्वामी-कृषि को बढ़ावा देने  और फसल में हिस्सा रखने वालों और काश्तकारों को भू स्वामित्व की सुरक्षा देने के लिए पट्टेदारी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। हालांकि आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे कानून बने रहने चाहिए जहां कृषि बाजार पूरी तरह विकसित नहीं हैं पर अन्य राज्यों में जहां उत्पादन का तरीका पूंजीवादी बन चुका है, वहां उदार बनाने तथा जमीन को सभी सरकारी नियंत्रणों से आजाद करने की जरूरत है।

अध्ययनों से प्रदर्शित होता है कि पट्टेदारी बाजार छोटे किसानों और काश्तकारों को जमीन के नियंत्रण में बदलाव को सुगम बनाते हैं। बड़े भू स्वामी जमीन पट्टे पर देते हैं और संचालनगत क्षेत्र का परिणामस्वरूप वितरण स्वामित्व पद्धति की तुलना में कम विषम होता है। इस प्रकार, पट्टेदारी बाजार भूमिहीनों को जमीन तक पहुंच सुलभ कराता है और फिर रोजगार अवसरों में इजाफा करता है क्योंकि गरीब किसान अपनी जमीन को श्रम के इनपुट से परिपूर्ण कर देना चाहता है।

जब लगभग 15 वर्ष पहले मैं भारत सरकार में ग्रामीण विकास सचिव था, मैंने सभी राज्यों को लिखा था कि समय आ गया है कि ऐसे कानूनों को निरस्त करें तथा जमीन को पट्टे पर देने की अनृमति दें। पंजाब और हरियाणा के अनुभव प्रदर्शित करते हैं कि मुक्त पट्टेदारी से नए वेश में जमींदारी की वापसी नहीं हुई है जैसाकि काश्तकारी पर सख्त नियंत्रण करने के पीछे डर था। बहरहाल, राज्यों ने मेरी सलाह को तवज्जो नहीं दिया।

औद्योगिक उद्वेश्यों के लिए भूमि के उपयोग को बदलने के सभी नियंत्रणों को दूर किया जाए, के दूसरा मुद्वे पर भी ध्यान देने की जरूरत है। यह तर्क कि इससे खाद्य की कमी हो जाएगी, गलत है। आज सरकारी गोदामों में 6 करोड़ टन से अधिक अधिशेष खाद्यान्न है जबकि 1 करोड़ टन अनाज का हम निर्यात कर रहे हैं। इस प्रकार हमारे पास आंतरिक खपत के लिए पर्याप्त खाद्य है और हम कुछ हद तक अपनी खेती की जमीनों को गैर कृषि जमीन में बदल सकते हैं जिससे गैर कृषि रोजगार को बढ़ावा मिलने के जरिये मौजूदा खेती की जमीनों पर दबाव कम होगा।

संसदीय समिति अनुशंसाएं

लागू किए जाने से पहले विधेयक के प्रारूप की 2012 में एक  संसदीय समिति ने जांच की थी जिसने एक अव्यावहारिक पक्ष लिया और अनुशंसा की कि निजी कंपनियों के लिए कोई अधिग्रहण नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें सीधे भू स्वामियों से पूरी जमीन खरीद लेने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। मुनाफा कमाने वाले उपक्रमों को खुले बाजार में जमीन खरीदनी पड़ेगी। यह अनुशंसा विकसित क्षेत्रों के किसानों की सहायता कर सकता है जो बाजार की स्थितियों से परिचित हैं लेकिन इसका परिणाम आदिवासी एवं सुदूर के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के रूप में सामने आ सकता है जहां भू माफिया असामाजिक तत्वों की मदद से आदिवासियों को भू हस्तांतरण दस्तावेजों पर बलपूर्वक दस्तख्त करने को विवश कर देंगे। कई मध्य भारतीय राज्यों में किसी भी स्थिति में बाजार के सौदों के जरिये आदिवासी जमीन की बिक्री गैर आदिवासियों को नहीं हो सकती। इसके अलावा, ‘कानूनी अनुबंध‘ के तहत खरीदी गई जमीन पर पुनर्वास की जिम्मेदारियां नहीं होतीं जिसकी वजह से उन लाभों से वंचित रहना पडे़गा जो नए अधिनियम के तहत भूमिहीन आजीविका खोने वालों के लिए प्रस्तावित है। सरकार ने संसदीय समिति की अनुशंसाएं को खारिज कर अच्छा ही काम किया है।

नए कानून के नकारात्मक पहलू

उद्योग की मुख्य चिंता एकमुश्त कीमत की नहीं होनी चाहिए बल्कि जमीन का स्वामित्व मिलने में देरी की होनी चाहिए जिसकी वजह से परियोजना की लागत में बढोतरी होती है। इस अधिनियम पर करीबी नजर डालने से प्रदर्शित होता है कि एक एकड़ जमीन के अधिग्रहण में भी कम से कम तीन से चार वर्ष लग जाएंगे और प्रस्ताव को लगभग एक दर्जन हाथों से गुजरना पड़ेगा। यह देरी मुख्य रूप से विधेयक के कार्यकर्ताओं और ‘विशेषज्ञों‘ द्वारा सुशोभित कई समितियों के गठन की इच्छा जताने से पैदा होती है। सबसे पहले, अधिग्रहण के सभी मामलों के लिए एक स्वतंत्र निकाय द्वारा एक सामाजिक प्रभाव आकलन किया जाएगा और उसकी रिपोर्ट की भली भांति जांच अन्य विशेषज्ञ समूह द्वारा की जाएगी। इसके अतिरिक्त, एक आर एंड आर समिति, एक राज्य स्तरीय समिति और एक राष्ट्रीय निगरानी समिति होगी जो कनिष्ठ समितियों द्वारा सृजित रिपोर्ट पर सिद्धांतवादी टिपण्णी देगी। औपचारिकताओं के पूरी होने में देरी मुआवजे की अदायगी में देरी को जन्म देगी जिससे किसानों को नुकसान पहुंचेगा और उनके पुनर्वास को लेकर अनिश्चितता पैदा होगी।

एक सरल समाधान जिलाधीश को बिना समितियों और राज्य सरकारों के निर्देश के 100 एकड़ तक जमीन अधिगृहित करने का अधिकार सुपुर्द करना हुआ होता। जिलाधीश भू स्वामियों की सहमति प्राप्त करता और बिना किसी अधिकतम सीमा के बातचीत के जरिये मुआवजा निर्धारित करत और इस प्रकार कुछ महीनों के समय में परियोजना के लिए जमीन उपलब्ध करा देता।

नई सरकार द्वारा समीक्षा

ऐसी उम्मीद की जाती है कि मई 2014 में सत्तारूढ़ होने वाली नई सरकार देरी में कटौती करेगी और इस प्रकार प्रक्रियाओं को सरल बनाने के जरिये अनावश्यक लागत कम करेगी जिससे कि जल्द से जल्द इच्छुक निकाय को भूमि उपलब्ध हो जाए और इसके साथ साथ यह भी सुनिश्चित हो सके कि प्रभावित परिवारों को पूरा मुआवजा मिले और उनका उचित तरीके से पुनर्वास हो।

गौरतलब है कि भूमि अधिग्रहण की कीमत के दो तत्व होते हैं। एक भूमि अधिग्रहण के लिए अदा प्रत्यक्ष कीमत और पुनर्वास का हिस्सा जो सीधे प्रभावित परिवारों को जाती है। इसे आप अधिग्रहण की कीमत का नकदी हिस्सा मान सकते हैं। दूसरा तत्व अप्रत्यक्ष कीमत है। इसमें सौदे की लागत, अवसर लागत जो किसी अधिग्रहण को संपन्न करने में लगे समय से पैदा होती है, जिस दौरान पूंजी का निवेश नहीं हुआ है और उत्पादन शुरू नहीं हुआ है, वह समय आदि शामिल होते हैं। नई सरकार का प्रयास प्रत्यक्ष लागत को बनाये रखने और अप्रत्यक्ष लागत में उल्लेखनीय कटौती करने का होना चाहिए।

कुल मिलाकर, 2013 के कानून ने पूरी तरह 1894 के औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण अधिनियम को विस्थापित कर दिया। नए कानून ने जबरन अधिग्रहणों के युग को समाप्त कर दिया, भूमि स्वामियों और भूमिविहीन परिवारों के मुआवजे में उल्लेखनीय बढोतरी कर दी, भूमि अधिग्रहण के कारण विस्थापित परिवारों के अनिवार्य पुनर्वास की व्यवस्था की, ‘तात्कालिक‘ खंड के दुरूपयोग में कमी की, किसानों को अधिगृहित भूमि के बढ़े हुए मूल्य में हिस्सा दिलाया और ग्राम परिषदों को भूमि अधिग्रहण पर फैसला करने के नए अधिकार दिए। अभी भी बेहतरी की काफी गुंजाइश है जिससे कि पूरी प्रक्रिया ढीली न पड़े और आर्थिक विकास बाधित न हो।

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